'रूसी इसे मार गिराने की कोशिश करेंगे': जब अफ़ग़ान पायलट विमान लेकर पहुँचा पाकिस्तान

अफ़ग़ान वायुसेना के कर्नल हाजी फ़क़ीर अहमद की अगुवाई में सोवियत संघ में बने एंतोनोव एएन-26 विमान ने सीमा पार की और उत्तरी वज़ीरिस्तान के मीरानशाह एयरबेस पर उतर गया.

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इमेज कैप्शन, अफ़ग़ान वायुसेना के कर्नल हाजी फ़क़ीर अहमद की अगुवाई में सोवियत संघ में बने एंतोनोव एएन-26 विमान ने सीमा पार की और उत्तरी वज़ीरिस्तान के मीरानशाह एयरबेस पर उतर गया
    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता
  • प्रकाशित 2 घंटे पहले

  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

2 सितंबर 1984 को अफ़ग़ानिस्तान से उड़ान भरने वाला एक सैन्य विमान अपनी तय मंज़िल पर जाने के बजाय पाकिस्तान की सीमा की तरफ़ मुड़ गया.

अफ़ग़ान वायुसेना के कर्नल हाजी फ़क़ीर अहमद की अगुवाई में सोवियत संघ में बने एंतोनोव एएन-26 विमान ने सीमा पार की और उत्तरी वज़ीरिस्तान के मीरानशाह एयरबेस पर उतर गया.

लेकिन यह सिर्फ़ एक सैन्य विमान का सीमा पार करके पाकिस्तान पहुंचना नहीं था. यह उन अफ़ग़ान सैन्य अधिकारियों के बढ़ते सिलसिले की एक अहम घटना थी, जो सोवियत संघ के समर्थन वाली अफ़ग़ान सरकार और युद्ध से बचने के लिए पाकिस्तान जा रहे थे.

अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की 23 मार्च 1979 की सार्वजनिक की गई विशेष विश्लेषण रिपोर्ट से पता चलता है कि अफ़ग़ान सेना में बग़ावत और निराशा का सिलसिला सोवियत सेना के उस साल के आख़िर में अफ़ग़ानिस्तान पहुंचने से पहले ही शुरू हो गया था.

दबाव में थी अफ़ग़ान सेना

रिपोर्ट के मुताबिक़, तराकी सरकार के सामने हथियारबंद बग़ावत का ख़तरा बढ़ रहा था. लोगों के मारे जाने, सैनिकों की अपने क़बीलों के प्रति वफ़ादारी और जीत की उम्मीद कम होने की वजह से सेना का हौसला टूट रहा था.

इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के मुताबिक़, अफ़ग़ान सेना भारी दबाव में थी.

"सेना का हौसला कम था और भर्ती किए गए युवा मौक़ा मिलते ही भाग जाते थे. इसी वजह से अफ़ग़ान सेना में सैनिकों की संख्या, जो 1978 में 1,05,000 थी, 1987 तक घटकर क़रीब 20,000 से 30,000 रह गई."

टाइम पत्रिका के 21 जनवरी 1980 के अंक में पत्रकार डेविड डिवॉस ने लिखा कि अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद सोवियत सैनिकों की संख्या अफ़ग़ान सेना से काफ़ी ज़्यादा हो गई थी.

एक रात में दागे गए तोप के 80 गोले

"काबुल की सेना में कभी एक लाख से ज़्यादा सैनिक थे. लेकिन बड़ी संख्या में सैनिकों के भागने की वजह से उनकी संख्या घटकर 65,000 से भी कम रह गई थी."

अप्रैल 1985 में टाइम पत्रिका के विलियम ई स्मिथ ने लिखा कि ख़ैबर दर्रे में लड़ाई के दौरान सोवियत संघ के समर्थन वाली अफ़ग़ान सेना के तीन सैनिक भागकर पाकिस्तान पहुंच गए. लेकिन सोवियत सेना को उनके बारे में पता चल गया.

"सफ़ेद झंडा लहराती हुई सोवियत सेना की एक बख़्तरबंद गाड़ी तोरख़म में पाकिस्तान की सीमा चौकी पर पहुंची. सोवियत कप्तान ने अंग्रेज़ी में तीनों सैनिकों को वापस करने की मांग की. अफ़ग़ान अधिकारी ने उर्दू में धमकी दी कि अगर उन्हें वापस नहीं किया गया, तो पाकिस्तान को 'कई समस्याओं' का सामना करना पड़ेगा."

