Time Published: Saturday, August 1, 2026, 10:53 [IST]

PoK Violence Explained: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इस वक्त हालात बेहद खराब हैं। महंगाई, टैक्स और अपने अधिकारों की मांग को लेकर सड़क पर उतरे आम लोगों पर वहां की सुरक्षा बलों ने गोलियां बरसा दी हैं। पिछले 3-4 दिनों में हिंसा इतनी बढ़ी कि दर्जनों लोगों की जान चली गई। रावलाकोट से लेकर मुजफ्फराबाद तक सिर्फ प्रदर्शनकारियों का गुस्सा दिख रहा है। इस्लामाबाद तक इस विरोध की गूंज पहुंच चुकी है।

इस पूरे विवाद की जड़ सिर्फ महंगाई या टैक्स नहीं है। असली लड़ाई उस चुनावी व्यवस्था को लेकर है, जिसे वहां के लोग अपने अधिकारों के खिलाफ बता रहे हैं। खासकर पाकिस्तान की संसद के लिए आरक्षित 12 सीटों को लेकर नाराजगी सबसे ज्यादा है। इसी मुद्दे ने पुराने गुस्से को नई आग दे दी है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर PoK में अचानक इतना बड़ा बवाल क्यों शुरू हुआ? 12 विवादित सीटों का इससे क्या कनेक्शन है? भारत और स्थानीय नेताओं का इस पर क्या कहना है?

PoK Violence Explained

4 दिन में 50 लोगों की मौत, इस्लामाबाद में फूटा गुस्सा

PoK में चल रहे इस आंदोलन का चेहरा बनी है जम्मू-कश्मीर जॉइंट पीपुल्स एक्शन कमेटी (JAAC)। संगठन के सदस्य सरदार उमर नजीर कश्मीरी के मुताबिक, सुरक्षा बलों की अंधाधुंध कार्रवाई में 50 से ज्यादा बेकसूर नागरिकों की जान जा चुकी है और सैकड़ों लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। उमर नजीर का आरोप है कि रावलाकोट के डी-चौक पर शांतिपूर्ण धरना दे रहे निहत्थे लोगों पर सीधे गोलियां चलाई गईं। मुजफ्फराबाद में भी ऐसे ही हालात हैं।

इस बर्बरता के खिलाफ 31 जुलाई को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के जी-10 मरकज में एक बड़ी रैली हुई। पूर्व सीनेटर मुश्ताक खान की अगुवाई में हुई इस रैली में कश्मीरी और पाकिस्तानी नागरिकों ने कंधे से कंधा मिलाकर PoK के लोगों का साथ दिया। उमर नजीर ने इस ऐतिहासिक एकजुटता के लिए इस्लामाबाद के लोगों का शुक्रिया जताया है।

उमर नजीर कश्मीरी का कहना है,

"हमारे लोग बिना हथियार के अपने अधिकारों की बात कर रहे थे, लेकिन जवाब गोलियों से मिला। इतने लोगों की जान जाना बेहद दर्दनाक है। इसके बावजूद हमारा आंदोलन नहीं रुकेगा और हम शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाते रहेंगे।"

हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया है। इस्लामाबाद का कहना है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई आम प्रदर्शनकारियों के खिलाफ नहीं बल्कि भीड़ में मौजूद आतंकियों के खिलाफ की गई। यानी मौतों की संख्या और कार्रवाई को लेकर दोनों पक्षों के दावे पूरी तरह अलग-अलग हैं।

PoK Protest Explained: आखिर अचानक क्यों भड़क गया आंदोलन?

पिछले एक साल से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में महंगाई, बिजली दरों, टैक्स और प्रशासनिक फैसलों को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही थी। इन मुद्दों को लेकर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) लगातार आंदोलन चला रही है। यह संगठन व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं का साझा मंच माना जाता है।

लेकिन इस बार मामला सिर्फ आर्थिक परेशानियों तक सीमित नहीं रहा। जैसे ही पाकिस्तान की संसद के लिए 12 आरक्षित सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई, विरोध और तेज हो गया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद अपनी पसंद की सरकार बनवाता है और स्थानीय लोगों की राजनीतिक आवाज को कमजोर करता है। यही वजह है कि इस बार आंदोलन पहले से कहीं ज्यादा बड़ा और उग्र दिखाई दे रहा है।

क्या है 12 विवादित सीटों का पूरा गणित?

