Aonla Assembly Caste Equations में लोधी राजपूत, मुस्लिम, अनुसूचित जाति, यादव, मौर्य और कुर्मी मतदाता चुनाव की प्रमुख सामाजिक धुरियां हैं। इनके साथ ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य और दूसरे पिछड़े समुदाय भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 23.50 प्रतिशत और अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी लगभग 15.70 प्रतिशत बताई जाती है, जबकि लोधी राजपूत यहां के सबसे प्रभावशाली OBC समूहों में माने जाते हैं। 2026 की अंतिम मतदाता सूची में आंवला विधानसभा में 2,96,382 मतदाता रह गए हैं। SIR से पहले यहां 3,24,560 मतदाता थे, यानी 28,178 की नेट कमी हुई है।
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के जातिगत समीकरण / जातीय समीकरण और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर चुनावी परिणाम काफी हद तक निर्भर करता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 एक ऐसा निर्णायक अवसर है जो राज्य की दीर्घकालिक राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करेगा।
उत्तर प्रदेश एसआईआर (SIR) की अंतिम सूची 2026 के तहत राज्य के सभी 75 जिलों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप कुल मतदाताओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है।
बरेली जिले के आंवला विधानसभा के 2007 से 2022 तक का तुलनात्मक विश्लेषण, ताज़ा अपडेट, चुनावी इतिहास और पिछले चुनावों के नतीजे
उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के पिछले चुनावी नतीजों का 2007 से 2022 तक तुलनात्मक विश्लेषण, जिसमें प्रत्येक सीट का चुनावी इतिहास, विजेता और उपविजेता प्रत्याशी, मत प्रतिशत, जीत का अंतर और बदलते राजनीतिक समीकरण शामिल हैं।
आंवला विधानसभा संख्या 126 सामान्य यानी अनारक्षित सीट है। यह बरेली जिले में आती है और आंवला लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। वर्तमान विधायक भाजपा के धर्मपाल सिंह हैं। विधानसभा की मौजूदा सदस्य सूची में भी धर्मपाल सिंह को 126-आंवला से भाजपा विधायक के रूप में दर्ज किया गया है। मौजूदा परिसीमन में आंवला नगर पालिका, सिरौली नगर पंचायत तथा आंवला, अलीगंज और सिरौली क्षेत्र के बड़ी संख्या में गांव इस विधानसभा में आते हैं।
आंवला विधानसभा एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| विधानसभा | आंवला |
| विधानसभा संख्या | 126 |
| जिला | बरेली |
| लोकसभा क्षेत्र | आंवला |
| आरक्षण स्थिति | सामान्य |
| वर्तमान विधायक | धर्मपाल सिंह |
| पार्टी | भाजपा |
| 2026 कुल मतदाता | 2,96,382 |
| SIR से पहले मतदाता | 3,24,560 |
| SIR में नेट कमी | 28,178 |
| SIR कमी | 8.68% |
| 2022 विजेता | धर्मपाल सिंह, BJP |
| 2022 उपविजेता | पं. राधा कृष्ण शर्मा, SP |
| 2022 जीत का अंतर | 18,424 वोट |
| 2024 लोकसभा खंड में BJP वोट | 86,570 |
| 2024 लोकसभा खंड में SP वोट | 78,082 |
| 2024 BJP बढ़त | 8,488 वोट |
| मुस्लिम मतदाता | करीब 23.50% |
| अनुसूचित जाति | करीब 15.70% |
| ग्रामीण आबादी | करीब 82.33% |
| शहरी आबादी | करीब 17.67% |
| प्रमुख सामाजिक समूह | लोधी राजपूत, मुस्लिम, SC, यादव, मौर्य, कुर्मी, ठाकुर, ब्राह्मण |
2026 SIR में बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में आंवला में सबसे कम संख्या में मतदाताओं की नेट कटौती हुई। यहां मतदाता संख्या 3,24,560 से घटकर 2,96,382 रह गई। कुल अंतर 28,178 है।
Aonla Assembly Caste Equations का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका बहुस्तरीय ग्रामीण सामाजिक ढांचा है। लोधी राजपूत आंवला के प्रभावशाली समुदायों में हैं। मुस्लिम मतदाता करीब 23.50 प्रतिशत और अनुसूचित जाति करीब 15.70 प्रतिशत है। यादव, मौर्य और कुर्मी समुदाय भी अच्छी संख्या में मौजूद हैं, जबकि ब्राह्मण और ठाकुर समेत सवर्ण मतदाता अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं।
पुराने चुनावी आकलनों में आंवला विधानसभा में करीब 50 हजार मुस्लिम मतदाता बताए गए थे और लोधी राजपूत आबादी को विशेष रूप से प्रभावशाली माना गया था। आंवला नगर क्षेत्र में क्षत्रिय, मौर्य और वैश्य मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई। हालांकि ये आंकड़े 2022 से पहले के हैं और 2026 की नई मतदाता सूची पर इन्हें सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