"गाड़ी वापस अफ़ग़ानिस्तान चली गई. लेकिन उसी रात पाकिस्तान की चौकी पर तोप के 80 गोले दागे गए. दो दिनों तक टैंकों और तोपों से रुक-रुककर गोलाबारी होती रही. तीसरे दिन पाकिस्तान ने तीनों सैनिकों को वापस कर दिया."

अफ़ग़ान वायुसेना में बढ़ती बेचैनी

एएन-26 विमान सोवियत एंतोनोव डिज़ाइन ब्यूरो ने 1960 के दशक में तैयार किया था. यह एक मज़बूत मालवाहक विमान था. लेकिन अब इसे मीरानशाह से आगे उड़ाकर ले जाना बेहद ख़तरनाक था.

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इमेज कैप्शन, एएन-26 विमान सोवियत एंतोनोव डिज़ाइन ब्यूरो ने 1960 के दशक में तैयार किया था

लेकिन अफ़ग़ान सेना के अधिकारियों और पायलटों का अपने विमान और हेलिकॉप्टर लेकर पाकिस्तान आना केवल कुछ लोगों के भागने की घटनाएं नहीं थीं. ये सेना में बढ़ती अव्यवस्था और टूटते हौसले का संकेत थीं.

अमेरिका के नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूज़ियम के पूर्व निदेशक और लेखक वॉल्टर जे बॉयन के मुताबिक़, अफ़ग़ान वायुसेना के 10 विमान रास्ता बदलकर पाकिस्तान पहुंचे थे.

बाद में सार्वजनिक हुई सीआईए की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, उस समय अफ़ग़ान वायुसेना के सामने अधिकारियों और सैनिकों के भागने और कमज़ोर मनोबल जैसी समस्याएं थीं.

यानी 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के सैन्य दख़ल के बाद एएन-26 का पाकिस्तान पहुंचना न तो ऐसी पहली घटना थी और न ही आख़िरी.

1960 के दशक में तैयार हुआ था एएन-26

एएन-26 विमान सोवियत एंतोनोव डिज़ाइन ब्यूरो ने 1960 के दशक में तैयार किया था. यह एक मज़बूत मालवाहक विमान था. लेकिन अब इसे मीरानशाह से आगे उड़ाकर ले जाना बेहद ख़तरनाक था.

पाकिस्तान वायुसेना के सामने एक नई चुनौती थी. विमान पाकिस्तान पहुंच चुका था, लेकिन उसे किसी सुरक्षित जगह तक ले जाना था. मुश्किल यह थी कि पाकिस्तान के पायलटों ने रूस में बने इस विमान को पहले कभी नहीं उड़ाया था.

पाकिस्तान वायुसेना की पत्रिका 'सेकंड टू नन' में छपे एक लेख में एयर कमोडोर ख़ालिद कमाल ने बताया है कि घटना के अगले दिन इस विमान को वहां से कैसे ले जाया गया.

उन्होंने लिखा, "मैं क्रू रूम में आराम कर रहा था. तभी किसी ने आकर बताया कि हमारे कमांडिंग ऑफ़िसर विंग कमांडर ग़फ़ूर मीरानशाह में खड़े उस विमान को वहां से उड़ाकर ले जाने की योजना बना रहे हैं. यह दो इंजन वाला हल्का टर्बोप्रॉप विमान था, जिसे कई तरह के कामों में इस्तेमाल किया जा सकता था."

"उस समय मैं नंबर 12 वीआईपी स्क्वाड्रन में एफ़-27 फ़ॉकर फ़्रेंडशिप विमान का सहायक पायलट था. मैं युवा था और हमेशा किसी रोमांचक काम की तलाश में रहता था. इसलिए मुझे लगा कि यह मिशन मेरे लिए सही है. मैं सीधे कमांडिंग ऑफ़िसर के दफ़्तर पहुंचा. वहां वह सीनियर नेविगेटर स्क्वाड्रन लीडर ज़ुल्फ़िकार के साथ बैठे थे. उनके सामने मेज़ पर नक़्शे फैले हुए थे."