PoK में इस बवाल की सबसे बड़ी वजह वहां की 53 सीटों वाली असेंबली के चुनाव हैं। कुल 53 सीटें हैं, जिनमें से 8 सीटें महिलाओं, टेक्नोक्रेट्स और धर्मगुरुओं के लिए रिजर्व हैं। बाकी 45 में से 12 सीटें उन शरणार्थियों/प्रवासियों के लिए आरक्षित हैं जो पाकिस्तान के अलग-अलग प्रांतों में बसे हैं।

स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि इन 12 सीटों का चुनाव पाकिस्तान चुनाव आयोग के कंट्रोल से बाहर होता है। इस्लामाबाद में बैठी सरकार इन सीटों में धांधली करके अपने मनपसंद उम्मीदवारों को जिताती है और अपनी पसंद का 'प्रधानमंत्री' कुर्सी पर बैठाती है। स्थानीय नागरिक इन 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

चुनाव 10 अगस्त तक तीन चरणों में चलने हैं, लेकिन जनता अब पारदर्शी व्यवस्था चाहती है। JAAC लंबे समय से मांग कर रही है कि इस व्यवस्था में बदलाव किया जाए और स्थानीय लोगों की राजनीतिक हिस्सेदारी को प्राथमिकता मिले।

पाकिस्तान सरकार ने क्या कहा?

प्रदर्शनकारियों के आरोपों के बीच पाकिस्तान सरकार का रुख बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के राज्यमंत्री तलाल चौधरी ने साफ कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत नहीं करेगी और कानून अपना काम करेगा।

सरकार का दावा है कि जिन इलाकों में कार्रवाई हुई, वहां प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के सदस्य भी मौजूद थे। सुरक्षा बलों ने आम नागरिकों पर नहीं, बल्कि उन्हीं तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की।

हालांकि सरकार अब तक ऐसा कोई सार्वजनिक सबूत पेश नहीं कर पाई है, जिससे यह दावा पूरी तरह साबित हो सके। यानी एक तरफ प्रदर्शनकारी गोलीबारी को मानवाधिकार का मामला बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार इसे सुरक्षा कार्रवाई कह रही है।

भारत का सख्त संदेश: आर्थिक शोषण का नतीजा

भारत ने हमेशा की तरह इस मुद्दे पर अपना रुख बिल्कुल साफ रखा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दिल्ली में साफ कहा,

"जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा हिस्सा भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। पाकिस्तान ने इस पर अवैध कब्जा कर रखा है। PoK में जारी जनाक्रोश पाकिस्तान के आर्थिक शोषण, बुनियादी अधिकारों के हनन और प्रशासनिक जुल्म का सीधा नतीजा है। फर्जी चुनाव कराकर पाकिस्तान अपने मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपा नहीं सकता।"

वहीं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी वहां के बिगड़े हालात पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिस तरह से बेकसूर लोगों पर बल प्रयोग हो रहा है, वह डराने वाला है और वहां जल्द से जल्द शांति बहाल होनी चाहिए।

मीरवाइज उमर फारूक की जांच की मांग

कश्मीर के मुख्य मौलवी मीरवाइज उमर फारूक ने श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान PoK हिंसा पर गहरा दुख जताया। उन्होंने इस पूरी हिंसा की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच की मांग की।

मीरवाइज उमर फारूक ने कहा,

"चाहे आम नागरिक की जान जाए या किसी पुलिसवाले की, हर मौत दर्दनाक है। पाकिस्तान सरकार को JAAC प्रतिनिधियों के साथ ईमानदारी से बात करनी चाहिए। सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन असली हकदार वहां के लोग हैं। LOC जमीनों को बांट सकती है, लेकिन हमारे खून, संस्कृति और रिश्तों को नहीं। हालांकि, पाकिस्तान में रह रहे 30 लाख कश्मीरी शरणार्थियों के वोटिंग अधिकार भी छीने नहीं जाने चाहिए। दोनों पक्षों को बीच का रास्ता निकालना होगा।"

मानवाधिकार संगठनों ने क्यों जताई चिंता?

PoK में बढ़ती हिंसा को लेकर Amnesty International और पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने भी चिंता जताई है। दोनों संगठनों ने गोलीबारी और मौतों की खबरों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

आखिर पूरा विवाद कहां जाकर खड़ा है?

PoK में चल रहा आंदोलन अब सिर्फ महंगाई, टैक्स या बिजली बिल तक सीमित नहीं है। यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, चुनावी व्यवस्था और प्रशासन पर भरोसे का सवाल बन चुका है। एक तरफ JAAC और स्थानीय लोग चुनावी सिस्टम में बदलाव की मांग कर रहे हैं।

दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार कानून-व्यवस्था का हवाला देकर सख्त कार्रवाई कर रही है। इसी टकराव के बीच कई लोगों की जान जा चुकी है और हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। आने वाले दिनों में तीन चरणों में चुनाव पूरे होंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या पाकिस्तान सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत का रास्ता अपनाती है या फिर टकराव और बढ़ेगा।