निर्वाचन व्यवस्था में विधानसभा स्तर पर जाति-वार मतदाता संख्या आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं होती। इसलिए यादव, लोधी, मौर्य, कुर्मी, ब्राह्मण या ठाकुर मतदाताओं की वर्तमान संख्या को निश्चित आंकड़े के रूप में देना उचित नहीं होगा। 2027 के लिए सामाजिक ताकत का आकलन पुराने चुनावी अनुमानों, जनसांख्यिकीय संरचना और पिछले चुनाव परिणामों को मिलाकर ही किया जा सकता है।
आंवला विधानसभा का संकेतात्मक जातीय समीकरण
| जाति/समुदाय | संकेतात्मक स्थिति | 2027 में महत्व |
| लोधी राजपूत | सबसे प्रभावशाली OBC समूहों में | BJP समेत सभी दलों के लिए निर्णायक |
| मुस्लिम | करीब 23.50% | विपक्ष की बड़ी सामाजिक ताकत |
| अनुसूचित जाति | करीब 15.70% | BJP-SP-BSP तीनों के लिए अहम |
| यादव | महत्वपूर्ण OBC समुदाय | SP की प्रमुख सामाजिक धुरी |
| मौर्य | बड़ा गैर-यादव OBC समूह | 2027 में बड़ा स्विंग फैक्टर |
| कुर्मी | प्रभावशाली ग्रामीण OBC | BJP-SP दोनों की नजर |
| ठाकुर | महत्वपूर्ण सवर्ण समुदाय | स्थानीय उम्मीदवार और गांववार असर |
| ब्राह्मण | उल्लेखनीय सवर्ण आधार | करीबी मुकाबले में महत्वपूर्ण |
| वैश्य | कस्बाई क्षेत्र में प्रभाव | व्यापारिक और नगर वोट में भूमिका |
| 2026 कुल मतदाता | 2,96,382 | — |
आंवला का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां केवल किसी एक जाति के सहारे जीत मुश्किल है। भाजपा का मजबूत संगठन और लोधी-गैर यादव OBC-सवर्ण समर्थन उसे बढ़त देता रहा है, लेकिन सपा मुस्लिम, यादव और दूसरे पिछड़े मतदाताओं को जोड़कर कई चुनावों में मुकाबला बेहद करीबी बना चुकी है।
लोधी राजपूत वोट आंवला की सबसे महत्वपूर्ण OBC धुरी
आंवला विधानसभा में लोधी राजपूत समुदाय को लंबे समय से बेहद प्रभावशाली माना जाता है। पुराने क्षेत्रीय सामाजिक आकलनों में भी इस समुदाय की आबादी को अन्य पिछड़े समूहों के मुकाबले खास तौर पर बड़ी बताया गया है।
2022 विधानसभा चुनाव में बसपा ने लक्ष्मण प्रसाद लोधी को प्रत्याशी बनाया था। उन्हें 18,773 वोट मिले। किसी उम्मीदवार को मिले सभी मतों को उसकी जाति से जोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन टिकट चयन यह जरूर बताता है कि दल इस समुदाय के चुनावी महत्व को गंभीरता से देखते हैं।
भाजपा के लिए लोधी राजपूत समाज का बड़ा हिस्सा अपने व्यापक गैर-यादव OBC गठजोड़ में बनाए रखना 2027 की महत्वपूर्ण जरूरत होगी।
सपा की चुनौती इसके उलट होगी। यदि वह यादव-मुस्लिम आधार के साथ लोधी समाज में भी सीमित लेकिन उपयोगी सेंध लगा लेती है तो भाजपा की मौजूदा बढ़त कम की जा सकती है।
मुस्लिम मतदाता करीब 23.50 प्रतिशत, SP के लिए बड़ी शुरुआती ताकत
आंवला में मुस्लिम मतदाता कुल सामाजिक आधार का करीब 23.50 प्रतिशत माने जाते हैं। करीब हर चार मतदाताओं में एक के आसपास की यह हिस्सेदारी चुनाव में स्वतंत्र रूप से बड़ी ताकत है।
लेकिन पिछले चुनावों में मुस्लिम वोट का राजनीतिक रास्ता हमेशा एक जैसा नहीं रहा।
2012 में बसपा ने साजिद अली खान को उम्मीदवार बनाया था और उन्हें 41,082 वोट मिले। उस चुनाव में सपा के महिपाल सिंह यादव को 46,374 और भाजपा के धर्मपाल सिंह को 50,782 मत मिले। भाजपा केवल 4,408 वोट से जीती।
2007 में भी अलग-अलग मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में थे। एक प्रमुख प्रत्याशी को 11,464 और दूसरे को करीब तीन हजार वोट मिले थे। उस चुनाव में बसपा के राधा कृष्ण ने सीट जीती थी।
2027 में यदि मुस्लिम वोट बड़े स्तर पर सपा या किसी एक मजबूत विपक्षी उम्मीदवार के पीछे केंद्रित होता है तो मुकाबला भाजपा के लिए कठिन हो सकता है। इसके विपरीत BSP या किसी तीसरे उम्मीदवार के कारण बड़ा बंटवारा भाजपा के लिए लाभकारी हो सकता है।
यादव वोट SP के सामाजिक समीकरण की पुरानी ताकत
यादव समाज आंवला के प्रभावशाली OBC समूहों में शामिल है। विधानसभा के पुराने राजनीतिक इतिहास में यादव नेताओं ने यहां जीत भी दर्ज की है। 1993 में महिपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर भाजपा को हराकर सीट जीती थी।
2012 में भी सपा ने महिपाल सिंह यादव को मैदान में उतारा। उन्हें 46,374 वोट मिले और भाजपा से सिर्फ 4,408 मतों से हार हुई।
