शादी को पति-पत्नी के भरोसे का रिश्ता माना जाता है, लेकिन अब सवाल है कि पत्नी की मर्जी के खिलाफ पति के यौन संबंध को रेप माना जाए या नहीं? भारत में BNS की धारा 63 रेप की परिभाषा बताती है, लेकिन अपवाद-2 के तहत 18 साल या उससे ज्यादा उम्र की पत्नी के साथ पति के यौन संबंध को रेप नहीं माना जाता.

इसी प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. 9 सितंबर 2026 को कोर्ट ने करीब तीन हफ्ते बाद मामले की अंतिम सुनवाई शुरू करने को कहा. कोर्ट मुख्य रूप से देखेगा कि क्या पति पर रेप का केस चल सकता है और क्या यह कानूनी छूट संविधान के मुताबिक सही है?

अपवाद को हटाने का विरोध

इस मामले की चर्चा इसलिए भी अहम है क्योंकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस अपवाद को हटाने का विरोध किया है. हालांकि, सरकार का रुख यह नहीं है कि पत्नी की सहमति की कोई अहमियत नहीं है.

अपने हलफनामे में केंद्र ने साफ कहा है कि शादी महिला की सहमति को खत्म नहीं करती और उसकी इच्छा के खिलाफ यौन संबंध गलत हैं. लेकिन, सरकार का कहना है कि शादी के भीतर ऐसे मामलों को रेप की सामान्य धारा में लाना अलग तरह के सामाजिक और कानूनी असर पैदा करेगा.

अलग-अलग कानून बने हैं

केंद्र के मुताबिक, शादी सिर्फ दो लोगों का निजी रिश्ता नहीं है, बल्कि इससे परिवार, बच्चे और कई सामाजिक-कानूनी जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं. सरकार का तर्क है कि संसद ने पहले से ही घरेलू हिंसा, क्रूरता और यौन हिंसा से निपटने के लिए अलग-अलग कानूनी रास्ते बनाए हैं.

इसलिए रेप की सबसे कठोर धाराओं को वैवाहिक रिश्ते में लागू करना संसद के नीति-निर्णय का विषय होना चाहिए.

मामला फिर से क्यों शुरू हुआ?

  • मई 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट का बंटा फैसला आया.
  • इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
  • 2023 में नए कानून BNS आने के बाद भी अपवाद जारी रहा.
  • 9 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने फिर मामले को सुनवाई के लिए आगे बढ़ाया.

फैसला बंटने के बाद SC का रुख

मई 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच इस मुद्दे पर एक राय नहीं बना सकी थी. जस्टिस राजीव शकधर ने वैवाहिक रेप के अपवाद को असंवैधानिक मानने की राय दी, जबकि जस्टिस सी हरि शंकर ने इसे बरकरार रखने के पक्ष में फैसला दिया. इस बंटे फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. अब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल है कि क्या शादी के कारण पति को पत्नी की इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने पर रेप के आरोप से कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए.

Centre On Marital Rape

दो सवाल पर विचार करेगा SC

2023 में IPC की जगह BNS लागू होने के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ. BNS की धारा 63 के अपवाद-2 में भी 18 साल या उससे ज्यादा उम्र की पत्नी के साथ पति के यौन संबंध को रेप की सामान्य श्रेणी से बाहर रखा गया है. इसलिए अब बहस सिर्फ पुराने IPC की धारा 375 तक सीमित नहीं है, बल्कि नए BNS के प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर भी है. सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितंबर को साफ किया कि वह दो सवालों पर विचार करेगा-

  1. पहला, अगर यह अपवाद कानून में बना रहता है तो क्या फिर भी किसी पति पर रेप का मुकदमा चलाया जा सकता है?
  2. दूसरा, क्या खुद यह अपवाद संविधान के खिलाफ है?

केंद्र की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करना संसद का काम है, न कि सुप्रीम कोर्ट का. सुनवाई के दौरान वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान BNS के संबंधित प्रावधानों पर दिलाया और नए आपराधिक कानून में दिए गए वैवाहिक अपवाद की सीमा पर सवाल उठाए. पीठ के सामने यौन अपराधों से जुड़े कुछ प्रावधानों के लिंग-विशिष्ट स्वरूप यानी नेचर ऑफ जेंडर का मुद्दा भी रखा गया. वकीलों ने सामूहिक बलात्कार से जुड़े BNS के प्रावधान कि सरकार अपना जवाब पहले ही दाखिल कर चुकी है.

सरकार ने मैरिटल रेप को लेकर क्या तर्क दिया?

