
जनजातीय मंत्रालय के रुख की कांग्रेस ने की आलोचनाImage Credit source: Getty Images/Pixabay
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने विद्युत मंत्रालय को स्पष्ट किया है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत गैर-वन उद्देश्यों के लिए वन भूमि के डायवर्जन या दूसरे चरण की वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति लेना अनिवार्य नहीं है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामले उसके अधिकार क्षेत्र या दायरे में नहीं आते हैं. दरअसल, राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) की परियोजनाओं में देरी और ‘100% ग्राम सभा की सहमति’ के प्रावधान को एक बड़ी बाधा बताए जाने के बाद इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हुई थी.
अब कांग्रेस पार्टी ने इस नए रुख की तीखी आलोचना करते हुए इसे आदिवासियों के अधिकारों को कमजोर करने वाला और सांविधिक जिम्मेदारी से पीछे हटना बताया है. कांग्रेस के दलित समाज से आने वाले सांसद डॉ. अमर सिंह का कहना है कि कांग्रेस की सरकारें आदिवासियों और दलितों के हक की बात करती थीं, लेकिन ये तो आदिवासी -दलित विरोधी बड़े लोगों की सरकार है, हम इसका विरोध करेंगे.
ग्राम सभा की सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं
जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने 31 अगस्त को कहा था कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 या इसके अंतर्गत बनाए गए नियमों में दूसरे चरण की वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है और कहा था कि ऐसे मामले उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं. वन अधिकार अधिनियम में स्पष्ट रूप से जनजातीय मामलों के मंत्रालय को कानून के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार नोडल मंत्रालय के रूप में नामित किया गया है.
मंत्रालय ने पहले भी निकोबार मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना और मध्य प्रदेश, कर्नाटक और अन्य राज्यों में वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन मामलों में अपनी भूमिका से इनकार किया है, यह तर्क देते हुए कि अधिनियम कार्यान्वयन का अधिकार राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सरकारों को देता है.
संसदीय समिति ने क्या प्रस्ताव रखा था और क्यों?
संसदीय स्थायी समिति ने 3 अगस्त को एनएचपीसी लिमिटेड पर रिपोर्ट पेश की और इसके बाद विद्युत मंत्रालय ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श किया. एनएचपीसी के अधिकारियों के साथ हुई चर्चा के आधार पर समिति ने निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए औसतन 106 महीने का वन मंजूरी समय दर्ज किया. हालांकि इसमें पाया गया कि सभी संबंधित ग्राम सभाओं की सहमति की जरूरत ही सबसे महत्वपूर्ण अड़चन है. तीस्ता-IV जलविद्युत परियोजना अनिश्चितकाल के लिए रुकी हुई है, क्योंकि कुछ ग्राम पंचायतों की सहमति अभी भी लंबित है.
समिति ने राष्ट्रीय महत्व की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के लिए प्रभावित ग्राम सभाओं के 70 से 75 प्रतिशत की सहमति सहित योग्य सुपर-बहुमत की एनएचपीसी की सिफारिश का समर्थन किया था और समिति ने विद्युत मंत्रालय से जनजातीय मामलों के मंत्रालय के साथ इस प्रस्ताव की जांच करने को कहा था.
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कुमार विक्रांत
टीवी9 भारतवर्ष में नेशनल अफेयर्स एडिटर हैं. इससे पहले आजतक, एनडीटीवी और ईटीवी में सेवाएं दे चुके हैं. फ़िल्म, संगीत और खेलों का शौक.
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