Budhana Assembly Caste Equations पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे दिलचस्प चुनावी समीकरणों में शामिल है। मुजफ्फरनगर जिले की विधानसभा संख्या 11 बुढ़ाना में मुस्लिम, जाट, गुर्जर, जाटव, कश्यप, ब्राह्मण, ठाकुर, त्यागी, पाल और दूसरे पिछड़े वर्गों का प्रभाव चुनावी मुकाबले को बहुकोणीय बनाता है। 2022 में राष्ट्रीय लोक दल के राजपाल सिंह बालियान ने यहां भाजपा के उमेश मलिक को 28,310 वोटों से हराया था। 2026 की मतदाता सूची और SIR से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो बुढ़ाना का मतदाता आधार अब करीब 3.61 लाख के आसपास माना जा सकता है।
बुढ़ाना की राजनीति को सिर्फ हिंदू-मुस्लिम या जाट-मुस्लिम समीकरण में बांधकर देखना पर्याप्त नहीं है। जाटव, कश्यप, गुर्जर, ब्राह्मण, ठाकुर, त्यागी, सैनी, पाल, प्रजापति और दूसरे छोटे सामाजिक समूह कई चुनावों में जीत-हार का अंतर तय करने की क्षमता रखते हैं।
बुढ़ाना विधानसभा एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| विधानसभा | बुढ़ाना |
| विधानसभा संख्या | 11 |
| जिला | मुजफ्फरनगर |
| लोकसभा क्षेत्र | मुजफ्फरनगर |
| श्रेणी | सामान्य |
| मौजूदा विधायक | राजपाल सिंह बालियान |
| राजनीतिक दल | राष्ट्रीय लोक दल |
| 2022 विजयी मत | 1,31,093 |
| 2022 उपविजेता | उमेश मलिक, भाजपा |
| जीत का अंतर | 28,310 वोट |
| 2026 मतदाता आधार | करीब 3.61 लाख |
| प्रमुख सामाजिक समूह | मुस्लिम, जाट, गुर्जर, जाटव, कश्यप, ब्राह्मण, ठाकुर, त्यागी, पाल |
वर्तमान विधायकों की सूची में राजपाल सिंह बालियान को बुढ़ाना विधानसभा से राष्ट्रीय लोक दल का विधायक दर्ज किया गया है। उनका यह तीसरा विधानसभा कार्यकाल है।
बुढ़ाना विधानसभा के जातिगत आंकड़ों की कोई आधिकारिक जाति-वार मतदाता सूची निर्वाचन आयोग जारी नहीं करता। नीचे दिए गए आंकड़े पूर्व चुनावों के दौरान प्रकाशित स्थानीय और राजनीतिक अनुमानों पर आधारित हैं। इसलिए इन्हें निश्चित सरकारी आंकड़ा न मानकर चुनावी सामाजिक संरचना का अनुमान माना जाना चाहिए।
2022 विधानसभा चुनाव से पहले प्रकाशित जातिगत अनुमान में बुढ़ाना में मुस्लिम मतदाताओं को सबसे बड़ा सामाजिक समूह बताया गया था। इसके बाद गुर्जर, जाटव, कश्यप, ब्राह्मण, जाट और ठाकुर मतदाता महत्वपूर्ण संख्या में बताए गए थे।
| जाति/समुदाय | पूर्व प्रकाशित अनुमानित मतदाता |
| मुस्लिम | लगभग 70,000 |
| गुर्जर | लगभग 32,000 |
| जाटव | लगभग 30,000 |
| कश्यप | लगभग 30,000 |
| ब्राह्मण | लगभग 25,000 |
| जाट | लगभग 25,000 |
| ठाकुर | लगभग 20,000 |
| त्यागी | लगभग 10,000 |
| वाल्मीकि | लगभग 7,000 |
| सैनी | लगभग 5,000 |
| वैश्य | लगभग 5,000 |
| पाल | लगभग 5,000 |
| खटीक | लगभग 3,000 |
| लोधी | लगभग 2,000 |
| विश्वकर्मा | लगभग 2,000 |
| कोरी | लगभग 2,000 |
| नाई | लगभग 2,000 |
| प्रजापति | लगभग 2,000 |
