मुरादाबाद जिले की कुंदरकी विधानसभा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे दिलचस्प चुनावी सीटों में शामिल है। Kundarki Assembly Caste Equations की बात करें तो मुस्लिम मतदाता यहां सबसे बड़ा जाति, OBC, ठाकुर-राजपूत, वैश्य और दूसरे ग्रामीण समुदाय चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं। 2026 की अंतिम SIR मतदाता सूची के मुताबिक कुंदरकी विधानसभा में कुल 3,69,186 मतदाता दर्ज हैं। इनमें 2,01,772 पुरुष, 1,67,403 महिला और 11 अन्य मतदाता शामिल हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 राज्य की आगामी राजनीतिक दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

कुंदरकी विधानसभा का चुनावी इतिहास जितना दिलचस्प है, 2024 का उपचुनाव उससे भी ज्यादा चौंकाने वाला रहा। समाजवादी पार्टी ने 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन चुनाव जीते थे। 2022 में सपा ने भाजपा को 43,162 वोटों से हराया, लेकिन नवंबर 2024 के उपचुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भाजपा के रामवीर सिंह ने 1,70,371 वोट हासिल कर सपा उम्मीदवार मोहम्मद रिजवान को 1,44,791 वोट से हराया। भाजपा को 76.71 प्रतिशत वोट मिले।

कुंदरकी को 2027 के चुनाव में खास बनाता है। क्या 2024 का नतीजा स्थायी सामाजिक बदलाव का संकेत था या उपचुनाव की अलग परिस्थितियों का असर? इसका जवाब 2027 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों की दिशा, OBC और दलित मतदाताओं के रुख तथा भाजपा-सपा के प्रत्याशी चयन से मिलेगा।

कुंदरकी विधानसभा एक नजर में

विवरणजानकारी
विधानसभाकुंदरकी
विधानसभा संख्या29
जिलामुरादाबाद
लोकसभा क्षेत्रसंभल
आरक्षणसामान्य
वर्तमान विधायकरामवीर सिंह
वर्तमान विधायक की पार्टीभारतीय जनता पार्टी
पिछला चुनाव2024 विधानसभा उपचुनाव
2024 उपचुनाव विजेतारामवीर सिंह
2024 जीत का अंतर1,44,791 वोट
2026 कुल मतदाता3,69,186
प्रमुख सामाजिक समूहमुस्लिम, दलित, OBC, ठाकुर-राजपूत, वैश्य
क्षेत्रीय स्वरूपमुख्य रूप से ग्रामीण
प्रमुख चुनावी मुद्देकृषि, रोजगार, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास

कुंदरकी विधानसभा मुरादाबाद जिले में आती है, लेकिन संसदीय चुनाव में यह संभल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। 2024 के उपचुनाव के बाद भाजपा के रामवीर सिंह यहां से विधायक हैं। उन्होंने इससे पहले 2012 और 2017 में भी कुंदरकी से चुनाव लड़ा था, लेकिन दोनों बार सपा के मोहम्मद रिजवान से हार गए थे। 2024 में तीसरी कोशिश में उन्हें बड़ी जीत मिली। rki Assembly Caste Equations: मुस्लिम बहुल सीट, लेकिन गणित अब ज्यादा जटिल

Kundarki Assembly Caste Equations में सबसे बड़ा फैक्टर मुस्लिम वोट माना जाता है। 2024 के उपचुनाव से पहले उपलब्ध चुनावी आकलन में करीब 3.83 लाख मतदाताओं में लगभग 2.23 लाख मुस्लिम मतदाता, यानी करीब 62 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई थी। हालांकि यह 2026 की आधिकारिक धर्मवार मतदाता संख्या नहीं है। SIR के बाद कुल मतदाता संख्या बदलकर 3,69,186 हो चुकी है, इसलिए पुराने 62 प्रतिशत अनुपात को नई सूची पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा।

