‘बात 2001 की है। मैं सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात था। पाकिस्तानी सैनिक फायरिंग कर रहे थे। पहाड़ की चोटी पर बने एक बंकर पर ज्यादा फायरिंग आ रही थी। जवानों का हौसला बढ़ाना था। मैं उस बंकर में गया। उसी वक्त एक RPG (रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड) आकर लगा और धमाके

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करीब 34 साल तक भारतीय सेना में सेवा देने वाले रिटायर्ड ब्रिगेडियर प्रवीण कुमार 25 साल पुरानी घटना यूं सुनाते हैं मानों कल की ही बात हो। आज 15 अगस्त है। देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। यह सीमा की रक्षा कर रहे वीर जवानों के पराक्रम को याद करने का अवसर है।

ऐसे में हमने जम्मू-कश्मीर में लंबे समय तक फ्रंट लाइन पर तैनात रहे ब्रिगेडियर प्रवीण कुमार से बात की। उन्होंने बताया कि सैनिक किस जज्बे के साथ देश की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात रहते हैं। पढ़िए रिपोर्ट..।

माइनस 56 डिग्री तापमान, पाकिस्तानी फायरिंग, नहीं डिगा पाया भारत के सैनिकों का हौसला

प्रवीण कुमार मूल रूप से बिहार के जहानाबाद के हैं। उन्होंने कहा, ‘एक सैनिक के लिए रेजिमेंट का झंडा और मातृभूमि की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। भारतीय सेना के जवानों में अदम्य साहस, शौर्य और मनोबल होता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सैनिक अपने मिशन से पीछे नहीं हटता।’

‘इसका उदाहरण मैं अपने साथ घटी एक घटना शेयर कर दे सकता हूं। उस समय मैं यंग मेजर था। सियाचिन ग्लेशियर के पॉइंट 5685 पर तैनात था। पाकिस्तानी सैनिक हम पर गोलीबारी करते। हमलोग भी फायरिंग करते। हमारा एक बंकर पहाड़ की चोटी पर था। वह पाकिस्तानी पोस्ट की सीध में आता था। इसलिए उसपर ज्यादा फायरिंग होती थी।'

'भारी गोलीबारी हो रही थी। एक मेजर और पोस्ट के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में मुझे लगा कि अपने जवानों का हौसला बढ़ाना होगा। मैं बंकर में गया तो एक जवान ने कहा, साहब वे लोग (पाकिस्तानी) बहुत ज्यादा फायरिंग कर रहे हैं। मैं बंकर में खड़ा हुआ और पाकिस्तानियों का सामना किया। जवानों को बताया कि जब तक बंकर है, यहां के सुरक्षा इंतजाम हैं, डरने की जरूरत नहीं है।'

'इसी दौरान पाकिस्तान की ओर से एक RPG मारा गया। धमाके से पूरा बंकर हिल गया। मैं भी अंदर से हिल गया। यही मौका होता है जब नेतृत्व क्षमता की परीक्षा होती है। मैंने जवानों से कहा, देखो मैं यहां हूं। मुझे कुछ नहीं हुआ। इसी तरह तुम्हें भी कुछ नहीं होगा। इसलिए अपना काम करते रहो।'

'सियाचिन में तापमान माइनस 56 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता था। बर्फीला तूफान ऊपर से पाकिस्तानी सैनिकों की गोलीबारी, लेकिन कोई संकट भारत के सैनिकों का हौसला नहीं डिगा सकता।'

दरअसल, 1999 में कारगिल जंग हुई थी। उस वक्त पाकिस्तान के साथ कोई औपचारिक पूर्ण युद्धविराम समझौता नहीं था। 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के चलते तनाव चरम पर था। भारत ने पाकिस्तान से लगी सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी थी। पाकिस्तानी सेना ने सियाचिन ग्लेशियर के साथ-साथ कारगिल और बतलिक क्षेत्रों में भारतीय चौकियों पर फायरिंग की थी। जवाब में भारत की ओर से भी गोलीबारी की गई थी।

साली की शादी के दिन आ गया सीमा के पार ऑपरेशन का कॉल

प्रवीण कुमार ने देश की रक्षा के प्रति सैनिकों के जज्बे संबंधी सवाल पर कहा, 'हमलोग जब मोर्चे पर तैनात होते हैं तो खुद की सुविधा और अपने परिवार की चिंता नहीं करते। हमारे लिए अपना ऑपरेशन और साथी जवान की जान बचाना सबसे अहम होता है। मैं अपने साथी की जान बचाऊंगा, वह मेरी। इसी तरह सभी मिलकर एक टीम की तरह काम करते हैं। ऑपरेशन करना है तो करना है। एक सैनिक अपने टारगेट से नहीं भटकता।'