2022 में सपा ने यादव की बजाय पं. राधा कृष्ण शर्मा को उम्मीदवार बनाया और पार्टी का वोट बढ़कर 70,532 पहुंच गया। इससे पता चलता है कि सपा का आधार केवल प्रत्याशी की जाति पर निर्भर नहीं है। मुस्लिम, यादव और दूसरे विपक्षी मतदाताओं के साथ प्रत्याशी की स्थानीय स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण रहती है।
2027 में सपा के लिए यादव मतों की मजबूत एकजुटता जरूरी होगी, लेकिन सीट जीतने के लिए उसे लोधी, मौर्य, कुर्मी, दलित और सवर्ण मतदाताओं में भी अतिरिक्त वोट जोड़ने होंगे।
अनुसूचित जाति करीब 15.70 प्रतिशत, BSP की भूमिका अभी भी अहम
आंवला में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी करीब 15.70 प्रतिशत है। यह संख्या किसी भी करीबी चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण है।
बसपा का आंवला में मजबूत इतिहास भी है। पार्टी ने 2007 का विधानसभा चुनाव जीता था। उस चुनाव में उसके राधा कृष्ण को 40,129 वोट मिले और उन्होंने सपा को 9,379 वोट से हराया।
2012 में बसपा 41,082 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रही।
2017 में पार्टी के अगम कुमार मौर्य को 54,192 वोट, यानी करीब 29.82 प्रतिशत वोट मिले। वह भाजपा और सपा से ज्यादा पीछे नहीं थे।
2022 में बसपा का वोट घटकर 18,773 रह गया।
आंवला में BSP का प्रदर्शन
| चुनाव | BSP वोट | स्थिति |
| 2007 | 40,129 | विजेता |
| 2012 | 41,082 | तीसरा |
| 2017 | 54,192 | तीसरा |
| 2022 | 18,773 | तीसरा |
2017 से 2022 के बीच बसपा का वोट 35,419 मत घटा। इस गिरावट को केवल दलित वोट के स्थानांतरण के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि 2017 में BSP उम्मीदवार मौर्य समुदाय से थे और उनका वोट विभिन्न सामाजिक समूहों से आया होगा।
फिर भी 2027 में बसपा की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी। यदि पार्टी SC मतों में अपनी पुरानी ताकत वापस हासिल करती है और किसी प्रभावशाली OBC या मुस्लिम समूह को जोड़ती है तो BJP-SP की लड़ाई त्रिकोणीय हो सकती है।
मौर्य वोट ने 2017 में BSP को 54 हजार तक पहुंचाया
आंवला में मौर्य समाज गैर-यादव OBC राजनीति की महत्वपूर्ण धुरी है। 2017 में बसपा ने अगम कुमार मौर्य को टिकट दिया और उन्हें 54,192 वोट, यानी लगभग 30 प्रतिशत समर्थन मिला। उस चुनाव में भाजपा के धर्मपाल सिंह 63,165 और सपा के सिद्धराज सिंह 59,619 मतों पर थे।
इस नतीजे की खास बात यह थी कि BJP, SP और BSP तीनों के बीच सिर्फ नौ हजार वोट से कम का फासला था।
2024 लोकसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ने आंवला संसदीय क्षेत्र से मौर्य प्रत्याशी उतारा। पूरे संसदीय क्षेत्र में सपा जीती, लेकिन आंवला विधानसभा खंड में भाजपा 8,488 वोट आगे रही।
इसका अर्थ यह नहीं कि सभी मौर्य मतदाता किसी एक पार्टी के साथ गए। लेकिन 2017 और 2024 के उम्मीदवार चयन से इतना जरूर स्पष्ट है कि इस समुदाय को BSP और SP दोनों बड़ा राजनीतिक अवसर मानते रहे हैं।
2027 में मौर्य वोट भाजपा और सपा के बीच सबसे महत्वपूर्ण स्विंग समूहों में शामिल हो सकता है।
कुर्मी वोट भी गैर-यादव OBC गणित की महत्वपूर्ण कड़ी
आंवला में कुर्मी समाज भी अच्छी संख्या में मौजूद है। उपलब्ध सामाजिक प्रोफाइल में लोधी राजपूत के साथ यादव, मौर्य और कुर्मी को प्रमुख OBC समूहों में शामिल किया गया है।
भाजपा के लिए कुर्मी और दूसरे गैर-यादव OBC मतदाताओं का समर्थन लोधी तथा सवर्ण मतों के साथ बड़ा चुनावी आधार तैयार करता है।
सपा का PDA फॉर्मूला तभी प्रभावी होगा जब पार्टी यादव के बाहर कुर्मी, मौर्य और दूसरे OBC समुदायों में भाजपा की बढ़त कम कर सके।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा की आंवला विधानसभा-खंड बढ़त 2019 के मुकाबले काफी घटने से विपक्ष को इन्हीं गैर-परंपरागत सामाजिक समूहों में विस्तार की गुंजाइश दिखाई देती है।
ब्राह्मण और ठाकुर वोट भी BJP-SP दोनों के लिए महत्वपूर्ण
आंवला के सामाजिक प्रोफाइल में ब्राह्मण और ठाकुर समेत सवर्ण समुदायों की उल्लेखनीय मौजूदगी है। आंवला नगर क्षेत्र में क्षत्रिय मतदाताओं का खास प्रभाव पुराने चुनावी आकलनों में भी दर्ज किया गया है।
2022 में समाजवादी पार्टी ने पं. राधा कृष्ण शर्मा को उम्मीदवार बनाकर सवर्ण मतदाताओं में अपने आधार का विस्तार करने का प्रयास किया। उन्हें 70,532 वोट मिले और वह मुख्य मुकाबले में रहे।
इससे आंवला में सपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—पार्टी केवल यादव या मुस्लिम प्रत्याशी पर निर्भर नहीं है।