"मैंने इस मिशन में सहायक पायलट के तौर पर जाने की पेशकश की. दोनों ने मेरी तरफ़ देखा. विंग कमांडर ग़फ़ूर ने कहा, 'क्या तुम्हें पता है कि यह किस तरह का मिशन है? यह बेहद ख़तरनाक है और इसमें जान भी जा सकती है. मीरानशाह से उड़ान भरते ही रूसी इस विमान को मार गिराने की कोशिश करेंगे. इसलिए ख़ुद इस मिशन में शामिल होने का फ़ैसला करने से पहले अच्छी तरह सोच लो.'"

"मेरे बार-बार कहने पर उन्होंने मुझे सहायक पायलट के तौर पर अपने साथ जाने की इजाज़त दे दी."

पायलट के बीच हो गया था झगड़ा

ख़ालिद कमाल ने अपने लेख 'फ़ाइनेस्ट आवर: द टेल ऑफ़ एएन-26' में लिखा कि अगली सुबह वह अपनी नाइट किट लेकर पहुंचे. स्क्वाड्रन लीडर ख़ालिद और फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट नईम उन्हें बीचक्राफ़्ट विमान से मीरानशाह लेकर गए.

"मीरानशाह पहुंचने पर पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों ने हमारा स्वागत किया. हम विमान को देखना और उसके बारे में समझना चाहते थे. लेकिन सीमा पार से गोलीबारी हो रही थी, इसलिए हमें विमान के पास न जाने की सलाह दी गई. विमान को पेड़ों की डालियों से ढककर छिपाया गया था."

"हमें सैन्य यूनिट के ऑफ़िसर्स मेस में ले जाया गया. वहां हमारी मुलाक़ात विमान लेकर पाकिस्तान आए अफ़ग़ान पायलटों से हुई. दोनों को एक बंद कमरे में रखा गया था."

"वहां हमें पता चला कि विमान के अफ़ग़ान कप्तान ने अपने परिवार को पहले ही पाकिस्तान भेज दिया था. इसके बाद वह ख़ुद भी विमान लेकर पाकिस्तान आ गया था, ताकि यहां राजनीतिक शरण ले सके. उसका सहायक पायलट इस फ़ैसले से बेहद नाराज़ था और दोनों के बीच लगातार झगड़ा हो रहा था."

"सहायक पायलट के ग़ुस्से की एक जायज़ वजह थी. अगर कप्तान ने उसे अपनी योजना के बारे में पहले बता दिया होता, तो वह भी अपने परिवार को पाकिस्तान भेज सकता था."

ख़ालिद कमाल ने लिखा कि तैयारी पूरी होने के बाद उन्होंने सैन्य अधिकारियों से अफ़ग़ान कप्तान को विमान तक लाने के लिए कहा. वह उड़ान से पहले की जांच में उनकी मदद कर सकता था. कप्तान को बताया गया कि वह उनके साथ पाकिस्तान के एक शहर जाएगा और उड़ान के दौरान उनकी मदद करेगा.

"यह सुनकर वह बहुत ख़ुश हुआ और पूरे उत्साह के साथ हमारे साथ विमान की तरफ़ चल पड़ा. यह देखकर उसका सहायक पायलट और भड़क गया. हमें सुरक्षा के बीच विमान तक पहुंचाया गया. अपनी सीटों पर बैठने के बाद हमने अफ़ग़ान कप्तान से इंजन चालू करने में मदद मांगी. उसने ख़ुशी-ख़ुशी हमारी मदद की."

"जब हम विमान को रनवे पर ले जाने और उड़ान भरने के लिए तैयार हो गए, तब कप्तान को बताया गया कि वह हमारे साथ नहीं जाएगा. यह सुनकर वह बहुत नाराज़ हो गया. सैन्य अधिकारियों को उसे ज़बरदस्ती विमान से उतारना पड़ा."

ख़ालिद कमाल के मुताबिक़, विमान से उतरते समय अफ़ग़ान कप्तान ने फ़्लाइट इंजीनियर के पैनल पर लगे एक स्विच की स्थिति बदल दी. इस पर उनकी नज़र नहीं पड़ी.