क्या कभी ऐसा हुआ कि परिवार के पास आए और मोर्चे पर जाने का बुलावा आ गया? इस सवाल पर प्रवीण ने कहा, 'एक सैनिक के जीवन में ऐसे मौके आते रहते हैं। मैं आपको 2002 की घटना सुनाता हूं। सियाचिन ग्लेशियर पर तैनाती के बाद मुझे ब्रिगेड मेजर के तौर पर मध्य प्रदेश की पोस्टिंग पर भेजा गया था। आदेश मिल गया था कि आप जाइए। मैं अपना सारा सामान लेकर मध्य प्रदेश गया। मेरे परिवार के लोग रिश्तेदार के पास रुके थे।'

'तब अचानक मेरे पास बटालियन सियाचिन ग्लेशियर से कॉल आया। लैंड लाइन पर इतना कहा गया, सर आपको वापस आने की जरूरत है। बस इतना ही। मैं जान गया कि कोई खास ऑपरेशन है। हमलोग इसके लिए तैयार रहते हैं। बाद में पता चला कि मुझे लाइन ऑफ कंट्रोल के उस पार जाना था।'

'मैंने कोई बहानेबाजी नहीं की। यह नहीं कि रिपोर्ट किया कि सेहत ठीक नहीं है। मैंने सिर्फ 24 घंटे मांगे। अपने सामान पैक किया और ट्रेन में सवार होकर चल पड़ा। हमलोग पूरी तरह ऑपरेशन के लिए तैयार थे।’

‘जिस दिन मैं ऑपरेशन के लिए जा रहा था, मेरी पत्नी की बहन की शादी थी। ऑपरेशन पर कल निकलना था और रात को कॉल आ गया कि आप नहीं जाएंगे। कुछ रणनीतिक स्थिति को मद्देनजर रखते हुए उस ऑपरेशन को रोक दिया गया। हमलोग पूरी तरह तैयार थे।'

बिहार रेजीमेंट के जवानों को सलाम

2019 के पुलवामा आतंकी हमले में 40 से अधिक सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे। इनमें दो जवान बिहार के थे। प्रवीण कुमार ने बताया कि राष्ट्रीय राइफल्स के हिस्से के रूप में बिहार रेजिमेंट के जवान आतंकियों को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘मैं पुलवामा में रहा हूं। अवंतिपुर में नंबर टू वेक्टर फोर्स का डिप्टी जनरल ऑफिसर कमांडिंग था। पुलवामा, पहलगांव, अवंतिपुर और अनंतनाग ये सब हमारे कार्यक्षेत्र में आते थे। आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में सूचना जुटाना अहम है। इसके लिए अपने लोगों को प्लांट करने से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस तक बहुत से तरीके अपनाए जाते हैं।’

‘हम एंटी टेरर ऑपरेशन लॉन्च करने से पहले स्थिति का आकलन करते हैं। कोशिश रहती है कि हमारे ऑपरेशन से ज्यादा से ज्यादा आतंकी पकड़े जाएं। पुलवामा कश्मीर घाटी में घना बसा इलाका है। ऐसे संवेदनशील और व्यस्त इलाके में ऑपरेशन की चुनौती बढ़ जाती है।’

‘यहां सुरक्षा बलों के सामने आतंकियों को निशाना बनाने के साथ आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी जिम्मेदारी होती है। इसलिए पिन-पॉइंट टारगेटिंग और सीमित बल के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है, ताकि कार्रवाई के दौरान आम लोगों को कम से कम नुकसान हो।’

‘पुलवामा जैसे जम्मू-कश्मीर के चुनौतीपूर्ण इलाकों में रेगुलर आर्मी की जगह राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों की तैनाती है। राष्ट्रीय राइफल्स में रेगुलर आर्मी के जवान हैं। एक कंबाइंड फोर्स है।’

प्रवीण ने कहा, ‘एंटी टेरर ऑपरेशन के लिए इंटेलिजेंस बेहद अहम है। आज सुरक्षा अभियान सिर्फ ह्यूमन इंटेलिजेंस तक सीमित नहीं हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, डिजिटल रिकॉर्ड और संचार के विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं को भी विश्लेषित किया जाता है। सेना, पुलिस और खुफिया एजेंसियां यूनिफाइड कमांड और ज्वाइंट ऑपरेशन सेंटर के तहत सूचनाओं को साझा कर अभियान की रणनीति तैयार करती हैं।’

उन्होंने कहा कि पुलवामा में बिहार रेजीमेंट के जवानों ने भी फ्रंट पर अपनी जिम्मेदारी निभाई और कई सैनिक शहीद हुए। युद्ध या ऑपरेशन के दौरान सैनिक अपने आराम और परिवार की चिंता को पीछे छोड़कर साथियों की सुरक्षा और दिए गए मिशन को प्राथमिकता देता है। उनका कहना है कि बिहार के जवान साहस के साथ फ्रंटलाइन पर अपनी भूमिका निभाते हैं और इसके लिए वे शाबाशी के हकदार हैं।