इन आंकड़ों में सभी जातियों और उपजातियों को अलग-अलग शामिल नहीं किया गया है, इसलिए इनका जोड़ कुल मतदाता संख्या नहीं माना जाना चाहिए। 2026 का कुल मतदाता आधार करीब 3.61 लाख के आसपास है, जबकि जातिगत तालिका सामाजिक प्रभाव समझने के लिए पुराने अनुमान प्रस्तुत करती है।
एक दूसरे चुनावी आकलन में मुस्लिम मतदाता करीब 70 हजार, गुर्जर 31,800, जाटव 30 हजार, कश्यप 28 हजार, जाट 25,765 और ब्राह्मण करीब 25,500 बताए गए थे। इससे भी यह संकेत मिलता है कि बुढ़ाना में किसी एक समुदाय के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं है।
बुढ़ाना विधानसभा वोटर लिस्ट 2026: मतदाता कितने हैं?
2022 विधानसभा चुनाव से पहले बुढ़ाना में 3,75,073 मतदाता दर्ज थे। इनमें करीब 2.03 लाख पुरुष और 1.72 लाख महिला मतदाता थे। 2017 में यहां 3,59,140 मतदाता थे।
2024 तक मतदाता संख्या बढ़कर करीब 3,96,966 तक पहुंचने का आंकड़ा सामने आया। वहीं 2026 SIR से जुड़े विधानसभा-वार आंकड़ों में बुढ़ाना में मतदाता संख्या में करीब 9.08 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है। इन आंकड़ों के आधार पर 2026 का मतदाता आधार करीब 3.61 लाख के आसपास बैठता है।
| वर्ष | कुल मतदाता |
| 2012 | 3,30,066 |
| 2017 | 3,59,140 |
| 2022 | लगभग 3.75–3.78 लाख |
| 2024 | लगभग 3,96,966 |
| 2026 | करीब 3.61 लाख |
2012 की निर्वाचन आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्ट में बुढ़ाना में कुल 3,30,066 मतदाता दर्ज थे। यानी पिछले डेढ़ दशक में सीट का वोटर बेस काफी बदला है।
मुस्लिम मतदाता बुढ़ाना में क्यों महत्वपूर्ण हैं?
बुढ़ाना के पुराने जातिगत अनुमानों में मुस्लिम समुदाय सबसे बड़ा समूह है। हालांकि 70 हजार का पुराना आंकड़ा अब मौजूदा मतदाता सूची का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व नहीं करता, लेकिन क्षेत्र के अनेक गांवों और कस्बाई इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की मजबूत मौजूदगी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
2017 के चुनाव के दौरान बूथवार मतदान के विश्लेषण में भी कई मुस्लिम बहुल गांवों में मतदान प्रतिशत जाट बहुल गांवों की तुलना में ज्यादा दर्ज किया गया था। रसूलपुर दभेड़ी जैसे बूथ पर 90 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज हुआ था।
लेकिन मुस्लिम वोट अपने आप किसी एक उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित नहीं करता। उम्मीदवार, गठबंधन, स्थानीय मुद्दे और अन्य सामाजिक समूहों का रुख तय करता है कि मुस्लिम मतों का चुनावी लाभ किस दल को मिलेगा।
जाट वोट बुढ़ाना की राजनीति की दूसरी बड़ी धुरी
बुढ़ाना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन और जाट राजनीति के प्रमुख क्षेत्रों में गिना जाता है। सिसौली इसी विधानसभा क्षेत्र में है और भारतीय किसान यूनियन तथा टिकैत परिवार की राजनीतिक-सामाजिक विरासत का प्रभाव आसपास के क्षेत्र में लंबे समय से दिखाई देता रहा है।