आकलनों में भी कुंदरकी को मुस्लिम बहुल विधानसभा बताते हुए वैश्य, OBC और अनुसूचित जाति मतदाताओं की अच्छी मौजूदगी का उल्लेख किया गया है। ुनाव से पहले तक सामान्य धारणा यही थी कि मुस्लिम मतों की दिशा कुंदरकी में विजेता तय करती है। लेकिन उपचुनाव में भाजपा की रिकॉर्ड जीत ने यह दिखाया कि प्रत्याशी, स्थानीय सामाजिक समीकरण, मतदान का पैटर्न और अलग-अलग समुदायों में समर्थन का वितरण भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

कुंदरकी विधानसभा का अनुमानित सामाजिक समीकरण

सामाजिक समूहचुनावी भूमिका
मुस्लिमसबसे बड़ा और निर्णायक सामाजिक समूह
अनुसूचित जाति/दलितमहत्वपूर्ण वोट बैंक
OBCकई जातियों में बंटा बड़ा ग्रामीण वोट
ठाकुर/राजपूतभाजपा के लिए महत्वपूर्ण, मौजूदा विधायक भी इसी समुदाय से
वैश्यस्थानीय बाजार और कारोबारी क्षेत्रों में प्रभाव
यादवसपा के पारंपरिक सामाजिक आधार में महत्वपूर्ण
सैनी व अन्य गैर-यादव OBCभाजपा-सपा दोनों के लिए अहम
कश्यप, प्रजापति व अन्य पिछड़े वर्गबूथ स्तर पर करीबी मुकाबलों में निर्णायक

नोट: विधानसभा स्तर पर सभी जातियों की वर्तमान आधिकारिक मतदाता संख्या उपलब्ध नहीं है। इसलिए ऊपर दिया गया सामाजिक वर्गीकरण पुराने चुनावी आकलनों, जनसांख्यिकीय संकेतों और क्षेत्र की राजनीतिक संरचना पर आधारित है।

2026 में कुंदरकी विधानसभा में 3,69,186 मतदाता

2026 की अंतिम SIR मतदाता सूची के मुताबिक कुंदरकी विधानसभा में 3,69,186 मतदाता हैं। पुरुष मतदाताओं की संख्या 2,01,772 और महिला मतदाताओं की संख्या 1,67,403 है। 11 मतदाता अन्य श्रेणी में दर्ज हैं। वर्गमतदाता संख्या
पुरुष2,01,772
महिला1,67,403
अन्य11
कुल3,69,186

SIR प्रक्रिया के दौरान कुंदरकी में नए नाम जोड़ने के लिए 25,487 आवेदन आए थे। इनमें 24,001 नए नाम स्वीकार किए गए। इसके अलावा 6,777 संशोधन आवेदन भी आए। यह आंकड़ा दिखाता है कि 2027 के चुनाव से पहले मतदाता सूची में नया वोटर आधार भी जुड़ा है। है कि 2017, 2022 या 2024 में इस्तेमाल किए गए जातिवार वोटर आंकड़ों को सीधे 2027 पर लागू करना सही नहीं होगा। बूथ स्तर पर नए मतदाताओं और हटे नामों के कारण सामाजिक अनुपात में भी बदलाव संभव है।

मुस्लिम वोटों की ताकत कितनी?

कुंदरकी के चुनावी इतिहास में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से सबसे महत्वपूर्ण रही है। पुराने अनुमान में करीब 62 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता बताए गए थे। 2024 उपचुनाव से पहले लगभग 2.23 लाख मुस्लिम वोटरों का अनुमान सामने आया था। 17 और 2022 में समाजवादी पार्टी की लगातार जीत को इसी मजबूत सामाजिक आधार से जोड़कर देखा जाता रहा।

2012 में मोहम्मद रिजवान ने सपा के टिकट पर भाजपा के रामवीर सिंह को 17,201 वोटों से हराया। 2017 में दोनों फिर आमने-सामने आए और रिजवान ने 10,821 वोटों से जीत दर्ज की। 2022 में सपा ने जियाउर्रहमान बर्क को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने भाजपा के कमल कुमार को 43,162 वोटों से हराया। तार तीन चुनावों तक सपा का सामाजिक समीकरण सफल रहा।

लेकिन 2024 के उपचुनाव ने इस धारणा को चुनौती दी कि मुस्लिम बहुलता अपने आप किसी एक दल की जीत सुनिश्चित कर देती है।