2027 में भाजपा अपने सवर्ण वोट को लोधी और दूसरे गैर-यादव OBC समर्थन के साथ जोड़ना चाहेगी, जबकि सपा ऐसे प्रत्याशी के जरिए इसी गठजोड़ के कुछ हिस्सों में सेंध लगाने की कोशिश कर सकती है।
आंवला वोटर लिस्ट 2026: कुल 2,96,382 मतदाता
2026 की अंतिम मतदाता सूची में आंवला विधानसभा में 2,96,382 मतदाता हैं। SIR प्रक्रिया शुरू होने से पहले यह संख्या 3,24,560 थी। इस तरह 28,178 मतदाताओं की नेट कमी हुई, जो करीब 8.68 प्रतिशत है।
आंवला वोटर लिस्ट 2026
| विवरण | मतदाता |
| SIR से पहले | 3,24,560 |
| 2026 अंतिम सूची | 2,96,382 |
| नेट कमी | 28,178 |
| कमी | 8.68% |
बरेली जिले की नौ सीटों में आंवला की नेट कटौती सबसे कम रही। पूरे जिले में मतदाता संख्या 34,05,820 से घटकर 29,48,987 रह गई।
मतदाता सूची में हुई कमी को किसी जाति, धर्म या राजनीतिक दल से जोड़ने का कोई आधार नहीं है। इसका चुनावी महत्व मुख्य रूप से बूथ संरचना और संगठनात्मक रणनीति में है।
2012 से 2024 तक बढ़े वोटर, 2026 में पहली बड़ी गिरावट
आंवला विधानसभा में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 2,48,283 थी। 2017 में यह बढ़कर 2,98,075, 2019 में 3,06,818, 2022 में 3,18,407 और 2024 में 3,22,227 हो गई। 2026 की अंतिम सूची में यह संख्या 2,96,382 है।
आंवला विधानसभा में मतदाताओं का ट्रेंड
| वर्ष | कुल मतदाता |
| 2012 | 2,48,283 |
| 2017 | 2,98,075 |
| 2019 लोकसभा | 3,06,818 |
| 2022 विधानसभा | 3,18,407 |
| 2024 लोकसभा | 3,22,227 |
| 2026 SIR | 2,96,382 |
2012 से 2024 तक मतदाता संख्या करीब 74 हजार बढ़ी थी। 2026 में यह रुझान पहली बार बड़े स्तर पर उलटा दिखाई देता है।
2024 से 2026 की सूचियों की तुलना में करीब 25,845 की नेट कमी दिखाई देती है। SIR की तत्काल पूर्व सूची से तुलना में कमी 28,178 है। दोनों आधार तिथियां अलग होने के कारण दोनों आंकड़ों में अंतर है।
2022 में BJP ने 18,424 वोट से दर्ज की लगातार तीसरी जीत
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के धर्मपाल सिंह ने 88,956 वोट हासिल किए। समाजवादी पार्टी के पं. राधा कृष्ण शर्मा को 70,532 वोट और बसपा के लक्ष्मण प्रसाद लोधी को 18,773 मत मिले। भाजपा की जीत का अंतर 18,424 वोट रहा।
आंवला विधानसभा चुनाव 2022
| प्रत्याशी | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
| धर्मपाल सिंह | BJP | 88,956 | 46.45% |
| पं. राधा कृष्ण शर्मा | SP | 70,532 | 36.83% |
| लक्ष्मण प्रसाद लोधी | BSP | 18,773 | 9.80% |
| जीराज सिंह | निर्दलीय | 5,382 | 2.81% |
| ओमवीर यादव | कांग्रेस | 2,307 | 1.20% |
| देवेंद्र मैथिल | निर्दलीय | 1,591 | 0.83% |
| राम सिंह मौर्य | AAP | 1,366 | 0.71% |
| NOTA | — | 1,211 | 0.63% |
| BJP की जीत | — | 18,424 वोट | — |
2022 में आंवला का मतदान प्रतिशत करीब 61.26 प्रतिशत रहा। भाजपा की यह लगातार तीसरी विधानसभा जीत थी और 2012 तथा 2017 की तुलना में उसका जीत का अंतर काफी बढ़ गया।
2017 में BJP सिर्फ 3,546 वोट से बचा पाई थी सीट
2017 विधानसभा चुनाव आंवला के सबसे करीबी त्रिकोणीय मुकाबलों में रहा। भाजपा के धर्मपाल सिंह को 63,165 वोट, सपा के सिद्धराज सिंह को 59,619 वोट और बसपा के अगम कुमार मौर्य को 54,192 वोट मिले। भाजपा सिर्फ 3,546 वोट से जीती।
आंवला विधानसभा चुनाव 2017
| प्रत्याशी | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
| धर्मपाल सिंह | BJP | 63,165 | 34.76% |
| सिद्धराज सिंह | SP | 59,619 | 32.81% |
| अगम कुमार मौर्य | BSP | 54,192 | 29.82% |
| NOTA | — | 1,794 | 0.99% |
| प्रदीप सक्सेना | अन्य | 1,005 | 0.55% |
| BJP की जीत | — | 3,546 वोट | — |
2017 में BJP, SP और BSP तीनों का वोट शेयर 30 प्रतिशत के आसपास था। यानी आंवला में तीसरे दल की मजबूत मौजूदगी ने चुनाव को पूरी तरह त्रिकोणीय बना दिया था।
इस चुनाव से 2027 के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि बसपा यदि फिर 40-50 हजार मतों के स्तर पर पहुंचती है तो BJP-SP की सीधी लड़ाई का पूरा स्वरूप बदल सकता है।
2012 में BJP की जीत सिर्फ 4,408 वोट की
2012 विधानसभा चुनाव में भाजपा के धर्मपाल सिंह को 50,782 वोट मिले। सपा के महिपाल सिंह यादव को 46,374, बसपा के साजिद अली खान को 41,082 और कांग्रेस की अनुपमा मौर्य को 15,715 वोट मिले। भाजपा ने सिर्फ 4,408 वोट से सीट जीती।
