नागपुर के सरकारी अस्पतालों का कड़वा सच: परिजनों के भरोसे स्ट्रेचर, हाई कोर्ट ने पूछा-कितने पद हैं खाली?
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Written By:
अंकिता पटेल
Updated On: Aug 02, 2026 | 03:53 PM IST
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सार
Nagpur Hospitals Attendants: नागपुर हाई कोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में अटेंडेंट की कमी पर संज्ञान लेते हुए स्वीकृत और रिक्त पदों, अटेंडेंट की संख्या व मरीजों के फुटफॉल का पूरा ब्योरा तलब किया है।

नागपुर के सरकारी अस्पतालों में अटेंडेंट की कमी (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
विस्तार
Nagpur Government Hospital Staff: नागपुर सहित विदर्भ के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में हो रही लापरवाही पर बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने गंभीर रुख अपनाया है।
अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में अटेंडेंट नहीं होने के कारण स्ट्रेचर और व्हीलचेयर उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को उनके परिजनों द्वारा एक वार्ड से दूसरे वार्ड तक ले जाने की मजबूरी सामने आने पर न्यायालय ने इसे गंभीर विषय मानते हुए विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की खंडपीठ ने विदर्भ के सभी सरकारी अस्पतालों को कर्मचारियों की स्थिति से जुड़ी विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
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अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा है कि अस्पतालों में कुल कितने पद स्वीकृत हैं, उनमें से कितने पद खाली हैं और अटेंडेंट के स्वीकृत एवं रिक्त पदों की वास्तविक स्थिति क्या है।
सरकारी अस्पतालों में स्टाफ कमी क्यों?
सुनवाई के दौरान न्यायालय मित्र अधिवक्ता ईशा ठाकरे ने विभिन्न सरकारी अस्पतालों का दौरा कर तैयार की गई रिपोर्ट अदालत के समक्ष रखी। रिपोर्ट में बताया गया कि अधिकांश अस्पतालों में व्हीलचेयर और स्ट्रेचर जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन मरीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए पर्याप्त अटेंडेंट नहीं हैं। नतीजतन मरीजों के परिजनों को ही स्ट्रेचर और व्हीलचेयर खींचकर अस्पताल के अलग-अलग विभागों तक जाना पड़ता है, जिससे उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अस्पताल प्रशासन यह जानकारी दे कि अटेंडेंट के पद किस वर्ष स्वीकृत किए गए थे और वर्तमान में उन पदों पर कितनी नियुक्तियां हैं। अदालत ने यह भी पूछा है कि प्रत्येक सरकारी अस्पताल में प्रतिदिन और प्रतिमाह औसतन कितने मरीज उपचार के लिए आते हैं, ताकि मरीजों की संख्या के अनुपात में कर्मचारियों की उपलब्धता का आकलन किया जा सके।
अटेंडेंट की कमी पर हाईकोर्ट सख्त, अस्पतालों से मांगी विस्तृत रिपोर्ट
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता डी.पी. ठाकरे ने पक्ष रखते हुए अदालत को आश्वासन दिया कि न्यायालय के आदेश की जानकारी एक सप्ताह के भीतर संबंधित विभागों को भेज दी जाएगी और मांगी गई जानकारी समय पर प्रस्तुत की जाएगी।
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हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सम्मानजनक और समय पर स्वास्थ्य सेवाएं मिलना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि कर्मचारियों की कमी के कारण मरीजों और उनके परिजनों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो इसे गंभीर प्रशासनिक चूक माना जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को निर्धारित की गई है, जिसमें अस्पतालों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर आगे की सुनवाई होगी।
