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दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा में अब किसान परंपरागत धान की खेती से बाहर निकलकर मिलेट्स और दूसरी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। कृषि विभाग के फसल विविधीकरण और मिलेट्स संवर्धन के प्रयासों का असर अब खेतों में दिखाई देने लगा है। जिले में पिछले साल की तुलना में कोदो-कुटकी और रागी का रकबा करीब 1200 हेक्टेयर बढ़ गया है। वहीं 100 से ज्यादा किसान धान की जगह दूसरी फसलों की खेती की ओर शिफ्ट हो चुके हैं।

इस बदलाव की मिसाल ग्राम कसौली-2 के प्रगतिशील किसान बोसाराम अटामी हैं। उन्होंने पारंपरिक धान की खेती छोड़कर करीब 25 एकड़ में रागी (मड़िया) की बुवाई की है। कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के बाद उन्होंने फसल विविधीकरण का निर्णय लिया। उनका कहना है कि रागी में धान की तुलना में कम पानी और लागत कम लगती है और बाजार मिलने पर आमदनी भी बेहतर हो सकती है।

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार दंतेवाड़ा में इस वर्ष कोदो 2900 हेक्टेयर, कुटकी 14 हजार हेक्टेयर और रागी 1090 हेक्टेयर में बोई गई है। कुल रकबा करीब 17,990 हेक्टेयर हो गया है। पिछले साल की तुलना में इसमें करीब 1200 हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। पहले जिले में अधिकांश किसान धान की खेती पर ही निर्भर रहते थे। अब कृषि विभाग किसानों को कम पानी और कम लागत वाली फसलों के विकल्प बता रहा है। इसके चलते पिछले दो वर्षों में खेती के पैटर्न में बदलाव दिखाई दे रहा है।

कृषि विभाग के अनुसार धान के स्थान पर अन्य लाभकारी फसल लेने वाले किसानों को शासन की कृषक उन्नति योजना के तहत 15 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से इनपुट सब्सिडी डीबीटी के माध्यम से मिलने का प्रावधान है। इससे किसानों को फसल बदलने के साथ आर्थिक प्रोत्साहन भी मिल रहा है। बोसाराम ने बताया कि रागी की खेती में पानी की जरूरत कम होती है। इसके अलावा लागत भी धान की तुलना में कम आती है। रागी, कोदो और कुटकी को मोटे अनाज यानी मिलेट्स की श्रेणी में रखा जाता है। इनमें फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। इनका उपयोग पारंपरिक भोजन के साथ आटा, दलिया, बिस्किट और अन्य खाद्य उत्पादों में भी बढ़ रहा है। बढ़ती मांग के कारण किसानों के लिए इनके बाजार की संभावनाएं भी बढ़ रही है। खेती के लिहाज से भी मिलेट्स को कम पानी में उगाया जा सकता है। दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्र में जहां कई किसान बारिश आधारित खेती पर निर्भर हैं, वहां कम पानी वाली फसल जोखिम कम कर सकती है।