आंवला विधानसभा चुनाव 2012
| प्रत्याशी | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
| धर्मपाल सिंह | BJP | 50,782 | करीब 31% |
| महिपाल सिंह यादव | SP | 46,374 | करीब 28% |
| साजिद अली खान | BSP | 41,082 | करीब 25% |
| अनुपमा मौर्य | कांग्रेस | 15,715 | करीब 10% |
| BJP की जीत | — | 4,408 वोट | — |
2012 में भाजपा, सपा और बसपा के बीच अंतर बेहद कम था। कांग्रेस उम्मीदवार को भी 15 हजार से अधिक वोट मिले थे। करीब 66.30 प्रतिशत मतदान वाली इस लड़ाई में सामाजिक और राजनीतिक वोट कई हिस्सों में बंटे हुए थे।
2007 में BSP ने BJP-SP को पीछे छोड़कर जीती सीट
2007 विधानसभा चुनाव में बसपा के राधा कृष्ण को 40,129 वोट मिले। सपा के बुलाकी राम को 30,750 और भाजपा के धर्मपाल सिंह को 29,291 मत मिले। बसपा ने 9,379 वोट से जीत दर्ज की।
आंवला विधानसभा चुनाव 2007
| प्रत्याशी | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
| राधा कृष्ण | BSP | 40,129 | करीब 31% |
| बुलाकी राम | SP | 30,750 | करीब 23% |
| धर्मपाल सिंह | BJP | 29,291 | करीब 22% |
| ऋषि पाल सिंह | अन्य | 11,464 | करीब 9% |
| श्याम बिहारी सिंह | कांग्रेस | 5,536 | करीब 4% |
| BSP की जीत | — | 9,379 वोट | — |
2007 का चुनाव 2008 के परिसीमन से पहले की विधानसभा सीमा पर हुआ था। इसलिए उस चुनाव के गांववार और जातीय भूगोल की तुलना 2012 के बाद की आंवला सीट से सावधानी के साथ करनी चाहिए। फिर भी यह परिणाम बसपा की पुरानी राजनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण संकेत है।
आंवला विधानसभा चुनाव 2007-2022 का तुलनात्मक इतिहास
| वर्ष | विजेता | पार्टी | वोट | उपविजेता | जीत का अंतर |
| 2007* | राधा कृष्ण | BSP | 40,129 | बुलाकी राम, SP | 9,379 |
| 2012 | धर्मपाल सिंह | BJP | 50,782 | महिपाल सिंह यादव, SP | 4,408 |
| 2017 | धर्मपाल सिंह | BJP | 63,165 | सिद्धराज सिंह, SP | 3,546 |
| 2022 | धर्मपाल सिंह | BJP | 88,956 | पं. राधा कृष्ण शर्मा, SP | 18,424 |
*2007 का चुनाव परिसीमन से पहले की सीमा पर हुआ था।
पिछले चार विधानसभा चुनावों में भाजपा ने तीन और बसपा ने एक चुनाव जीता है। 2012 और 2017 में भाजपा की जीत मामूली रही, लेकिन 2022 में पार्टी ने अंतर बढ़ाकर 18,424 कर लिया।
आंवला का लंबा इतिहास भाजपा की और भी मजबूत स्थिति दिखाता है। 1952 से अब तक हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ ने मिलाकर दस बार सीट जीती है। कांग्रेस पांच बार, जबकि सपा, बसपा और जनता पार्टी एक-एक बार विजयी रही हैं।
धर्मपाल सिंह की व्यक्तिगत पकड़ BJP की बड़ी ताकत
आंवला की मौजूदा राजनीति में धर्मपाल सिंह का नाम सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय चेहरों में है। वह 2022 में लगातार तीसरी बार आंवला से जीते और अपने राजनीतिक करियर में इस विधानसभा का चार बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
2012 में उनकी जीत 4,408 वोट से हुई।
2017 में अंतर घटकर 3,546 रह गया।
2022 में उन्होंने जीत का अंतर बढ़ाकर 18,424 वोट कर दिया।
तीन चुनावों में उनके वोट भी लगातार बढ़े—50,782 से 63,165 और फिर 88,956 तक। इससे पार्टी संगठन के साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ का भी संकेत मिलता है।
2027 में भाजपा के टिकट का फैसला इसलिए इस सीट का सबसे बड़ा राजनीतिक फैक्टर बन सकता है। मौजूदा नेतृत्व बरकरार रहने और चेहरा बदलने—दोनों स्थितियों में सामाजिक समीकरण अलग हो सकता है।
2024 लोकसभा चुनाव में BJP आंवला विधानसभा से 8,488 वोट आगे
2024 लोकसभा चुनाव में पूरे आंवला संसदीय क्षेत्र में समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की, लेकिन आंवला विधानसभा खंड में भाजपा आगे रही। भाजपा प्रत्याशी को यहां 86,570 वोट, जबकि सपा प्रत्याशी को 78,082 वोट मिले। भाजपा की बढ़त 8,488 वोट रही।
आंवला विधानसभा खंड: लोकसभा चुनाव 2024
| पार्टी | वोट | वोट शेयर |
| BJP | 86,570 | 45.26% |
| SP | 78,082 | 40.82% के आसपास |
| BJP की बढ़त | 8,488 | — |
पूरे आंवला लोकसभा क्षेत्र में सपा को 4,92,515 और भाजपा को 4,76,546 वोट मिले। संसदीय सीट पर सपा की जीत का अंतर 15,969 वोट रहा।
यह विरोधाभास बेहद महत्वपूर्ण है—सपा ने पूरा संसदीय क्षेत्र जीता, लेकिन आंवला विधानसभा में भाजपा का आधार कायम रहा।
