धान का बढ़ता दायरा : परंपरा, नीति और बदलती कृषि व्यवस्था का नया अध्याय
By शशिकांत मिश्र
Updated: Wednesday, July 29, 2026, 10:41 [IST]
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, किंतु कृषि केवल उत्पादन का विषय नहीं है; यह जलवायु, परंपरा, सरकारी नीतियों, बाजार व्यवस्था और ग्रामीण समाज की जीवनशैली का सम्मिलित प्रतिबिंब भी है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कृषि इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। एक समय अविभाजित मध्यप्रदेश के विशाल भूभाग में खरीफ मौसम का पर्याय धान था, जबकि रबी में गेहूं, चना, मसूर और मटर जैसी फसलें किसानों की विश्वसनीय आजीविका मानी जाती थीं। समय बदला, कृषि तकनीक बदली, नई फसलें आईं, सरकारी नीतियां बदलीं, किंतु आज भी यदि इन दोनों राज्यों की खेती की मूल आत्मा को समझना हो तो धान की हरियाली ही उसकी सबसे सशक्त पहचान दिखाई देती है।
पिछले तीन दशकों में किसानों ने अनेक प्रयोग किए। जिन क्षेत्रों में कभी कोदो, कुटकी और अन्य मोटे अनाज बोए जाते थे, वहां सोयाबीन ने तेजी से अपनी जगह बनाई। बढ़ती मांग और बेहतर आय की संभावना ने किसानों को आकर्षित किया। किंतु कृषि केवल बाजार की इच्छाओं से संचालित नहीं होती। विपरीत मौसम, उत्पादन में अस्थिरता, बढ़ती लागत और सरकारी खरीद व्यवस्था ने धीरे-धीरे किसानों को पुनः उन पारंपरिक फसलों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया, जिन पर उनका विश्वास पीढ़ियों से कायम था। यह केवल फसल परिवर्तन नहीं, बल्कि किसान की व्यावहारिक सोच का परिचायक है। वह प्रयोग अवश्य करता है, लेकिन अंततः उसी खेती को अपनाता है जो उसे स्थिरता और सुरक्षा का भरोसा देती है।

छत्तीसगढ़ में भी एक समय चीनी मिलों की स्थापना के बाद गन्ने की खेती को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जगी थी। अनेक किसानों ने इसे अतिरिक्त आय के अवसर के रूप में देखा। लेकिन गन्ना लंबी अवधि की फसल है। इसकी लागत अधिक है, सिंचाई की निरंतर आवश्यकता होती है और भुगतान की प्रक्रिया भी अक्सर लंबी होती है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए वर्ष भर पूंजी फंसाए रखना आसान नहीं था। परिणामस्वरूप गन्ने का विस्तार कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गया और अधिकांश किसान फिर धान की खेती की ओर लौट आए।
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मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की भौगोलिक एवं मौसमी परिस्थितियां स्वाभाविक रूप से धान उत्पादन के अनुकूल हैं। पर्याप्त वर्षा, मिट्टी की प्रकृति और खरीफ मौसम का स्वरूप इस फसल के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करते हैं। यही कारण है कि धान का रकबा वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है। इसमें सरकारी खरीद नीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जब किसानों को यह विश्वास होता है कि उनकी उपज का सुनिश्चित उपार्जन होगा, तब वे उसी फसल की ओर अधिक आकर्षित होते हैं।
हालांकि यहां एक रोचक स्थिति दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ सरकार धान की खरीद ₹3100 प्रति क्विंटल की दर से कर रही है, जबकि मध्यप्रदेश में यह मूल्य ₹2369 प्रति क्विंटल है। दोनों राज्यों के बीच लगभग ₹750 प्रति क्विंटल का अंतर होने के बावजूद मध्यप्रदेश में धान का रकबा लगातार बढ़ रहा है और उत्पादन नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि किसान का निर्णय केवल समर्थन मूल्य से निर्धारित नहीं होता। यदि उत्पादन अधिक हो, लागत अपेक्षाकृत नियंत्रित रहे और मौसम अनुकूल हो, तो कम मूल्य पर भी कुल आय संतोषजनक हो सकती है।
