विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट के अनुसार, कम लागत वाले बचावकारी स्वास्थ्य उपायों से 2040 तक वैश्विक हेल्थकेयर सिस्टम को छह ट्रिलियन डॉलर से अधिक की बचत ह ...और पढ़ें
HighLights
कम लागत वाले स्वास्थ्य उपाय बचाएंगे छह ट्रिलियन डॉलर।
शारीरिक गतिविधि, हियरिंग एड जैसे उपाय बढ़ाएंगे उत्पादकता।
भारत सहित कई देशों में आवास की लागत किफायती नहीं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कम लागत वाले बचावकारी स्वास्थ्य उपायों को अपनाने से 2040 तक दुनियाभर के हेल्थकेयर सिस्टम को छह ट्रिलियन डालर से ज्यादा बचत हो सकती है।
इतना ही नहीं इस तरह के उपायों को अपनाने से 645 अरब डालर की अतिरिक्त प्रोडक्टिविटी पैदा होगी। इस तरह की बचत को प्राप्त करने के लिए घरों को गिरने से रोकने के उपाय, शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देना और हियरिंग एड (श्रवण यंत्रों) तक पहुंच बढ़ाना शामिल है।
'द लांगेविटी डिविडेंड' द बिजनेस केस फार लिंकिंग हेल्थ एंड वेल्थ" नाम की यह रिपोर्ट कहती है कि सरकारों और बिजनेस को सेहत और दौलत को अलग-अलग तरह से देखना बंद करना चाहिए और इसके बजाय बचाव वाले हेल्थकेयर को एक आर्थिक निवेश के तौर पर देखना चाहिए।
डब्ल्यूईएफ ने टाइप-2 डायबिटीज के बोझ को कम करने के लिए शारीरिक गतिविधि बढ़ाने के आर्थिक फायदों पर भी जोर दिया है, खासकर उन देशों में जहां तेजी से जनसांख्यिकीय बदलाव हो रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि नाइजीरिया, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसी "युवा" अर्थव्यवस्थाओं में मधुमेह रोगियों की संख्या बढ़ने के साथ बुजुर्ग आबादी भी बढ़ रही है, जिससे बचाव के उपाय और भी ज्यादा जरूरी हो जाते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हियरिंग एड्स तक पहुंच बढ़ाने से सुनने की क्षमता में सुधार के अलावा और भी कई फ़ायदे मिलते हैं। हियरिंग एड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की मुख्य वजह सिर्फ डिमेंशिया को रोकना नहीं होना चाहिए।
डिमेंशिया कम होने से मिलने वाले बड़े फायदों को पर ध्यान देना यह बताता है कि स्वास्थ्य से जुड़े उपायों के लिए बिजनेस प्लान बनाते समय मुख्य इस्तेमाल के अलावा दूसरे फायदों पर भी विचार करना चाहिए।
भारत सहित 21 देशों में घरों की लागत किफायती सीमा से ज्यादा
डब्ल्यूईएफ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 21 देशों में घरों की लागत किफायती सीमा से ज्यादा है और इससे आम लोगों की वित्तीय स्थिरता को खतरा पैदा हो रहा है। इस संकट से परिवारों के बजट और रिटायरमेंट की बचत पर दबाव पड़ने की आशंका है।
यह एक ढांचागत समस्या है और इसके 2040 तक बने रहने की उम्मीद है। भारत, नाइजीरिया और कोलंबिया जैसी तेजी से बढ़ने वाले अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय बोझ बहुत ज्यादा है और यहां घर पर किया जाने वाला खर्च एक औसत व्यक्ति की मासिक कमाई के बराबर या उससे भी ज्यादा होता है।
रिपोर्ट में एक चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों में पिछले दस वर्षों में प्रापर्टी की कीमतें 15 प्रतिशत से ज्यादा गिरी (वेतन के मुकाबले) हैं, लेकिन घर खरीदना किफायती नहीं हुआ है। इससे पता चलता है कि रियल एस्टेट बाज़ार में कीमतों में मामूली सुधार से औसत परिवार को कोई खास राहत नहीं मिल रही है।