राजपाल सिंह बालियान स्वयं जाट समुदाय से आते हैं और लंबे समय तक किसान राजनीति से जुड़े रहे हैं। राजनीतिक सफर के अनुसार उन्होंने 1986 से 1996 के बीच भारतीय किसान यूनियन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं और बाद में राष्ट्रीय लोक दल के संगठन में जिला अध्यक्ष, प्रदेश उपाध्यक्ष, मंडल अध्यक्ष और राष्ट्रीय सचिव जैसे पद संभाले।
इसी कारण बुढ़ाना में जाट वोट संख्या के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
मुस्लिम-जाट गठजोड़ ने 2022 में बदला परिणाम
2022 विधानसभा चुनाव में बुढ़ाना की राजनीति ने बड़ा बदलाव देखा। राष्ट्रीय लोक दल उस समय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में था और राजपाल सिंह बालियान को उम्मीदवार बनाया गया।
राजपाल बालियान को 1,31,093 वोट मिले, जबकि भाजपा विधायक उमेश मलिक को 1,02,783 वोट मिले। बालियान ने 28,310 वोटों से जीत दर्ज की।
| प्रत्याशी | दल | वोट |
| राजपाल सिंह बालियान | रालोद | 1,31,093 |
| उमेश मलिक | भाजपा | 1,02,783 |
| अनीस | बसपा | 10,397 |
| भीम सिंह | AIMIM | 2,633 |
| देवेंद्र कुमार | कांग्रेस | 2,452 |
2022 में जाट-मुस्लिम सामाजिक तालमेल और सपा-रालोद गठबंधन को बुढ़ाना में बड़ी ताकत मिली। लेकिन 2027 में परिस्थितियां बिल्कुल अलग होंगी, क्योंकि रालोद अब भाजपा के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा है। जुलाई 2026 तक रालोद अपनी 2027 चुनावी रणनीति NDA सहयोगी के रूप में तैयार कर रहा है।
यही बदलाव बुढ़ाना को 2027 की सबसे रोचक सीटों में शामिल करता है।
दलित और OBC वोट किसके साथ जाएंगे?
बुढ़ाना में जाटव, कश्यप, गुर्जर, पाल, प्रजापति, सैनी और अन्य OBC समुदायों की सम्मिलित संख्या बड़ी है।
करीब 30 हजार के पुराने अनुमान वाला जाटव मतदाता वर्ग बसपा का पारंपरिक आधार माना जाता रहा है, लेकिन पिछले चुनावों में इसका एक हिस्सा भाजपा, सपा और दूसरे दलों की तरफ भी गया है। इसी तरह कश्यप, पाल, प्रजापति और सैनी मतदाता किसी एक दल के स्थायी वोट बैंक के बजाय उम्मीदवार और चुनावी परिस्थितियों के आधार पर फैसला कर सकते हैं।
रालोद भी 2027 से पहले अपने पारंपरिक जाट आधार से बाहर दलित, अति पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। जून 2026 में पार्टी ने अपने सामाजिक न्याय मंच के जरिए जाटव, पाल, प्रजापति, बघेल और मुस्लिम समुदायों पर विशेष संगठनात्मक फोकस बढ़ाया।
2012 से 2022 तक बदलता रहा बुढ़ाना का जनादेश
मौजूदा स्वरूप में बुढ़ाना सीट ने लगातार तीन विधानसभा चुनावों में तीन अलग राजनीतिक संदेश दिए हैं।
| चुनाव | विजेता | पार्टी | मुख्य प्रतिद्वंद्वी | अंतर |
| 2012 | नवाजिश आलम खान | सपा | राजपाल सिंह बालियान, रालोद | 10,588 |
| 2017 | उमेश मलिक | भाजपा | प्रमोद त्यागी, सपा | 13,201 |
| 2022 | राजपाल सिंह बालियान | रालोद | उमेश मलिक, भाजपा | 28,310 |
2012 में सपा के नवाजिश आलम खान ने 68,210 वोट हासिल कर राजपाल बालियान को 10,588 वोट से हराया था। 2017 में भाजपा के उमेश मलिक ने 97,781 वोट लेकर सपा के प्रमोद त्यागी को 13,201 वोट से हराया। पांच साल बाद 2022 में राजपाल बालियान ने भाजपा से सीट वापस छीन ली।