2024 उपचुनाव ने बदल दिया पुराना चुनावी गणित

2024 में जियाउर्रहमान बर्क के संभल से लोकसभा सांसद चुने जाने के बाद कुंदरकी सीट खाली हुई। उपचुनाव में भाजपा ने रामवीर सिंह को प्रत्याशी बनाया, जबकि सपा ने पूर्व विधायक मोहम्मद रिजवान पर दांव लगाया।

नतीजा पिछले सभी चुनावों से बिल्कुल अलग रहा।

रामवीर सिंह को 1,70,371 वोट, जबकि मोहम्मद रिजवान को केवल 25,580 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 1,44,791 वोट रहा। आजाद समाज पार्टी के चांद बाबू 14,201 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। वारपार्टीवोटवोट शेयर
रामवीर सिंहभाजपा1,70,37176.71%
मोहम्मद रिजवानसपा25,58011.52%
चांद बाबूआजाद समाज पार्टी14,2016.39%
अन्यविभिन्नशेष
जीत का अंतर1,44,791

उपचुनाव में कुल 12 प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें 11 मुस्लिम उम्मीदवार थे। ऐसे में विपक्षी वोटों का बंटवारा और रामवीर सिंह की स्थानीय पकड़ चुनावी चर्चा के बड़े विषय बने। उपचुनाव और सामान्य विधानसभा चुनाव की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए 2024 के परिणाम को 2027 की निश्चित तस्वीर मानना जल्दबाजी होगी।

2022 में सपा ने 43 हजार से ज्यादा वोट से जीती थी सीट

2024 उपचुनाव से सिर्फ दो साल पहले तस्वीर पूरी तरह उलट थी।

2022 विधानसभा चुनाव में सपा के जियाउर्रहमान बर्क को 1,25,792 वोट मिले थे। भाजपा के कमल कुमार को 82,630 वोट मिले और बसपा के मोहम्मद रिजवान 42,742 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

सपा ने भाजपा को 43,162 वोटों से हराया था। वारपार्टीवोटवोट प्रतिशत
जियाउर्रहमान बर्कसपा1,25,79246.29%
कमल कुमारभाजपा82,63030.41%
मोहम्मद रिजवानबसपा42,74215.73%
मोहम्मद वारिसAIMIM14,2515.25%

इस चुनाव में मुस्लिम वोट पूरी तरह एक तरफ नहीं था। बसपा और AIMIM प्रत्याशियों को मिलाकर करीब 57 हजार वोट मिले, इसके बावजूद सपा ने बड़े अंतर से चुनाव जीता।

इससे यह संकेत मिलता है कि 2022 में सपा को मुस्लिम मतों के अलावा दूसरे सामाजिक समूहों से भी पर्याप्त समर्थन मिला था।

2017 में सिर्फ 10,821 वोट से हारे थे रामवीर सिंह

2017 में सपा के मोहम्मद रिजवान और भाजपा के रामवीर सिंह के बीच सीधी और कड़ी लड़ाई हुई थी।

मोहम्मद रिजवान को 1,10,561 वोट मिले और रामवीर सिंह ने 99,740 वोट हासिल किए। सपा की जीत का अंतर केवल 10,821 वोट था। बसपा के अकबर हुसैन को 36,071 वोट मिले। वारपार्टीवोट
मोहम्मद रिजवानसपा1,10,561
रामवीर सिंहभाजपा99,740
अकबर हुसैनबसपा36,071
जीत का अंतर10,821

2017 में भाजपा भले चुनाव हार गई थी, लेकिन लगभग एक लाख वोट हासिल करके उसने स्पष्ट कर दिया था कि मुस्लिम बहुल मानी जाने वाली कुंदरकी सीट पर उसका भी मजबूत आधार मौजूद है।

