भगवान की पूजा में बांए हाथ का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? जानें इसका धार्मिक महत्व
पूजा-पाठ में हमेशा दाहिने हाथ का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? जानें बांए हाथ से जुड़ी धार्मिक मान्यता, सही नियम और इसके पीछे का कारण।
पूजा-पाठ में हमेशा दाहिने हाथ का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? (Ai Image)
- Published: 13 Sep 2026, 01:17 PM IST
- Last Updated: 13 Sep 2026, 01:17 PM IST
Puja Tips: हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ के दौरान भगवान को कुछ भी अर्पित करने, तिलक लगाने या आचमन करने के लिए हमेशा दाहिने हाथ का इस्तेमाल करने की परंपरा है। मान्यता है कि बांए हाथ से पूजा से जुड़ा कोई भी कार्य करना अशुभ माना जाता है, इसी वजह से पूजा-पाठ के दौरान इस नियम का विशेष ध्यान रखा जाता है।
दाहिने हाथ को क्यों माना जाता है शुभ?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, दाहिने हाथ को शक्ति, कर्म और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि बांए हाथ को सामान्यतः अशुद्ध कार्यों से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि प्राचीन काल से ही बांए हाथ का इस्तेमाल शौच जैसी अशुद्ध क्रियाओं के लिए किया जाता रहा है, इसी वजह से इसे पूजा जैसे पवित्र कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि दाहिना हिस्सा सूर्य और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा माना जाता है, इसी वजह से इसे शुभ कार्यों के लिए चुना जाता है।
पूजा में दाहिने हाथ का इस्तेमाल कहां-कहां होता है?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भगवान को तिलक लगाने, फूल अर्पित करने, आचमन करने, दीपक जलाने और आरती उतारने जैसे लगभग सभी पूजा कार्यों में दाहिने हाथ का इस्तेमाल करना अनिवार्य माना जाता है। मान्यता है कि दान देते समय भी दाहिने हाथ का इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे देने और अर्पित करने की क्रिया के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
बांए हाथ का इस्तेमाल कब होता है उचित?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुछ विशेष परिस्थितियों में बांए हाथ का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जैसे किसी भारी वस्तु को सहारा देने के लिए या दाहिने हाथ की सहायता के तौर पर। मान्यता है कि जब दोनों हाथों से कोई पूजा सामग्री उठाई जाती है, तो इसे शुभ माना जाता है, क्योंकि इसमें समर्पण का भाव और भी गहरा होता है।
इस नियम के पीछे का व्यावहारिक कारण
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इस परंपरा के पीछे एक व्यावहारिक कारण भी बताया जाता है। प्राचीन समय में स्वच्छता के लिए बांए हाथ का इस्तेमाल कुछ खास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया था, इसी वजह से पूजा जैसे पवित्र कार्यों में इससे परहेज करने की सलाह दी जाने लगी, ताकि स्वच्छता और पवित्रता दोनों बनी रहें।
आज भी हर पूजा में निभाया जाता है यह नियम
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तौर-तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन दाहिने हाथ से पूजा करने की यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आज भी हर छोटी-बड़ी पूजा में लोग इस नियम का ध्यान रखते हुए दाहिने हाथ से ही भगवान को कुछ भी अर्पित करते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।