कैसे काम करता है वायरलेस ब्रेन इम्प्लांट, जिससे बोलने लगते हैं पैरालाइज्ड लोग?
वायरलेस ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस दिमाग के सिग्नल को पढ़कर उन्हें टेक्स्ट या कंप्यूटर से बनाई गई आवाज में बदल सकता है, जिससे बोल न पाने वाले लोग संवाद कर सकते हैं.
Written By : निर्जला गौड़ | Updated at : 17 Sep 2026 05:23 PM (IST)

वायरलेस ब्रेन इम्प्लांट
Source : pexels
पैरालिसिस या न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कारण कई लोगों के लिए बोलना बेहद मुश्किल हो जाता है. जबकि उनके दिमाग में अपनी बात कहने की क्षमता बनी रहती है. ऐसे लोगों के लिए वैज्ञानिक Brain computer interface यानी BCI पर काम कर रहे हैं. इसमें दिमाग से मिलने वाले न्यूरल सिग्नल को रिकॉर्ड करके आर्टिफीशिअल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की मदद से समझा जाता है और फिर उसे शब्दों या आवाज में बदला जाता है. 2026 में अमेरिका में वायरलेस और पूरी तरह इम्प्लांटेबल BCI को पहली बार इंसान में लगाया गया जिसे बोलने में परेशानी वाले मरीजों को टेस्ट किया जा रहा है.
सबसे पहले दिमाग में लगाया जाता है खास इम्प्लांट
इस तकनीक का पहला हिस्सा ब्रेन इम्प्लांट है. इसमें बहुत छोटे एलेक्ट्रोड़ लगाए जाते हैं. उदहारण के लिए Paradromics के connexus BCI में 421 माइक्रोएलेक्ट्रोड़ हैं, जो दिमाग की अलग-अलग न्यूरल एक्टिविटी को रिकॉर्ड करते हैं. इन्हें खास तौर पर उन हिस्सों के पास लगाया जाता है जो बोलने और शरीर की गतिविधियों से जुड़े सिग्नल पैदा करते हैं. जब मरीज बोलने की कोशिश करता है या कुछ मामलों में बोलने की सोचता है तो दिमाग में पैदा होने वाले सिग्नल इन इलेक्ट्रोड तक पहुंचते हैं.
कंप्यूटर से समझे जाते हैं दिमाग के सिग्नल
सिर्फ दिमाग से सिग्नल मिल जाना काफी नहीं है, क्योंकि ये सिग्नल सीधे शब्दों की तरह कंप्यूटर को समझ नहीं आते. इसके लिए मशीन लर्निंग मॉडल को मरीज के ब्रेन सिग्नल और उसके चाह रहे शब्दों के बीच संबंध समझने के लिए ट्रेन किया जाता है. पुराने और नए BCI प्रयोगों में मरीजों को चुपचाप बोलने की कोशिश करने के लिए कहा गया और उस दौरान उनके ब्रेन सिग्नल रिकॉर्ड किए गए. इसके बाद AI ने अलग-अलग न्यूरल पैटर्न को शब्दों और आवाज से जोड़ना सीखा.
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सिग्नल बदल जाते हैं टेक्स्ट या आवाज में
जब सिस्टम को पर्याप्त ट्रेनिंग मिल जाती है, तब मरीज बोलने की कोशिश करता है और इम्प्लांट उसके ब्रेन सिग्नल को रिकॉर्ड करता है. इसके बाद कंप्यूटर उस सिग्नल को डिकोड करके शब्दों में बदलता है और जरूरत के हिसाब से टेक्स्ट या सिंथेटिक आवाज तैयार करता है. 2025 में लॉन्च एक अध्ययन में एक महिला के ब्रेन सिग्नल को 80 मिलीसेकंड के अंतराल पर डिकोड करके स्ट्रीमिंग स्पीच तैयार की गई थी. दूसरे एक्सपेरिमेंट में ALS से पीड़ित एक व्यक्ति के लिए ऐसी आवाज बनाई गई जो उसकी बोलने की पुरानी आवाज से मिलती-जुलती थी.
वायरलेस होने से क्या बदलेगा
वायरलेस BCI का फायदा यह है कि दिमाग में लगाए गए इलेक्ट्रोड से बाहर लगे कंप्यूटर तक सिग्नल भेजने के लिए शरीर से निकलने वाली तारों पर निर्भरता कम की जा सकती है. 2026 में University of Michigan Health ने Paradromics के Connexus BCI का पहला इंसानी इम्प्लांट किया. इस डिवाइस में ब्रेन सिग्नल पहले छाती में मौजूद छोटे ट्रांससीवर तक जाते हैं और वहां से बहार के रिसीवर तक भेजे जाते हैं. फिलहाल यह तकनीक क्लिनिकल ट्रायल के दौर में है और इसका उद्देश्य यह जांच करना है की, क्या यह लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से बोलने में परेशानी वाले लोगों की कम्युनिकेशन में मदद कर सकती है. यानी यह अभी सामान्य इलाज नहीं है, बल्कि तेजी से विकसित हो रही मेडिकल टेक्नोलॉजी है.
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About the author निर्जला गौड़
निर्जला गौड़ इस वक्त ABP Live की लाइफस्टाइल डेस्क पर इंटर्न के तौर पर काम कर रही हैं. वह मंदसौर यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में अपनी डिग्री कर रही हैं. इससे पहले वह EBNW Stories में कंटेंट राइटर के तौर पर इंटर्नशिप कर चुकी हैं. डिजिटल जर्नलिज्म और कंटेंट क्रिएशन में उनकी खास रुचि है. आसान, आकर्षक और रिलेटेबल अंदाज में कहानियों को पेश करना और पाठकों तक जानकारी को प्रभावी तरीके से पहुंचाना उनकी खासियत है.
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Published at : 17 Sep 2026 05:23 PM (IST)
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