2024 में इसी रामवीर सिंह ने रिकॉर्ड अंतर से सीट जीती।

अनुसूचित जाति के मतदाता भी अहम

उपलब्ध पुराने सामाजिक आकलनों में कुंदरकी में अनुसूचित जाति मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 12.42 प्रतिशत बताई गई है। इसे 2026 का आधिकारिक मतदाता प्रतिशत नहीं माना जा सकता, लेकिन यह दलित वोट बैंक की चुनावी अहमियत बताने के लिए पर्याप्त है। ं पर बसपा की पारंपरिक दावेदारी रही है। वहीं हाल के चुनावों में भाजपा, सपा और आजाद समाज पार्टी भी इस वोट बैंक के अलग-अलग हिस्सों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करती रही हैं।

2024 उपचुनाव में आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार को 14,201 वोट मिलना भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। में दलित वोट बसपा, आजाद समाज पार्टी, भाजपा और सपा के बीच बंटता है तो यह मुख्य मुकाबले का अंतर तय कर सकता है।

OBC मतदाता किसके साथ जाएंगे?

कुंदरकी के गैर-मुस्लिम वोटों में OBC समुदाय बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह वोट किसी एक जाति में केंद्रित नहीं है। यादव, सैनी, कश्यप, प्रजापति और दूसरे पिछड़े समुदाय अलग-अलग इलाकों में प्रभाव रखते हैं।

सपा के लिए यादव मतदाता उसका पारंपरिक आधार माने जाते हैं, लेकिन कुंदरकी जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में पार्टी की मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह दूसरे पिछड़े समूहों में कितना समर्थन हासिल करती है।

दूसरी तरफ भाजपा की रणनीति गैर-यादव OBC, दलित और सवर्ण मतों को व्यापक सामाजिक गठबंधन में जोड़ने की रही है।

2024 में भाजपा का 76 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर बताता है कि उपचुनाव में पार्टी को अपने परंपरागत वोट से काफी आगे समर्थन मिला। लेकिन 2027 में वही पैटर्न दोहराया जाएगा या मतदाता दोबारा सामान्य चुनाव वाले पुराने ढांचे में लौटेंगे, यही इस सीट का सबसे बड़ा सवाल होगा।

ठाकुर-राजपूत वोट और रामवीर सिंह का फैक्टर

कुंदरकी के वर्तमान विधायक रामवीर सिंह ठाकुर-राजपूत समाज से आते हैं और क्षेत्र में उनका लंबा राजनीतिक नेटवर्क रहा है। वह 1993 से भाजपा से जुड़े रहे हैं और 2012 तथा 2017 में कुंदरकी से चुनाव लड़ चुके थे। नी भी स्थानीय राजनीति में सक्रिय रही हैं और ब्लॉक प्रमुख रह चुकी हैं। इससे परिवार की पंचायत और ग्रामीण राजनीति में पुरानी मौजूदगी रही है।

2012 और 2017 में लगातार हार के बावजूद रामवीर सिंह ने क्षेत्र में राजनीतिक सक्रियता बनाए रखी। 2024 में उनकी बड़ी जीत ने उन्हें कुंदरकी में भाजपा का सबसे प्रमुख चेहरा बना दिया।

2027 में यदि भाजपा उन्हें दोबारा मैदान में उतारती है तो प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ और सामाजिक संबंध पार्टी के जातीय समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे।

कुंदरकी में ग्रामीण मतदाता सबसे ज्यादा

कुंदरकी का राजनीतिक चरित्र मुख्य रूप से ग्रामीण है। पुराने चुनावी प्रोफाइल में लगभग 93.36 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े बताए गए हैं, जबकि शहरी हिस्सेदारी करीब 6.64 प्रतिशत आंकी गई थी। रीय स्वरूपअनुमानित हिस्सेदारी
ग्रामीण93.36%
शहरी6.64%

इस वजह से जातीय समीकरण के साथ किसान मुद्दों की भूमिका भी बड़ी है।

खेती, सिंचाई, बिजली, सड़क, फसल मूल्य, गन्ना भुगतान, खाद-बीज, रोजगार और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं चुनावी प्राथमिकताओं में रहती हैं।

किसान परिवारों में जाति के साथ आर्थिक मुद्दे भी वोटिंग व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि ग्रामीण बूथों पर प्रत्याशी की व्यक्तिगत पहुंच और स्थानीय संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।

