अमेजन के घने जंगलों में जब पेड़ गिरते हैं, तो उनके पीछे सिर्फ लकड़ी की जरूरत नहीं होती. कई बार उनकी जगह मवेशियों के लिए चरने की जमीन तैयार की जा रही होती है. दुनिया के सबसे बड़े बीफ प्रोड्यूसर्स में शामिल ब्रिक्स देश ब्राजील में जंगलों की कटाई और गोमांस की बढ़ती मांग के बीच यही रिश्ता अब एक बड़े पर्यावरणीय सवाल के रूप में सामने आ रहा है. साल 2001 से अब तक दुनियाभर में खेती के लिए जितने जंगल काटे गए हैं, उनका कुल एरिया ब्रिटेन से पांच गुना ज्यादा है, लेकिन इस नुकसान की सबसे बड़ी वजह कोई अनाज या सब्जी नहीं, बल्कि मवेशियों को चराने के लिए जमीन तैयार करना है.

Our World in Data की रिपोर्ट के मुताबिक, खेती के लिए होने वाली ग्लोबल वनों की कटाई में करीब 41 प्रतिशत हिस्सा बीफ प्रोडक्शन के लिए बनाए गए चरागाहों का है. ब्राजील में यह सबसे ज्यादा हुआ है. बीफ के लिए होने वाली ग्लोबल वनों की कटाई का करीब 63 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी देश में हुआ है. यानी दुनिया में खेती के लिए काटे जा रहे जंगलों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा ब्राजील की बीफ इंडस्ट्री से जुड़ा है.

बीफ बना जंगलों की कटाई का सबसे बड़ा कारण

दुनिया में खेती के लिए जंगल काटने की वजहों को देखें, तो बीफ प्रोडक्शन सबसे आगे है. करीब 41 प्रतिशत कटाई मवेशियों के लिए चरने की जमीन बनाने में हुई. इसके मुकाबले सोया और पाम ऑयल जैसी तिलहन फसलों का हिस्सा 16 प्रतिशत रहा. लकड़ी और कागज इंडस्ट्री तथा अनाज की खेती की हिस्सेदारी 12-12 प्रतिशत रही. इसका मतलब यह नहीं कि हर जगह जंगल काटने की वजह बीफ ही है, लेकिन ग्लोबल लेवल पर खेती के लिए होने वाली वनों की कटाई में मांस उत्पादन का योगदान सबसे बड़ा है. और इस तस्वीर को समझने के लिए ब्राजील एक अहम उदाहरण बनकर सामने आता है.

अमेजन और सेराडो की कीमत पर बढ़ता पशुपालन

ब्राजील में मवेशियों के लिए बनाई गई नई चरने की जमीन का विस्तार दुनिया के दो बेहद महत्वपूर्ण नेचर सिस्टम्स अमेजन रेनफॉरेस्ट और सेराडो सवाना पर भारी पड़ा है. ये इलाके जैव विविधता के बड़े केंद्र हैं और क्लाइमेट चेंज के खिलाफ भी अहम भूमिका निभाते हैं. जंगलों को चरागाह में बदलने का असर सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं रहता. इससे जंगली जानवरों के रहने की जगह खत्म होती है, कार्बन का भंडार कम होता है और स्थानीय पर्यावरण का संतुलन प्रभावित होता है. यही वजह है कि ब्राजील की बीफ इंडस्ट्री को लेकर पर्यावरणीय बहस लगातार तेज होती रही है.

एक्सपोर्ट से ज्यादा घरेलू मांग का दबाव

आमतौर पर जब किसी देश में बड़े पैमाने पर जंगल काटे जाते हैं, तो उसकी वजह विदेशी बाजारों की मांग मानी जाती है. लेकिन ब्राजील के मामले में तस्वीर कुछ अलग है. 2005 से 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में कमोडिटी की मांग से जुड़ी वनों की कटाई का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत के लिए होने वाले प्रोडक्शन से जुड़ा था. एक्सपोर्ट से जुड़ी कटाई का हिस्सा करीब 15 प्रतिशत रहा. इसी अवधि में बीफ प्रोडक्शन के लिए करीब 2.7 करोड़ हेक्टेयर जंगल काटे गए, जो ब्राजील की कुल वनों की कटाई का लगभग 87 प्रतिशत है. इसके मुकाबले सोया की खेती के लिए करीब 27 लाख हेक्टेयर जंगल काटे गए.

ब्राजील में बढ़ रही बीफ की मांग

इस कहानी का एक अहम पहलू ब्राजील के भीतर बढ़ती मांस की खपत है. पिछले 50 सालों में वहां प्रति व्यक्ति मांस की खपत दोगुनी हो चुकी है. आज औसत ब्राजीलियाई नागरिक यूरोप के औसत नागरिक से करीब तीन गुना ज्यादा बीफ खाता है. जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था और आबादी बढ़ी, घरेलू बाजार में मांस की मांग भी बढ़ती गई. इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पशुपालन का विस्तार हुआ और कई जगह जंगलों को चरागाह में बदला गया. यानी ब्राजील में जंगलों की कटाई की कहानी सिर्फ विदेशी कंपनियों या इंटरनेशनल मार्केट की नहीं है. इसका एक बड़ा हिस्सा देश के भीतर बढ़ती खपत से भी जुड़ा है.

यह डेटा बताता है कि ब्राजील में वनों की कटाई रोकने की कोशिश सिर्फ एक्सपोर्ट पर रोक लगाने या विदेशी बाजारों के दबाव तक सीमित नहीं रह सकती. घरेलू मांग, पशुपालन की प्रोडक्टिविटी और जमीन के इस्तेमाल की नीतियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा चरागाहों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाना, ताकि नए जंगल काटकर जमीन तैयार करने की जरूरत कम हो, इस समस्या से निपटने का एक अहम रास्ता हो सकता है. लेकिन जब तक ब्राजील में बढ़ती बीफ की मांग और जंगलों के विस्तार के बीच संतुलन बनाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक अमेजन और सेराडो जैसे अनमोल नेचर सिस्टम्स पर दबाव बना रहेगा.

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देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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