2009 से चारों लोकसभा चुनावों में आंवला खंड से BJP आगे
आंवला विधानसभा क्षेत्र ने लोकसभा चुनाव में हालिया दौर में लगातार भाजपा को बढ़त दी है।
2009 में भाजपा ने सपा पर 7,069 वोट की बढ़त बनाई।
2014 में भाजपा की बढ़त बढ़कर 24,922 वोट हो गई।
2019 में भाजपा बसपा से 22,537 वोट आगे रही।
2024 में भाजपा फिर आगे रही, लेकिन अंतर घटकर 8,488 वोट रह गया।
आंवला विधानसभा खंड का लोकसभा ट्रेंड
| लोकसभा चुनाव | विधानसभा खंड में स्थिति |
| 2009 | BJP +7,069 |
| 2014 | BJP +24,922 |
| 2019 | BJP +22,537 |
| 2024 | BJP +8,488 |
2019 से 2024 के बीच भाजपा की लोकसभा-खंड बढ़त 14,049 वोट कम हुई। इसे सीधे विधानसभा चुनाव का स्विंग नहीं माना जा सकता, लेकिन 2027 से पहले सपा के लिए यह सकारात्मक संकेत और भाजपा के लिए सतर्कता का कारण है।
लगातार सात बड़े चुनावों में BJP का आंवला से दबदबा
2012, 2017 और 2022 के तीनों विधानसभा चुनाव भाजपा ने जीते हैं।
इसके साथ 2009, 2014, 2019 और 2024 के चारों लोकसभा चुनाव में भी भाजपा आंवला विधानसभा खंड से आगे रही। यानी पिछले सात विधानसभा/लोकसभा चुनावी परीक्षणों में भाजपा ने आंवला क्षेत्र से बढ़त या जीत कायम रखी है।
यह रिकॉर्ड भाजपा को 2027 की शुरुआत में मजबूत स्थिति देता है।
लेकिन इसमें कमजोरी भी छिपी है।
2012 में विधानसभा जीत सिर्फ 4,408 वोट की थी।
2017 में सिर्फ 3,546 वोट।
2024 लोकसभा में भी बढ़त घटकर 8,488 रह गई।
इसलिए आंवला को भाजपा का मजबूत क्षेत्र जरूर कहा जा सकता है, लेकिन पूरी तरह एकतरफा सुरक्षित सीट मानना पिछले परिणामों के अनुरूप नहीं होगा।
82 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण सीट, इसलिए किसान भी बड़ा राजनीतिक फैक्टर
आंवला विधानसभा की करीब 82.33 प्रतिशत आबादी ग्रामीण और लगभग 17.67 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में रहती है। विधानसभा का बड़ा हिस्सा गांवों, कृषि क्षेत्र और छोटे कस्बों में फैला हुआ है।
आंवला और आसपास की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गेहूं, धान, गन्ना, आलू और सरसों जैसी फसलें महत्वपूर्ण हैं। आंवला कस्बा आसपास के गांवों की कृषि उपज के व्यापार और बाजार केंद्र के रूप में भी काम करता है।
इस कारण लोधी, यादव, मौर्य, कुर्मी, ठाकुर, दलित और मुस्लिम जैसे अलग-अलग सामाजिक समुदायों की बड़ी संख्या किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी है।
जातीय पहचान के साथ सिंचाई, बिजली, खाद-बीज, फसल का भाव, गन्ना भुगतान, ग्रामीण सड़क और पशुपालन जैसे मुद्दे 2027 में चुनावी व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
औद्योगिक मौजूदगी से रोजगार का मुद्दा भी अलग
आंवला विधानसभा केवल कृषि प्रधान क्षेत्र नहीं है। यहां बड़ा उर्वरक उत्पादन संयंत्र और पेट्रोलियम भंडारण-वितरण से जुड़ी औद्योगिक गतिविधियां भी मौजूद हैं। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को जिले की कई दूसरी ग्रामीण सीटों से अलग बनाता है।
इसके बावजूद स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, उद्योगों में अवसर, कौशल प्रशिक्षण और छोटे कारोबार की संभावनाएं राजनीतिक मुद्दे बन सकती हैं।
2027 में रोजगार का सवाल खास तौर पर युवा मतदाताओं में जातीय समीकरण से अलग प्रभाव डाल सकता है।
आंवला को अलग जिला बनाने की मांग भी 2027 का मुद्दा
आंवला को अलग जिला बनाने का प्रस्ताव लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था में आंवला के साथ बिसौली और दातागंज जैसे क्षेत्रों को शामिल करने की बात होती रही है।
यह मांग 2027 के विधानसभा चुनाव में स्थानीय पहचान और प्रशासनिक सुविधा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।
समर्थकों के लिए अलग जिला बनने से प्रशासनिक कार्यालय, रोजगार, विकास परियोजनाओं और सरकारी सेवाओं तक पहुंच बेहतर होने की उम्मीद जुड़ी रहती है।
भाजपा इसे विकास और प्रशासनिक पुनर्गठन की दिशा में संभावित मुद्दे के रूप में पेश कर सकती है, जबकि विपक्ष इस मांग की वास्तविक प्रगति को लेकर सवाल उठा सकता है।
BJP का 2027 का संभावित सामाजिक फॉर्मूला
आंवला में भाजपा का संभावित सामाजिक फॉर्मूला इस तरह देखा जा सकता है—
लोधी राजपूत + मौर्य-कुर्मी और दूसरे गैर-यादव OBC + ब्राह्मण-ठाकुर + SC का हिस्सा + वैश्य/कस्बाई वोट + मुस्लिम-यादव में सीमित सेंध
