भगवान के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करना क्यों माना जाता है श्रेष्ठ? जानें दंडवत प्रणाम का महत्व

मंदिर में भगवान के सामने दंडवत प्रणाम करना क्यों माना जाता है सबसे श्रेष्ठ भक्ति? जानें इसका धार्मिक महत्व, सही तरीका और वैज्ञानिक कारण।

Dandwat pranam mahatva

भगवान के सामने क्यों किया जाता है दंडवत प्रणाम? (Ai Image)

  • Published: 23 Aug 2026, 04:45 PM IST
  • Last Updated: 23 Aug 2026, 04:45 PM IST

Dandwat pranam mahatva: हिंदू धर्म में भगवान के समक्ष पूरी तरह जमीन पर लेटकर प्रणाम करने की परंपरा को "दंडवत प्रणाम" या "साष्टांग प्रणाम" कहा जाता है। मान्यता है कि यह भक्ति और समर्पण व्यक्त करने का सबसे उत्तम तरीका है, क्योंकि इसमें भक्त अपने अहंकार को पूरी तरह त्यागकर भगवान के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देता है। यही कारण है कि बड़े मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर आज भी कई श्रद्धालु दंडवत प्रणाम करते नजर आते हैं।

'साष्टांग' शब्द का धार्मिक अर्थ
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, "साष्टांग" शब्द संस्कृत के "अष्ट" और "अंग" से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है शरीर के आठ अंगों को जमीन से स्पर्श कराना। इनमें दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों घुटने, छाती और माथा शामिल होते हैं। मान्यता है कि जब भक्त इन सभी आठ अंगों को भूमि पर टिकाकर प्रणाम करता है, तो यह उसके संपूर्ण शरीर, मन और आत्मा के समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि दंडवत प्रणाम को भक्ति की सबसे उच्च अवस्था माना जाता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने अहंकार को पूरी तरह भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है।

दंडवत प्रणाम करने का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि दंडवत प्रणाम करने से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है और भक्त के जीवन से नकारात्मकता व अहंकार दूर होता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि इस प्रकार का प्रणाम करने से भक्त के मन में विनम्रता और श्रद्धा का भाव और गहरा होता है। कई मंदिरों में विशेष रूप से एकादशी, नवरात्रि या किसी बड़े पर्व के दौरान भक्त दंडवत प्रणाम करते हुए मंदिर परिसर की परिक्रमा भी करते हैं।

दंडवत प्रणाम करने की सही विधि
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, दंडवत प्रणाम करते समय सबसे पहले खड़े होकर हाथ जोड़ने चाहिए, फिर धीरे-धीरे घुटनों के बल झुककर पूरे शरीर को जमीन पर सीधा लेटा देना चाहिए, जिसमें हाथ आगे की ओर फैले हों। मान्यता है कि इस दौरान मन में भगवान का ध्यान करना और श्रद्धा भाव बनाए रखना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे उठकर हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करना चाहिए।

किन अवसरों पर किया जाता है दंडवत प्रणाम?
हिंदू परंपरा में मंदिर दर्शन, तीर्थ यात्रा, गुरु के समक्ष और बड़े धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान दंडवत प्रणाम करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। कुछ श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर मंदिर तक दंडवत प्रणाम करते हुए यानी लेट-लेटकर पहुंचने की भी परंपरा निभाते हैं, जिसे अत्यंत कठिन तपस्या और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

आज भी कई श्रद्धालु निभाते हैं यह परंपरा
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन दंडवत प्रणाम करने की यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आज भी देशभर के प्रमुख मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर भक्त भगवान के प्रति अपनी गहरी आस्था प्रकट करने के लिए दंडवत प्रणाम करते नजर आते हैं।

डिस्क्लेमर (Disclaimer) : इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी शारीरिक क्रिया को अपनाने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान अवश्य रखें।