कुंदरकी विधानसभा का चुनावी इतिहास

कुंदरकी किसी एक पार्टी की स्थायी सीट नहीं रही है। कांग्रेस, भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा, बसपा और समाजवादी पार्टी अलग-अलग समय में यहां चुनाव जीत चुके हैं।

हाल के वर्षों में सपा सबसे मजबूत पार्टी बनकर उभरी थी। 2012 में मोहम्मद रिजवान ने पार्टी के लिए सीट जीती। 2017 में उन्होंने दोबारा जीत हासिल की और 2022 में जियाउर्रहमान बर्क ने सपा की जीत का सिलसिला जारी रखा।

भाजपा को इससे पहले 1993 में सफलता मिली थी। इसके बाद पार्टी को सीट वापस जीतने के लिए करीब तीन दशक इंतजार करना पड़ा और 2024 उपचुनाव में रामवीर सिंह ने यह इंतजार खत्म किया।विजेतापार्टीजीत का अंतर
2007अकबर हुसैनबसपा9,270
2012मोहम्मद रिजवानसपा17,201
2017मोहम्मद रिजवानसपा10,821
2022जियाउर्रहमान बर्कसपा43,162
2024 उपचुनावरामवीर सिंहभाजपा1,44,791

यह इतिहास बताता है कि कुंदरकी में चुनावी परिणाम जातीय समीकरण के साथ प्रत्याशी और राजनीतिक माहौल से भी तेजी से बदल सकते हैं।

2024 लोकसभा चुनाव में सपा आगे, कुछ महीने बाद उपचुनाव में भाजपा

कुंदरकी की राजनीति को समझने के लिए 2024 का साल सबसे महत्वपूर्ण है।

लोकसभा चुनाव में कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र से सपा उम्मीदवार जियाउर्रहमान बर्क को 1,43,415 वोट मिले थे। भाजपा उम्मीदवार को 86,371 वोट मिले। यानी लोकसभा चुनाव में सपा इस विधानसभा क्षेत्र में करीब 57 हजार वोट आगे रही। महीने बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में भाजपा 1.44 लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत गई।

2024 चुनावसपाभाजपाबढ़त
लोकसभा चुनाव का कुंदरकी सेगमेंट1,43,41586,371सपा +57,044
विधानसभा उपचुनाव25,5801,70,371भाजपा +1,44,791

दोनों नतीजों के बीच इतना बड़ा अंतर इस बात का संकेत है कि कुंदरकी में मतदान व्यवहार को केवल स्थायी जातीय वोट बैंक से नहीं समझा जा सकता।

सामान्य चुनाव और उपचुनाव की अलग परिस्थितियां, प्रत्याशी, मतदान प्रतिशत, स्थानीय समीकरण और मतों का विभाजन नतीजे को बड़े स्तर पर प्रभावित कर सकते हैं।

समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती 2024 उपचुनाव के झटके के बाद अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को फिर से मजबूत करना है।

2012 से 2022 तक लगातार तीन विधानसभा चुनावों की जीत बताती है कि पार्टी का इस क्षेत्र में मजबूत संगठन और वोट आधार रहा है।

सपा की पहली कोशिश मुस्लिम मतों को अधिकतम स्तर पर एकजुट रखने की होगी। इसके साथ यादव, दलित और अन्य पिछड़े समुदायों में समर्थन बढ़ाना जरूरी होगा।

2022 में पार्टी 46.29 प्रतिशत वोट लेकर जीती थी। इसलिए उसके लिए 2024 उपचुनाव से पहले का चुनावी आधार पूरी तरह समाप्त मान लेना उचित नहीं होगा।

प्रत्याशी चयन भी बेहद महत्वपूर्ण होगा। मुस्लिम मतदाता संख्या अधिक होने के बावजूद अलग-अलग उम्मीदवारों और स्थानीय समूहों के बीच वोटों का बंटवारा सपा के लिए चुनौती बन सकता है।

भाजपा के लिए 2024 की जीत को 2027 में दोहराने की चुनौती

भाजपा ने 2024 में ऐसा परिणाम दिया जिसकी इस सीट पर लंबे समय तक कल्पना भी मुश्किल मानी जाती थी।