यह सीट भाजपा के लिए इसलिए अनुकूल रही है क्योंकि पार्टी किसी एक सामाजिक समूह पर निर्भर नहीं रही। लोधी और दूसरे OBC के साथ सवर्ण तथा अनुसूचित जाति के एक हिस्से को जोड़ने वाला गठजोड़ उसे लगातार चुनाव जिताता रहा है। पिछले तीन विधानसभा और चार लोकसभा चुनावी परिणाम इसी संगठनात्मक मजबूती को दिखाते हैं।
2022 में भाजपा को 46.45 प्रतिशत वोट मिले। यह 2017 के 34.76 प्रतिशत से करीब 12 प्रतिशत अंक ज्यादा था।
हालांकि 2024 लोकसभा खंड में बढ़त घटकर 8,488 रहना बताता है कि पार्टी को अपने पुराने सामाजिक गठजोड़ को स्वाभाविक मानकर नहीं चलना चाहिए।
SP के लिए मुस्लिम-Yadav से आगे मौर्य-कुर्मी में सेंध जरूरी
समाजवादी पार्टी के लिए संभावित 2027 सामाजिक फॉर्मूला हो सकता है—
मुस्लिम + यादव + SC का हिस्सा + मौर्य-कुर्मी में सेंध + लोधी वोट का छोटा हिस्सा + सवर्णों में स्वीकार्य उम्मीदवार
मुस्लिम मतदाता करीब 23.50 प्रतिशत के साथ पार्टी को बड़ा शुरुआती आधार दे सकते हैं। यादव समुदाय उसका पारंपरिक मजबूत OBC आधार है।
लेकिन आंवला का चुनावी इतिहास यह स्पष्ट करता है कि सिर्फ मुस्लिम-यादव समीकरण पर्याप्त नहीं है।
2012 में सपा सिर्फ 4,408 वोट से हारी।
2017 में केवल 3,546 वोट से पीछे रही।
2022 में अंतर बढ़कर 18,424 हो गया।
सपा को 2027 में मौर्य, कुर्मी, अनुसूचित जाति और लोधी समुदाय में अतिरिक्त समर्थन हासिल करना होगा।
2024 में पूरे आंवला लोकसभा क्षेत्र में सपा की जीत पार्टी के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त देती है, लेकिन विधानसभा खंड में 8,488 वोट से पीछे रहना बताता है कि आंवला सीट पर काम अभी अधूरा है।
BSP की भूमिका आंवला में दूसरी सीटों से ज्यादा महत्वपूर्ण
आंवला उन सीटों में है जहां बसपा का इतिहास केवल वोट काटने तक सीमित नहीं है। पार्टी 2007 में यहां चुनाव जीत चुकी है।
2012 में उसे 41 हजार से अधिक और 2017 में 54 हजार से अधिक वोट मिले। केवल 2022 में उसका वोट तेजी से गिरकर 18,773 रह गया।
यदि 2027 में BSP फिर 40-50 हजार वोट के स्तर पर लौटती है तो BJP-SP मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है।
मौर्य या लोधी जैसे गैर-यादव OBC चेहरे के साथ पार्टी भाजपा और सपा दोनों के वोट में सेंध लगा सकती है।
मुस्लिम उम्मीदवार से विपक्षी मुस्लिम वोट का बंटवारा हो सकता है।
दलित प्रत्याशी पर जोर देने से लगभग 15.70 प्रतिशत SC सामाजिक आधार में मुकाबला तेज हो सकता है।
इसलिए आंवला में बसपा के टिकट की सामाजिक पृष्ठभूमि 2027 का महत्वपूर्ण फैक्टर होगी।
महिला और युवा मतदाता जातीय समीकरण से अलग भी बदल सकते हैं चुनाव
बरेली जिले की 2026 SIR प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नए मतदाता भी जुड़े और 18-19 वर्ष के युवा मतदाताओं की संख्या जिले में 50 हजार से अधिक हो गई। निरंतर पुनरीक्षण के कारण पात्र मतदाता आगे भी सूची में जुड़ सकते हैं।
आंवला जैसी ग्रामीण सीट में युवा मतदाताओं के लिए सरकारी नौकरी, स्थानीय रोजगार, शिक्षा, कौशल, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे जातीय पहचान से अलग प्रभाव डाल सकते हैं।
महिला मतदाता राशन, आवास, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पेयजल, बिजली, परिवार की आय और स्थानीय सड़क जैसे मुद्दों पर अलग मतदान प्राथमिकता बना सकती हैं।
2027 में BJP और SP दोनों के लिए जातीय बूथ मैनेजमेंट के साथ महिला और युवा मतदाता संपर्क जरूरी होगा।
2026 की नई वोटर लिस्ट ने बदल दिया पुराना बूथ गणित
आंवला में 2027 की रणनीति बनाते समय तीन आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं—
| चुनावी डेटा | संख्या |
| 2022 BJP जीत | 18,424 |
| 2024 BJP लोकसभा बढ़त | 8,488 |
| 2026 SIR नेट कमी | 28,178 |
SIR में मतदाता संख्या का बदलाव 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा—दोनों हालिया राजनीतिक अंतरों से बड़ा है।
इसका अर्थ यह नहीं कि 28 हजार मतदाता भाजपा, सपा या किसी विशेष जाति से जुड़े थे।
असल महत्व बूथ स्तर पर है।
2022 में जिस गांव में 1,000 मतदाताओं वाला कोई बूथ किसी पार्टी का मजबूत केंद्र था, 2026 की नई सूची में उसकी संख्या बदल सकती है।
इसीलिए 2027 में सबसे मजबूत चुनावी संगठन वही होगा जो पुरानी जाति-वार धारणाओं के बजाय अंतिम मतदाता सूची के आधार पर हर बूथ की वास्तविक ताकत दोबारा मापे।
2027 में किन सामाजिक समूहों पर सबसे ज्यादा नजर?
