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प्रदेश के सेवारत शिक्षकों के लिए विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा टीईटी के आवेदन भरना शुरू हो गए हैं। स्कूल शिक्षा विभाग में असमंजस है। आक्रोश है। परीक्षा की तारीखें आ चुकी हैं। लोक शिक्षण संचालनालय अब तक यह सूची जारी नहीं कर पाया है कि परीक्षा में किन शिक्षकों को बैठना है।

भास्कर ने पात्रता के उलझे पेच पर जिले के अफसरों से बात की। एक और विरोधाभास सामने आया। अफसरों के मुताबिक जिन शिक्षकों की अंकसूची पर शिक्षक पात्रता परीक्षा लिखा है, उन्हें परीक्षा नहीं देनी है। सवाल 2005 से 2009 के बीच भर्ती शिक्षकों को लेकर है। इनकी व्यापम से कराई परीक्षा की अंकसूची पर संविदा शाला शिक्षक पात्रता परीक्षा लिखा है। इस पर डीईओ ने कहा कि इस बारे में कुछ नहीं कह सकता।

अफसरों के तर्क से मामला सुलझा नहीं। उलझ गया। शिक्षक संघों का कहना है कि क्या तकनीकी शब्दों के फेर में अनुभवी शिक्षकों को फिर से परीक्षा की कतार में खड़ा किया जाएगा।

इन तीन सवालों और विसंगतियों पर चुप्पी व्यापमं पास शिक्षकों के साथ दोहरा बर्ताव क्यों? : शिक्षक संगठनों का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ ''पात्रता परीक्षा'' पास होने की बात कही है, किसी नए सिलेबस की नहीं। सरकार ने 2005 से 2009 के बीच व्यापमं के जरिए कठिन परीक्षा लेकर ही संविदा शिक्षकों की नियुक्ति की थी, जिसका सिलेबस मौजूदा टीईटी जैसा ही था। ऐसे में इन शिक्षकों को बिना परीक्षा वाले (1999-2005) कैडर के बराबर खड़ा करना गलत है।

वरिष्ठ कार्यालय से ही निराकरण होगा ^विशेष पात्रता परीक्षा का जो विज्ञापन जारी हुआ है, उसमें स्पष्ट है कि जिन शिक्षकों ने पात्रता परीक्षा नहीं दी है, उन्हें यह परीक्षा देनी होगी। एक लाइन में बात यह है कि जिनके पास ''शिक्षक पात्रता परीक्षा'' नाम से सर्टिफिकेट है, उनको टीईटी नहीं देनी होगी। अब कौन सी परीक्षा मानी जाएगी, कौन सी नहीं, यह तो शासन ही बता सकता है। -डीडी रजक, डीईओ, रायसेन

प्रमोशन पा चुके शिक्षकों का मूल पद क्या माना जाएगा? 1999 से 2004 के बीच बिना परीक्षा भर्ती हुए कई प्राथमिक/माध्यमिक शिक्षक अब प्रमोट होकर उच्च माध्यमिक शिक्षक बन चुके हैं। संघों का आरोप है कि यदि इन्हें परीक्षा से बाहर रखा तो यह भेदभाव होगा क्योंकि मूल नियुक्ति बिना परीक्षा की थी। यदि परीक्षा दिलाई, तो प्रमोशन के नियम आड़े आएंगे क्योंकि उनका मूल पद ही बदल चुका है।