गरीबी को पछाड़ कॉमनवेल्थ में चमके नासिक के दिलिप गावित, जानें महाराष्ट्र के लाल की संघर्ष और सफलता की कहानी

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    गोरक्ष पोफली

Updated On: Aug 02, 2026 | 02:40 PM IST

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सार

Dilip Gavit Nashik: नासिक के छोटे से गांव तोरण डोंगरी से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने वाले दिलीप गावित की संघर्ष और सफलता से भरी प्रेरणादायक कहानी पढ़ें।

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दिलीप गावित की फोटो (सोर्स: एआई फोटो)

विस्तार

Dilip Gavit Commonwealth Games: 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स में जब भारत के दिलिप महादु गावित ने फिनिश लाइन पार की, तो उन्होंने न केवल गोल्ड जीता, बल्कि इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा दिया। नासिक के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिरंगा लहराने वाले दिलिप गावित की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। उन्होंने पुरुषों की 100 मीटर T47 स्पर्धा में न केवल पहला स्थान हासिल किया, बल्कि भारत को इस खेल में एक ऐतिहासिक 1-2 (गोल्ड और ब्रोन्ज) फिनिश भी दिलाई।

ग्लासगो में आयोजित इन खेलों में दिलिप गावित ने 10.71 सेकंड का समय निकालकर खेलों का नया रिकॉर्ड बनाया। यह उनका इस सीजन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी था। उनके साथ भारत के ही मोहम्मद बासिल ने 10.83 सेकंड के साथ रजत पदक जीतकर इस पल को भारत के लिए और भी यादगार बना दिया। दिलिप गावित कॉमनवेल्थ गेम्स के एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष पैरा-एथलीट बन गए हैं।

यह जीत और भी विशेष इसलिए थी क्योंकि मुकाबला बारिश से भीगी हुई ट्रैक पर था, जिससे दौड़ना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया था। अपनी जीत के बाद दिलिप ने स्वीकार किया कि उनकी शुरुआत थोड़ी धीमी थी, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने रफ्तार पकड़ी और जीत हासिल की।

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जब एक हादसे ने बदल दी जिंदगी

दिलिप का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास तोरण डोंगरी नामक एक छोटे से गांव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। उनका बचपन खेतों में माता-पिता की मदद करते हुए बीता। जब वे मात्र 5-6 साल के थे, तब एक पेड़ से गिरने के कारण उनके दाहिने हाथ में गंभीर चोट लग गई थी।

उस समय गांव में उचित और समय पर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण उनकी चोट गैंग्रीन में बदल गई, जिसके कारण डॉक्टरों को कोहनी के नीचे से उनका हाथ काटना पड़ा। एक छोटे बच्चे के लिए यह एक बहुत बड़ा आघात था, लेकिन दिलिप ने अपनी इस शारीरिक अक्षमता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

गांव की धूल भरी सड़कों से प्रोफेशनल ट्रैक तक

दिलिप के भीतर दौड़ने का जज्बा शुरू से ही था। वे अपने गांव की धूल भरी सड़कों पर अभ्यास किया करते थे। उनकी प्रतिभा को कोच वैजनाथ काले ने पहचाना, जिन्होंने उनके माता-पिता को उन्हें प्रोफेशनल ट्रेनिंग के लिए भेजने के लिए मनाया।

शुरुआत में दिलिप को पैरा-प्रतियोगिताओं के बारे में जानकारी नहीं थी और वे सामान्य एथलीटों के साथ ही प्रतिस्पर्धा करते थे। उन्होंने पुणे में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स में सामान्य एथलीटों के खिलाफ दो पदक जीतकर सबको चौंका दिया था। नासिक में मिली ट्रेनिंग ने उनके करियर को एक नई दिशा दी और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे।

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पुरानी सफलताएं और भविष्य का लक्ष्य

यह पहली बार नहीं है जब दिलिप ने भारत का मान बढ़ाया हो। उन्होंने 2022 के एशियाई पैरा खेलों में 400 मीटर T47 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के पदकों का शतक पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके अलावा, वे पेरिस 2024 पैरालंपिक के फाइनल तक भी पहुंचे थे।

अब दिलिप की नजरें LA28 पैरालंपिक पर टिकी हैं। उनका कहना है कि वे अभी किसी नौकरी के बारे में नहीं सोच रहे हैं, उनका एकमात्र लक्ष्य भारत के लिए और अधिक पदक जीतना है। केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने भी उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि की सराहना करते हुए उन्हें चैंपियन बताया है। दिलिप गावित की यह सफलता न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है कि कैसे दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत से विपरीत परिस्थितियों को भी मात दी जा सकती है।

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