सबसे पहला सवाल लोधी राजपूत मतदाताओं का रहेगा। आंवला की OBC राजनीति में उन्हें सबसे प्रभावशाली समुदायों में माना जाता है।
दूसरा, मुस्लिम मतदाता। करीब 23.50 प्रतिशत की हिस्सेदारी उन्हें सीट का बड़ा स्वतंत्र सामाजिक ब्लॉक बनाती है।
तीसरा, अनुसूचित जाति मतदाता। करीब 15.70 प्रतिशत के सामाजिक आधार पर BJP, SP और BSP तीनों की नजर रहेगी।
चौथा, यादव मतदाता। सपा की सामाजिक राजनीति के लिए यह समुदाय महत्वपूर्ण रहेगा और उसका आंवला में पुराना राजनीतिक इतिहास भी है।
पांचवां, मौर्य वोट। 2017 के करीब 54 हजार BSP वोट और 2024 के उम्मीदवार चयन के बाद यह समुदाय फिर चुनावी केंद्र में है।
छठा, कुर्मी और दूसरे गैर-यादव OBC मतदाता। भाजपा इन्हें अपने गठजोड़ में बनाए रखना चाहेगी, जबकि सपा की PDA रणनीति इसी हिस्से में विस्तार की कोशिश करेगी।
सातवां, ब्राह्मण-ठाकुर और कस्बाई सवर्ण वोट। 2022 में सपा के उम्मीदवार चयन ने दिखाया कि विपक्ष भी इस वर्ग में समर्थन हासिल करने की रणनीति बना सकता है।
आंवला विधानसभा चुनाव 2027 का जातीय गणित क्या संकेत देता है?
आंवला के हालिया चुनावी आंकड़ों को एक साथ रखें तो राजनीतिक तस्वीर इस तरह दिखाई देती है—
| चुनावी संकेत | स्थिति |
| 2007 विधानसभा | BSP +9,379 |
| 2012 विधानसभा | BJP +4,408 |
| 2017 विधानसभा | BJP +3,546 |
| 2022 विधानसभा | BJP +18,424 |
| 2009 लोकसभा खंड | BJP +7,069 |
| 2014 लोकसभा खंड | BJP +24,922 |
| 2019 लोकसभा खंड | BJP +22,537 |
| 2024 लोकसभा खंड | BJP +8,488 |
| 2024 कुल मतदाता | 3,22,227 |
| 2026 कुल मतदाता | 2,96,382 |
| SIR नेट कमी | 28,178 |
इन आंकड़ों में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत निरंतरता है। पार्टी ने 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते और 2009 से 2024 तक चारों लोकसभा चुनावों में भी आंवला खंड से बढ़त बनाए रखी।
लेकिन Aonla Assembly Caste Equations 2027 को पूरी तरह एकतरफा चुनाव नहीं बनाते।
2012 और 2017 में भाजपा की विधानसभा जीत पांच हजार वोट से भी कम थी। 2019 से 2024 के बीच उसकी लोकसभा-खंड बढ़त 22,537 से घटकर 8,488 रह गई।
भाजपा के लिए सबसे मजबूत रास्ता लोधी राजपूत, दूसरे गैर-यादव OBC, सवर्ण और अनुसूचित जाति के हिस्से का व्यापक गठजोड़ बनाए रखने का है। मौजूदा नेतृत्व की व्यक्तिगत पकड़ और लगातार चुनावी सफलता भी पार्टी को संगठनात्मक बढ़त देती है।
सपा के लिए मुस्लिम और यादव मतदाता मजबूत शुरुआती आधार हैं, लेकिन जीत के लिए मौर्य, कुर्मी, लोधी, अनुसूचित जाति और सवर्ण मतदाताओं में अतिरिक्त समर्थन जरूरी होगा। 2024 में पूरे आंवला लोकसभा क्षेत्र की जीत उसके लिए अवसर है, लेकिन आंवला विधानसभा खंड में भाजपा से पीछे रहना स्थानीय चुनौती को साफ करता है।
बसपा की भूमिका भी दूसरी कई सीटों के मुकाबले यहां ज्यादा महत्वपूर्ण है। पार्टी 2007 में सीट जीत चुकी है और 2017 तक 50 हजार से अधिक वोट लेने की क्षमता दिखा चुकी है। उसकी वापसी चुनाव को फिर त्रिकोणीय बना सकती है।
इसके ऊपर 2026 की 2,96,382 मतदाताओं वाली नई सूची ने पुराने बूथ गणित को बदल दिया है। SIR से पहले के मुकाबले 28,178 की नेट कमी के बाद 2022 के जाति-वार पुराने अनुमानों को जस का तस 2027 पर लागू करना उचित नहीं होगा।
जातीय समीकरण के समानांतर किसान, खाद-बीज, सिंचाई, गन्ना और आलू का भाव, ग्रामीण सड़क, रोजगार, औद्योगिक अवसर, रेल-सड़क कनेक्टिविटी और आंवला को अलग जिला बनाने की मांग भी 2027 के चुनावी विमर्श में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। करीब 82 प्रतिशत ग्रामीण संरचना के कारण किसान और ग्रामीण विकास के मुद्दों का प्रभाव किसी एक जाति तक सीमित नहीं रहेगा।
यानी आंवला विधानसभा चुनाव 2027 को केवल लोधी बनाम मुस्लिम-यादव या BJP बनाम SP की सीधी लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली फैसला लोधी राजपूत वोट की दिशा, मुस्लिम मतों की एकजुटता, अनुसूचित जाति वोट का बंटवारा, यादव समर्थन, मौर्य-कुर्मी और दूसरे गैर-यादव OBC मतदाताओं का रुख, ब्राह्मण-ठाकुर वोट, BSP की ताकत, उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता और 2026 की नई मतदाता सूची के बूथवार बदलाव मिलकर करेंगे।
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