इस इतिहास से साफ है कि बुढ़ाना किसी एक दल की स्थायी सीट नहीं है।
2024 लोकसभा चुनाव ने दिया नया संकेत
2024 लोकसभा चुनाव में बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के हरेंद्र सिंह मलिक को 1,16,151 वोट मिले, जबकि भाजपा के संजीव बालियान को 1,00,075 वोट मिले। यानी विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर सपा ने भाजपा पर 16,076 वोट की बढ़त बनाई थी।
यह आंकड़ा 2027 के लिहाज से इसलिए अहम है क्योंकि 2022 में सपा और रालोद साथ थे, जबकि अब रालोद NDA में है।
अब सवाल यह होगा कि 2022 में राजपाल बालियान के पक्ष में आए जाट और मुस्लिम मतों का वही सामाजिक गठजोड़ बरकरार रहता है या गठबंधन बदलने के साथ वोट भी अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं।
2027 में बुढ़ाना का सबसे बड़ा चुनावी सवाल
2027 में यहां मुकाबला केवल भाजपा बनाम सपा नहीं होगा। असली प्रश्न होगा—रालोद के गठबंधन बदलने के बाद बुढ़ाना का जाट-मुस्लिम समीकरण किस दिशा में जाएगा?
रालोद अगर NDA में बुढ़ाना सीट अपने पास रखता है तो उसे अपने पारंपरिक जाट वोट के साथ भाजपा के गैर-जाट OBC, सवर्ण और अन्य समर्थक समूहों का लाभ मिल सकता है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी की कोशिश मुस्लिम मतदाताओं के साथ जाट, गुर्जर, दलित और पिछड़े वर्गों में सेंध लगाने की होगी।
बसपा के लिए जाटव वोट महत्वपूर्ण रहेगा। यदि बसपा मजबूत उम्मीदवार उतारती है तो जाटव और मुस्लिम वोट में विभाजन मुख्य मुकाबले का परिणाम बदल सकता है।
ब्राह्मण, ठाकुर और त्यागी वोट भी निर्णायक
पुराने अनुमानों में बुढ़ाना में करीब 25 हजार ब्राह्मण, 20 हजार ठाकुर और करीब 10 हजार त्यागी मतदाता बताए गए थे। ये समुदाय अकेले सीट का परिणाम तय नहीं करते, लेकिन करीबी मुकाबले में इनका संयुक्त रुख महत्वपूर्ण हो जाता है।
भाजपा को पिछले चुनावों में इन समूहों का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन स्थानीय उम्मीदवार, किसान मुद्दे और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण हर चुनाव में वोटिंग पैटर्न को प्रभावित करते रहे हैं।
बुढ़ाना में किसान राजनीति सबसे बड़ा सामाजिक कॉमन फैक्टर
जाति से अलग बुढ़ाना की राजनीति में खेती और किसान सबसे बड़ा साझा मुद्दा है। गन्ना मूल्य, भुगतान, बिजली, सिंचाई, ग्रामीण सड़कें, रोजगार और किसान संगठनों की भूमिका यहां सीधे चुनाव को प्रभावित करती है।
जाट, गुर्जर, मुस्लिम किसान, त्यागी और दूसरे कृषि आधारित समुदाय अलग-अलग सामाजिक पहचान रखते हैं, लेकिन कृषि से जुड़े मुद्दे कई बार उन्हें एक साझा चुनावी मंच पर भी ले आते हैं।
इसी कारण बुढ़ाना में जातीय गणित के साथ किसान राजनीति को समझे बिना चुनावी तस्वीर पूरी नहीं होती।
बुढ़ाना विधानसभा का राजनीतिक इतिहास
बुढ़ाना विधानसभा का इतिहास मौजूदा परिसीमन से काफी पुराना है। यह सीट 1957 में अस्तित्व में आई थी। इसके बाद 1958 में उपचुनाव हुआ और 1962 में भी यहां चुनाव हुआ। बाद में सीट समाप्त हो गई और परिसीमन के बाद 2008 में इसका मौजूदा स्वरूप बना। 2012 में नई परिसीमन व्यवस्था के तहत यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ।
