हाई कोर्ट ने ‘तलाक-ए-हसन’ को कानूनी तरीका बताया, रोक से इनकार; यह तीन तलाक से कैसे अलग
Sep 11, 2026 03:20 pm ISTभाषा

याचिकाकर्ता के अनुसार, उसकी शादी साल 2016 में हुई थी। बाद में दोनों के बीच मतभेद पैदा हो गए और उसकी पत्नी ने 2018 में अपना ससुराल छोड़ दिया। दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिशें भी सफल नहीं हुईं और तलाक हो गया।

यह सांकेतिक तस्वीर है।
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने तलाक के रजिस्ट्रेशन से संबंधित रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि 'तलाक-ए-हसन' तलाक का एक वैध तरीका है और देश में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को अपने तलाक का पंजीकरण कराने के लिए बारपेटा क्षेत्र के विवाह व तलाक पंजीयक से संपर्क करने का निर्देश दिया। असम मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024 के तहत यह आदेश दिया गया। जज अरुण देव चौधरी ने 'तलाक-ए-हसन' के जरिए दिए गए तलाक के रजिस्ट्रेशन से संबंधित रिट याचिका पर सुनवाई के बाद मंगलवार को यह आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसकी शादी 2016 में हुई थी। बाद में दोनों के बीच मतभेद पैदा हो गए और उसकी पत्नी ने 2018 में अपना ससुराल छोड़ दिया। दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिशें भी सफल नहीं हुईं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 22 मार्च, 26 अप्रैल और 27 मई 2026 को तीन अलग-अलग तारीखों पर 'तलाक-ए-हसन' दिया और फिर कानून के तहत तलाक के पंजीकरण के लिए संबंधित अथॉरिटी से संपर्क किया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 'तलाक-ए-हसन' पर कोई प्रतिबंध नहीं है और उसने इसकी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तलाक दिया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा
राज्य सरकार ने अदालत से कहा कि 1935 के पुराने कानून को निरस्त किया जा चुका है और उसके तहत नियुक्त अथॉरिटी का पद भी समाप्त कर दिया गया है इसलिए उस व्यवस्था के तहत अब तलाक का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा सकता। जज चौधरी ने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से दिया गया 'तलाक-ए-हसन', तलाक का वैध तरीका है और मौजूदा समय में देश में इस पर प्रतिबंध नहीं है। हालांकि, अदालत ने 1935 के कानून के तहत बारपेटा में नियुक्त अथॉरिटी को तलाकनामा पंजीकृत करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह कानून निरस्त किया जा चुका है और उसके तहत सृजित पद भी समाप्त कर दिया गया है।
अदालत ने याचिकाकर्ता को 2024 के कानून के तहत संबंधित क्षेत्र के विवाह और तलाक पंजीयक से संपर्क करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पंजीयक को यह जांच करनी होगी कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में तलाक दिया है या नहीं और उसे उसकी पहचान की पुष्टि करनी होगी। इसके बाद वह तय करेगा कि अधिनियम की धारा 12 के तहत तलाक का पंजीकरण किया जाना है या नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर पंजीकरण से इनकार किया जाता है तो याचिकाकर्ता 2024 के अधिनियम की धारा 17 के तहत अपील कर सकता है। जज ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की पत्नी को उचित मंच पर 'तलाक-ए-हसन' को चुनौती देने की स्वतंत्रता होगी। याचिकाकर्ता की पत्नी नोटिस दिए जाने के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुई। अदालत ने इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निपटारा कर दिया।
‘तलाक-ए-हसन’ क्या है?
‘तलाक-ए-हसन’ मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक का एक ऐसा तरीका है, जिसमें पति तीन अलग-अलग मौकों पर तलाक की घोषणा करता है। पहली घोषणा के बाद करीब एक महीने तक पति-पत्नी के बीच संबंध बहाल हो जाएं तो तलाक वापस माना जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो अगले महीने दूसरी घोषणा की जाती है। इसके बाद भी सुलह नहीं होने पर तीसरी घोषणा की जाती है। इन घोषणाओं के बीच वैवाहिक संबंध नहीं होने चाहिए और तलाक की घोषणा पत्नी के ‘तुअहर’ यानी मासिक धर्म के बीच की पवित्र अवधि में की जाती है। पहली और दूसरी घोषणा को वापस लिया जा सकता है, लेकिन तीसरी घोषणा के बाद तलाक वापस नहीं हो सकता है।