हाथ से निकल रहीं मास्टर प्लान की जमीनें:ग्रीन बेल्ट पर पंप-मॉल बने, कोर्ट में पक्ष तक नहीं रख पा रहे अफसर

इंदौर20 मिनट पहलेलेखक: राहुल दुबे

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इंदौर को हरियाली से घिरे शहर के रूप में विकसित करने के लिए मास्टर प्लान में जमीनें सुरक्षित रखी गईं, लेकिन अब यही जमीनें धीरे-धीरे हाथ से निकल रही हैं। 2008 में लागू मास्टर प्लान में शहर के आसपास हरियाली, गार्डन, सिटी फॉरेस्ट और खुले मैदानों के लिए कुल नियोजित क्षेत्र का 10 फीसदी हिस्सा ग्रीन बेल्ट के रूप में आरक्षित किया गया था।

अब जमीन मालिक इन आरक्षित जमीनों का सालों से उपयोग नहीं होने को आधार बनाकर लैंडयूज बदलवाने की कोशिश कर रहे हैं।

सरकार जब ऐसे प्रस्ताव खारिज करती है तो जमीन मालिक कोर्ट पहुंचते हैं। हाई कोर्ट से अपने पक्ष में आदेश मिलते ही लैंडयूज बदलने का रास्ता खुल जाता है।

सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसे मामलों में इंदौर विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगरीय आवास एवं विकास विभाग सहित संबंधित विभाग कई बार आदेश के खिलाफ अपील तक नहीं करते।

यानी जिस मास्टर प्लान को शहर के भविष्य की रीढ़ माना गया, उसकी जमीनें ही एक-एक करके कमजोर होती जा रही हैं।

केस 1 : करोड़ों की जमीन पर मंडी बस स्टैंड का आरक्षण भी खतरे में

एक गांव में पूर्व विधायक की करीब 250 करोड़ रु. की जमीन का मामला बड़ा उदाहरण है। यहां मास्टर प्लान में मंडी और बस स्टैंड के लिए जमीन आरक्षित की गई थी। प्रस्तावित लैंडयूज के मुताबिक काम नहीं हुआ तो विधायक ने याचिका दायर की। कोर्ट ने उपयोग बदलने के आदेश दिए। शासन ने अब तक इसे चुनौती नहीं दी है।

केस 2 : खेती की जमीन पर मॉल को अनुमति

तेजपुर गड़बड़ी की हाउसिंग सोसायटी की जमीन पर मॉल का निर्माण शुरू हुआ। जमीन खेती के लिए थी। निगम-प्रशासन ने अनुमतियां निरस्त की तो मालिक कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने अनुमतियों को बहाल करने के आदेश दिए। पर किसी विभाग ने चुनौती नहीं दी।

केस 3 : 2.1 किमी की रोड... ग्रीन बेल्ट पर पंप और मॉल

माणिक बाग ब्रिज से राजीव प्रतिमा चौराहे तक करीब 2.1 किमी सड़क के दोनों तरफ की जमीनें मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट के लिए आरक्षित हैं। इसके बावजूद पूरी लेन में दोनों तरफ पेट्रोल पंप खुल चुके हैं। ग्रीन बेल्ट में मैरिज गार्डन की अनुमति हो सकती है, लेकिन अब इन गार्डन की जमीन पर भी मॉल खड़े हो रहे हैं। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने शपथ पत्र पर ही लैंडयूज बदल दिया था।

सड़क में मास्टर प्लान याद, ग्रीन बेल्ट के लिए नहीं

अधिवक्ता अंशुमान श्रीवास्तव के मुताबिक लैंडयूज बदले जाने के मामलों में विभाग बड़ी लापरवाही बरत रहे हैं। अफसर कोर्ट में सही तरीके से पक्ष तक नहीं रख पाते। सड़क बनानी होती है तो सरकारी विभाग निजी जमीन हासिल करने के लिए मास्टर प्लान का हवाला देते हैं, लेकिन ग्रीन बेल्ट या दूसरे आरक्षित उपयोग की जमीन का मामला कोर्ट पहुंचता है तो विभाग कमजोर पड़ जाते हैं।

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