वास्तव में मध्यप्रदेश में धान उत्पादन बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। उच्च उत्पादकता वाले संकर और हाईब्रिड बीजों ने प्रति हेक्टेयर उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की है। वैज्ञानिक खेती, उन्नत कृषि यंत्र, बेहतर सिंचाई और आधुनिक कृषि तकनीकों ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है। संकर बीजों के साथ रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग भी तेजी से बढ़ा है। इससे उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन खेती की प्रकृति अधिक रसायन-आधारित होती जा रही है। यह स्थिति भविष्य में मिट्टी की उर्वरता, जल गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन के संदर्भ में गंभीर विचार की मांग करती है।
कृषि तकनीक में आया परिवर्तन ग्रामीण समाज की संरचना को भी बदल रहा है। कभी बैलों से होने वाला जुताई का कार्य आज ट्रैक्टर कुछ घंटों में पूरा कर देते हैं। गोबर की खाद का स्थान रासायनिक उर्वरकों ने काफी हद तक ले लिया है। खरपतवार नियंत्रण के लिए पारंपरिक निंदाई-गुड़ाई की जगह अब खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग बढ़ गया है। इन परिवर्तनों ने खेती में मानव श्रम की आवश्यकता को काफी कम कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि छोटे और एकल परिवार वाले किसान भी अपेक्षाकृत कम श्रमबल के साथ बड़ी खेती का संचालन करने लगे हैं।
ग्रामीण जीवन की सामाजिक संरचना में आए बदलाव भी खेती को प्रभावित कर रहे हैं। पहले संयुक्त परिवार कृषि की रीढ़ हुआ करते थे। आज एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। परिवार का प्रत्येक सदस्य केवल खेती तक सीमित नहीं रह गया है। कोई छोटा व्यापार कर रहा है, कोई नौकरी, कोई सेवा क्षेत्र से जुड़ा है, तो कोई मजदूरी के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहा है। ऐसे में धान जैसी फसल, जिसमें सीमित अवधि में अधिक कार्य और शेष समय अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध हो, किसानों को अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है।
इसके बावजूद भविष्य की चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट, बढ़ती उत्पादन लागत और रसायनों पर बढ़ती निर्भरता कृषि के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है। ऐसे समय में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। कृषि को टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बनाना भी उतना ही आवश्यक है। धान उत्पादन में वृद्धि के साथ जल संरक्षण, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, फसल विविधीकरण और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी समानांतर प्रयास करने होंगे।
कृषि केवल खेत में खड़ी फसल का नाम नहीं है; यह किसान के विश्वास, उसकी आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्र की खाद्य व्यवस्था का आधार है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसान आज भी धान को इसलिए चुन रहे हैं क्योंकि उन्हें उसमें स्थिरता, भरोसा और जीवनयापन का आधार दिखाई देता है। सरकारों की जिम्मेदारी केवल समर्थन मूल्य घोषित करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो किसान को बेहतर आय देने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित करें।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि बदलते समय में खेती की तकनीक बदल सकती है, उपकरण बदल सकते हैं और बाजार की परिस्थितियां भी बदल सकती हैं, लेकिन किसान का सबसे बड़ा उद्देश्य आज भी वही है-कम जोखिम, सुनिश्चित आय और सम्मानजनक जीवन। यदि कृषि नीति इस मूल भावना को केंद्र में रखकर बनाई जाएगी, तभी भारतीय कृषि वास्तव में समृद्ध, टिकाऊ और भविष्य के लिए सुरक्षित बन सकेगी। यही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कृषि यात्रा का सबसे बड़ा संदेश भी है।
(लेखक वरिष्ट पत्रकार एवं कृषि विषय के जानकार है)
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