लेकिन 2027 का विधानसभा चुनाव उपचुनाव से अलग होगा। मतदान का स्तर, राजनीतिक माहौल और प्रत्याशियों की संख्या सभी बदल सकते हैं।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती 2024 में तैयार हुए सामाजिक गठबंधन को बनाए रखना होगी।

रामवीर सिंह की स्थानीय पकड़ के साथ ठाकुर-राजपूत, OBC, दलित और वैश्य मतदाताओं में मजबूत समर्थन पार्टी का आधार बन सकता है। इसके अलावा भाजपा यह भी कोशिश करेगी कि उसे मुस्लिम समुदाय के किसी हिस्से से मिला समर्थन अगर 2024 में वास्तविक रूप से बना था तो वह आगे भी कायम रहे।

यदि भाजपा गैर-मुस्लिम वोटों के बड़े हिस्से के साथ मुस्लिम मतों में भी कुछ समर्थन हासिल करती है तो वह मजबूत स्थिति में होगी।

बसपा और आजाद समाज पार्टी भी बदल सकती हैं गणित

कुंदरकी में तीसरे दल का प्रदर्शन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है।

2022 में बसपा के मोहम्मद रिजवान को 42,742 वोट और AIMIM को 14,251 वोट मिले थे। इसके बावजूद सपा जीती थी। 2024 में आजाद समाज पार्टी के चांद बाबू ने 14,201 वोट हासिल किए। में बसपा या आजाद समाज पार्टी मजबूत प्रत्याशी उतारती है तो दलित वोटों के साथ मुस्लिम मतदाताओं के कुछ हिस्से के लिए भी मुकाबला बढ़ सकता है।

इसका सीधा असर सपा पर पड़ सकता है। वहीं यदि दलित मतदाता भाजपा से वापस बसपा या आजाद समाज पार्टी की ओर जाते हैं तो भाजपा का 2024 वाला गठबंधन भी कमजोर हो सकता है।

इसलिए कुंदरकी में तीसरे और चौथे स्थान के उम्मीदवार भी विजेता तय करने की क्षमता रखते हैं।

2027 में इन छह समीकरणों से तय हो सकती है कुंदरकी की सीट

2027 के विधानसभा चुनाव में कुंदरकी की राजनीति छह प्रमुख सवालों के आसपास घूम सकती है।

सबसे बड़ा सवाल मुस्लिम मतदाताओं का होगा। 2024 उपचुनाव में दिखाई दिए मतदान पैटर्न के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सामान्य विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट किस दिशा में जाता है।

दूसरा, भाजपा 2024 में मिले व्यापक समर्थन को कितना बनाए रख पाती है।

तीसरा, सपा 2012 से 2022 तक वाले अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से वापस खड़ा करती है।

चौथा, दलित मतदाता बसपा, आजाद समाज पार्टी, भाजपा और सपा में किस तरह बंटते हैं।

पांचवां, OBC वोटों का रुख होगा। सैनी, यादव, कश्यप, प्रजापति और दूसरे पिछड़े समुदाय कई ग्रामीण बूथों पर जीत-हार का अंतर तय कर सकते हैं।

छठा फैक्टर 2026 की नई वोटर लिस्ट होगी। अब कुंदरकी में 3,69,186 मतदाता हैं और हजारों नए मतदाता भी सूची में जुड़े हैं। इसलिए पुराना बूथवार गणित नए सिरे से तैयार करना होगा। का 2027 चुनाव इसलिए केवल भाजपा और सपा के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि 2024 उपचुनाव में दिखा बड़ा राजनीतिक बदलाव स्थायी था या सीट अपने पुराने सामाजिक चुनावी पैटर्न की ओर लौटती है।

उत्तर प्रदेश की बाकी सीटों की सामाजिक संरचना और चुनावी गणित जानने के लिए उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा के जातिगत समीकरण पर विस्तृत जानकारी पढ़ी जा सकती है।

प्रत्याशियों, गठबंधन, टिकट वितरण और सीटवार राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े अपडेट के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव की विस्तृत कवरेज पढ़ें।

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