बिहार में शराबबंदी के बाद भी महिलाओं पर नहीं थम रहे अपराध, नई रिपोर्ट में दावा

Bihar Alcohol Ban 2026: बिहार में शराबबंदी के असर पर आई नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की नई रिपोर्ट ने हलचल बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार पाबंदी के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए हैं.

Bihar Alcohol Ban 2026: बिहार में शराबबंदी के असर पर आई नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की नई रिपोर्ट ने हलचल बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार पाबंदी के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए हैं.

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सांकेतिक तस्वीर Photograph: (AI)

Bihar Alcohol Ban 2026: बिहार में वर्ष 2016 में लागू किए गए पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है. नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की एक नई शोध रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य में शराब पर रोक लगाए जाने के बाद भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कोई कमी नहीं आई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अब इतने वर्षों का पर्याप्त डेटा मौजूद है जिससे यह आंका जा सके कि यह कानून असल में कितना प्रभावी रहा. आंकड़ों के मुताबिक 2016 के बाद से राज्य में महिलाओं के खिलाफ दर्ज होने वाले कुल मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है. इस अध्ययन के सामने आते ही शराबबंदी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर प्रदेश भर में चर्चाएं तेज हो गई हैं.

राजस्व में भारी बढ़ोतरी और नियंत्रित बिक्री का सुझाव

इस अध्ययन रिपोर्ट में बिहार सरकार को पूर्ण शराबबंदी की नीति खत्म करने और इसके स्थान पर नियंत्रित तरीके से शराब की बिक्री शुरू करने का प्रस्ताव दिया गया है. थिंक टैंक का कहना है कि पुरानी आबकारी व्यवस्था को नए नियमों के साथ बहाल करने से राज्य के अपने राजस्व में लगभग 14 से 15 प्रतिशत तक की बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है. रिपोर्ट में इस बात का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है कि पूर्ण पाबंदी के बाद राज्य में अवैध शराब बनाने और उसकी तस्करी का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा हो गया है. इसके साथ ही युवाओं में अन्य नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है और प्रशासन के लिए इस कानून को जमीन पर लागू करना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ है.

अध्ययन के आधार पर समीक्षा की तैयारी में भाजपा

थिंक टैंक की इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पूरे मामले पर बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी है. भाजपा के बिहार प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि उनकी पार्टी इस तरह के शोध अध्ययनों और सुझावों की समय-समय पर समीक्षा करती रहती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी इस नई रिपोर्ट के हर पहलू और उसमें दिए गए आंकड़ों की बारीकी से जांच करेगी. जांच के बाद जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर तय किया जाएगा कि राज्य और जनता के हित में आगे क्या कदम उठाए जाने चाहिए. भाजपा के इस बयान से यह संकेत मिल रहा है कि शराबबंदी के व्यावहारिक पहलुओं पर पुनर्विचार के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हैं.

राजद ने उठाए शुरुआती फैसले पर सवाल

दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल ने भी इस कानून के मौजूदा स्वरूप को लेकर कड़ा रुख दिखाया है. राजद नेता भाई वीरेंद्र ने कहा कि उनकी पार्टी वर्तमान समय में शराबबंदी के इस रूप का समर्थन नहीं करती है. उन्होंने कहा कि जब नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार ने इसे लागू किया था, तब इसे बिना किसी जमीनी सर्वे या ठोस तैयारी के बहुत जल्दबाजी में लागू कर दिया गया था. भाई वीरेंद्र का कहना है कि उस समय उनकी पार्टी भी सरकार का हिस्सा थी, लेकिन योजना को ठीक से तैयार नहीं किया गया था. उनका मानना है कि बिना तैयारी के लिए गए इस फैसले के कारण आज कई तरह की परेशानियां पैदा हो रही हैं.

कानून के भविष्य को लेकर बढ़ती राजनीतिक सुगबुगाहट

बिहार में शराबबंदी एक ऐसा सामूहिक निर्णय था जिसे शुरू में सभी राजनीतिक दलों और मतदाताओं का पूरा समर्थन मिला था. विशेष रूप से महिला मतदाताओं ने इसे सामाजिक सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना था. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में अवैध शराब से होने वाली मौतों, पुलिस पर बढ़ते काम के दबाव और पड़ोसी राज्यों से होने वाली तस्करी ने नीति पर सवाल खड़े किए हैं. अब जब एक प्रतिष्ठित थिंक टैंक ने अपराध और राजस्व से जुड़े स्पष्ट आंकड़े पेश कर दिए हैं, तो शराबबंदी कानून के भविष्य को लेकर राजनीतिक गलियारों में नए समीकरण बनने लगे हैं. आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार इन नए सुझावों पर क्या रुख अपनाती है.

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