"मौसम साफ़ था और धूप निकली हुई थी. मीरानशाह की पहाड़ियां बहुत ख़ूबसूरत दिखाई दे रही थीं. उड़ान भरने के बाद हमने पूर्व दिशा की तरफ़ रुख़ किया और घाटी के भीतर बहुत कम ऊंचाई पर उड़ने लगे. इसका मक़सद सीमा पर निगरानी कर रहे रूसी लड़ाकू विमानों से बचना था. वे इंतज़ार कर रहे थे कि हम उनकी नज़र में आएं."

21 फ़रवरी 1988 को विमानन फ़ोटोग्राफ़र पीटर स्टाइनमैन ने रावलपिंडी के चकलाला एयरबेस पर इस विमान की तस्वीर ली.

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इमेज कैप्शन, 21 फ़रवरी 1988 को विमानन फ़ोटोग्राफ़र पीटर स्टाइनमैन ने रावलपिंडी के चकलाला एयरबेस पर इस विमान की तस्वीर ली

खालिद कमाल कहते हैं, "ख़तरा बहुत बड़ा था. हमें डर था कि रूसी मिसाइल हमें निशाना बना सकती हैं. उस समय पाकिस्तान वायुसेना के मिराज लड़ाकू विमान हमारे ऊपर दाएं-बाएं ज़िगज़ैग करते हुए उड़ रहे थे. वे अपनी रफ़्तार हमारे विमान के मुताबिक़ रख रहे थे और किसी भी कार्रवाई से हमें बचाने के लिए हमारे साथ थे. उनकी मौजूदगी से हमारा हौसला बढ़ गया था."

"विंग कमांडर ग़फ़ूर इराक़ में तैनाती के दौरान इसी तरह का विमान उड़ा चुके थे. वह पूरे भरोसे और शांति के साथ विमान संभाल रहे थे."

"स्क्वाड्रन लीडर ज़ुल्फ़िकार पहाड़ी इलाक़े में तय रास्ते पर आगे बढ़ने में हमारी मदद कर रहे थे. मैं रेडियो संपर्क और विमान के भीतर हवा का दबाव बनाए रखने वाली प्रणाली संभाल रहा था. इसके साथ ही मैं इस रोमांचक अभियान का आनंद भी ले रहा था."

"मियांवाली के प्रशिक्षण क्षेत्र में पहुंचने के बाद मैंने मियांवाली टावर से संपर्क किया. हवाई यातायात नियंत्रक ने हमारी मंज़िल के बारे में पूछा. मैंने जवाब दिया कि अभियान से जुड़ी वजहों से मैं हमारी मंज़िल नहीं बता सकता."

"हम पीएएफ़ बेस मसरूर की तरफ़ बढ़ते रहे. वहां विंग कमांडर ग़फ़ूर ने बहुत सधे हुए और पेशेवर तरीक़े से विमान उतार दिया."

ख़ालिद कमाल लिखते हैं, "जब हम विमान को टारमैक की तरफ़ ले जा रहे थे, तो हमें लगा कि विमान का कोई हिस्सा ज़मीन से टकरा रहा है. पता चला कि विमान उतरते समय उसका रैंप खुल गया था और अब वह ज़मीन पर घिसट रहा था."

"यह समस्या उसी स्विच की वजह से हुई थी, जिसकी स्थिति अफ़ग़ान कप्तान ने विमान से उतरते समय बदल दी थी."

बाद में विमान पर पाकिस्तान वायुसेना के रंग और निशान लगाए गए. इसे जे-754 रजिस्ट्रेशन दिया गया. कुछ समय तक इसका इस्तेमाल पाकिस्तान वायुसेना में किया गया, जिसमें नंबर 12 स्क्वाड्रन भी शामिल था.

21 फ़रवरी 1988 को विमानन फ़ोटोग्राफ़र पीटर स्टाइनमैन ने रावलपिंडी के चकलाला एयरबेस पर इस विमान की तस्वीर ली. उस समय विमान पर पाकिस्तान वायुसेना के निशान और जे-754 रजिस्ट्रेशन मौजूद था.

बाद में इस विमान को कराची के पीएएफ़ म्यूज़ियम में सुरक्षित रख दिया गया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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