  • सहमति खत्म नहीं होती, लेकिन शादी का रिश्ता अलग है केंद्र सरकार का कहना है कि शादी के बाद भी महिला की सहमति जरूरी है, लेकिन वैवाहिक रिश्ते को सामान्य रेप के मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता.
  • महिला के पास पहले से कानूनी उपाय हैं सरकार के मुताबिक घरेलू हिंसा कानून, क्रूरता और दूसरे कानूनी प्रावधानों के जरिए पत्नी जबरदस्ती या यौन शोषण के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है.
  • रेप कानून में शामिल करने का फैसला संसद करे केंद्र का तर्क है कि मैरिटल रेप को अलग अपराध बनाना या उसे रेप की श्रेणी में लाना कानून बनाने का मामला है. इस पर फैसला संसद को करना चाहिए, कोर्ट को नहीं.
  • परिवार और सामाजिक व्यवस्था पर असर की दलील सरकार ने पुराने लॉ कमीशन और संसदीय समिति की राय का हवाला देते हुए कहा कि ऐसा कानून शादी और परिवार व्यवस्था पर व्यापक सामाजिक-कानूनी असर डाल सकता है.
  • मौजूदा कानून में संतुलन बनाया गया है केंद्र का कहना है कि संसद ने महिला की गरिमा और सुरक्षा के लिए अलग कानूनी रास्ते दिए हैं, इसलिए वैवाहिक रिश्ते में रेप की धारा लागू न करना एक सोच-समझकर किया गया कानूनी फैसला है.

केंद्र सरकार ने विरोध क्यों किया?

केंद्र सरकार की सबसे बड़ी दलील यह है कि मैरिटल रेप को अपराध बनाना सिर्फ कानूनी सवाल नहीं, बल्कि बड़ा सामाजिक सवाल भी है. सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि अपराध को तय करना या किसी अपराध को कानून में शामिल करना मुख्य तौर पर संसद की विधायी नीति का हिस्सा है. इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और दूसरे पहलुओं को देखना जरूरी है. केंद्र ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से भी इस मुद्दे पर राय मांगी थी.

मुद्दे पर राज्यों की राय भी एक जैसी नहीं है.

मैरिटल रेप को लेकर राज्यों की राय भी एक जैसी नहीं है. 19 राज्यों ने इस मुद्दे पर अपनी राय दी थी. इनमें दिल्ली, त्रिपुरा और कर्नाटक ने वैवाहिक रेप को लेकर मौजूदा कानूनी अपवाद हटाने का समर्थन किया. वहीं 10 राज्यों ने अपवाद को बनाए रखने के पक्ष में राय दी, जबकि 6 राज्यों ने इस मुद्दे पर कोई साफ रुख नहीं बताया.

Marital Rape Data India

फिर महिला को कौन-कौन से कानूनी रास्ते मिलते हैं?

केंद्र के हलफनामे में IPC की धारा 354, 354A, 354B और 498A तथा घरेलू हिंसा कानून का जिक्र किया गया है. सरकार के मुताबिक, ये प्रावधान महिला के साथ मारपीट, यौन उत्पीड़न, जबरदस्ती, क्रूरता और दूसरे तरह के शोषण पर कार्रवाई का रास्ता देते हैं. घरेलू हिंसा कानून में यौन हिंसा को भी घरेलू हिंसा माना गया है. इसमें ऐसा यौन व्यवहार शामिल है जो महिला को अपमानित करे, उसकी गरिमा को चोट पहुंचाए या उसे नीचा दिखाए.

सरकार को परिवार टूटने की भी चिंता

केंद्र ने अपने पक्ष में पुरानी कानून आयोग और संसदीय समिति की रिपोर्टों का हवाला दिया है. 172वें लॉ कमीशन ने मैरिटल रेप के कानूनी अपवाद को हटाने की सिफारिश नहीं की थी. 2013 की गृह मामलों की स्थायी समिति ने भी चिंता जताई थी कि इसे अपराध बनाने से परिवार और विवाह संस्था पर असर पड़ सकता है.

राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी अपवाद बनाए रखने की राय दी थी. आयोग ने माना कि पत्नी की मर्जी के खिलाफ सेक्स उसकी आजादी का उल्लंघन है, लेकिन इसे सीधे रेप की श्रेणी में लाने से पति की गिरफ्तारी के बाद पत्नी और बच्चों के सामने आर्थिक और सामाजिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं की दलील क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शादी से महिला की अपनी मर्जी और शरीर पर अधिकार खत्म नहीं होता. सेक्स के लिए उसकी सहमति जरूरी है. अगर पत्नी की इच्छा के खिलाफ पति जबरदस्ती करता है, तो सिर्फ शादी का रिश्ता होने के कारण उसे रेप की श्रेणी से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि विवाह का मतलब व्यक्तिगत आजादी खत्म होना नहीं है. NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक, 18-49 साल की करीब 6% विवाहित महिलाओं ने पति की ओर से यौन हिंसा का अनुभव बताया. करीब 32% ने शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा की बात कही.

अंकिता

अंकिता

शिव की नगरी काशी से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अंकिता पाण्डेय ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी की है.  पत्रकारिता में आने के लिए उन्होंने बनारस के लोकल न्यूज पेपर "काशीवार्ता" से अपनी शुरुआत की, बाद में दिल्ली जैसे महानगरी का रुख करते हुए उन्होंने TV9 भारतवर्ष में अक्टूबर साल 2023 से जुड़ी. आज वह इस ऑर्गनाइजेशन में बतौर सब-एडिटर काम कर रही हैं. क्राइम, एंटरटेनमेंट और अन्य सभी को न्यूज के साथ विजुअल तरीके से पेश करने में रुचि है. पत्रकारिता के अलावा कविताएं लिखना, फोटोग्राफी करना और म्यूजिक का भी शौक रखती हैं.

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