पुराने चुनावों में निर्दलीय, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी तक यहां जीत दर्ज कर चुकी है। आधुनिक दौर में सपा, भाजपा और रालोद—तीनों दल इस सीट पर जीत चुके हैं।
मौजूदा विधायक राजपाल सिंह बालियान का राजनीतिक सफर
राजपाल सिंह बालियान पहली बार 1996 में तत्कालीन खतौली विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे। 2002 में उन्होंने दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीता। परिसीमन के बाद 2012 में बुढ़ाना से चुनाव लड़ा, लेकिन सपा के नवाजिश आलम से हार गए।
2022 में उन्होंने फिर बुढ़ाना से चुनाव लड़कर भाजपा विधायक उमेश मलिक को हराया और तीसरी बार विधानसभा पहुंचे।
2022 की यह जीत विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि 2017 में भाजपा ने बुढ़ाना पर कब्जा किया था और पांच साल बाद रालोद ने सीट वापस जीत ली।
शामली और बुढ़ाना के सामाजिक समीकरण में समानता
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शामली विधानसभा जातीय समीकरण और बुढ़ाना के चुनावी गणित में कुछ समान सामाजिक कारक दिखाई देते हैं। दोनों क्षेत्रों में मुस्लिम, जाट, दलित और विभिन्न OBC समूहों का रुख चुनावी नतीजों पर प्रभाव डालता है। हालांकि बुढ़ाना मुजफ्फरनगर जिले की सीट है और इसका जातीय तथा स्थानीय राजनीतिक गणित अलग-अलग गांवों और क्षेत्रों के आधार पर बदलता है।
403 विधानसभा सीटों के जातिगत समीकरण
बुढ़ाना के अलावा प्रदेश की बाकी सीटों की सामाजिक और चुनावी संरचना जानने के लिए उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा के जातिगत समीकरण पर विधानसभा-वार जानकारी देखी जा सकती है।
2027 विधानसभा चुनाव में बुढ़ाना पर रहेगी नजर
रालोद के NDA में जाने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर 2022 से काफी अलग हो चुकी है। बुढ़ाना उन सीटों में शामिल है जहां नए गठबंधन का सबसे बड़ा परीक्षण हो सकता है। रालोद जुलाई 2026 तक भाजपा सहयोगी के रूप में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटा है।
2027 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों, सीटों और चुनावी रणनीतियों पर लगातार अपडेट सामने आ रहे हैं। जुलाई 2026 तक चुनाव की आधिकारिक तारीखों की घोषणा नहीं हुई है।
बुढ़ाना में 2027 की लड़ाई का केंद्र जाट-मुस्लिम वोटों का नया बंटवारा, दलित और गैर-जाट OBC मतदाताओं का रुख, किसान राजनीति और उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़ होगी। 2022 में जिस गठबंधन ने राजपाल बालियान को जीत दिलाई थी, वह अब अस्तित्व में नहीं है। ऐसे में करीब 3.61 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर पुराने जातीय आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि नए गठबंधनों के साथ सामाजिक समूह किस दिशा में जाते हैं।
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