समस्तीपुर में भी 'जमुई जैसा कांड', आखिर और कितना शर्मसार होगा बिहार? जंगलराज और सुशासन का फर्क सिर्फ नारों में
Updated: Thursday, September 24, 2026, 13:21 [IST]
बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति आज देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। जमुई के बाद समस्तीपुर में भी नाबालिग लड़की से बदसलूकी का मामला सामने आया है। 15 सितंबर को समस्तीपुर के कर्पूरी ग्राम थाना इलाके के जगतसिंहपुर बांध पर एक नाबालिग लड़की के साथ मनचलों ने बदसलूकी की। सोशल मीडिया पर जब इसका वीडियो तेजी से वायरल हुआ, तब जाकर पुलिस नींद से जागी। सदर डीएसपी दुर्गेश दीपक के मुताबिक, वीडियो सामने आने के बाद केस दर्ज कर चार आरोपियों राहुल कुमार, अवधेश पासवान, विकास शर्मा और रामबाबू सहनी को गिरफ्तार किया गया है।
एसपी अरविंद प्रताप सिंह ने दावा किया है कि अपराधियों को किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन सवाल वही खड़ा है कि आखिर बिहार की बेटियां कब तक इस खौफ के साए में जिएंगी? समस्तीपुर की घटना ऐसे वक्त सामने आई है, जब कुछ दिन पहले जमुई में नाबालिग लड़की से बदसलूकी का वीडियो सामने आने के बाद बिहार में महिला सुरक्षा को लेकर बहस तेज हुई थी।
इसी वजह से दोनों घटनाओं को सोशल मीडिया पर जोड़ा जा रहा है। लेकिन पत्रकारिता की दृष्टि से दोनों मामलों को एक ही घटना या एक ही पैटर्न मानना ठीक नहीं होगा। दोनों मामलों की जांच अलग-अलग है। सवाल इतना जरूर है कि सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए स्थानीय पुलिस की मौजूदगी, त्वरित कार्रवाई और आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई कितनी प्रभावी है।
लड़की क्या पहने, कहां जाए, किसके साथ बैठे... ये फैसला समाज कब तक करेगा?
मेरी राय में, समस्तीपुर और जमुई की घटनाओं को सिर्फ दो आपराधिक मामलों की तरह देखकर आगे बढ़ जाना आसान है। असली सवाल उससे कहीं बड़ा है। आखिर बिहार में यह सब कब तक चलता रहेगा? किसी लड़की का किसी लड़के के साथ दिख जाना क्या भीड़ को उसका चरित्र तय करने का लाइसेंस दे देता है? वह क्या पहने, कब घर से निकले, कहां जाए, किसके साथ बैठे या घूमे, इन सबका हिसाब लगाने वाला समाज आखिर खुद से सवाल कब करेगा?
यह मॉरल पुलिसिंग नहीं, सोच की पुलिसिंग है। फर्क बस इतना है कि यहां कानून की वर्दी नहीं होती, हाथ में डंडा नहीं होता, लेकिन फैसला सुनाने का अधिकार खुद ही ले लिया जाता है। विडंबना देखिए। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे नारे सुनने में जितने अच्छे लगते हैं, जमीन पर बेटी की आजादी उतनी ही बार कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। अगर बेटी स्कूल जाए तो सवाल, कॉलेज जाए तो सवाल, देर से लौटे तो सवाल, दोस्त के साथ दिख जाए तो सवाल। फिर सुरक्षा के नाम पर रास्ता किसका छोटा किया जा रहा है,लड़की का या अपराधी का?
जमुई मामले पर बिहार की महिलाओं ने भी यही चिंता जताई कि ऐसी घटनाओं के बाद लड़कियों की आजादी पर पाबंदियां और सामाजिक निगरानी बढ़ सकती है। कई महिलाओं ने ही सवाल खड़े कर दिए कि वो लड़की शाम के 7 बजे वहां अपने दोस्त के साथ आई ही क्यों थी। और तंज देखिए-जिस समाज को लड़कियों के कपड़ों, आने-जाने और दोस्ती पर नैतिकता का पहरा लगाने की इतनी जल्दी है, उसी समाज में किसी लड़की को घेरकर परेशान करने वालों की नैतिकता अचानक छुट्टी पर क्यों चली जाती है?
लड़के को भी पीटा जा रहा है, लड़की को भी घेरा जा रहा है। यानी यह सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा का सवाल नहीं, भीड़ के हाथ में न्याय और नैतिकता की छड़ी पहुंच जाने का सवाल है। बिहार को अब यह तय करना होगा कि बेटियों को सुरक्षित बनाने का रास्ता उनकी आजादी कम करना है या अपराधियों की हिम्मत कम करना।
सम्राट चौधरी सरकार में अब तक तस्वीर क्या है?
15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली थी। हालांकि उनके 160 से ज्यादा दिनों के कार्यकाल का कोई आधिकारिक सरकारी क्राइम डेटा अभी जारी नहीं हुआ है, लेकिन घटनाओं की रफ्तार देखकर लगता है कि सत्ता बदलने के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं आया है।
अगर हम पूर्व डीजीपी विनय कुमार की जनवरी 2026 की रिपोर्ट को आधार मानें, तो साल 2025 में बिहार के अंदर कुल 2,025 रेप केस दर्ज हुए थे। इनमें से 1,150 से ज्यादा मामलों में पॉक्सो एक्ट लगा था। अगर 2025 की इसी रफ्तार से अनुमान लगाएं, तो सम्राट चौधरी के शुरुआती महीनों के दौरान राज्य में रेप के करीब 900 मामले और कुल महिला अपराध के करीब 12,000 मामले बनते हैं।
इस दौरान कई हाई-प्रोफाइल केस सामने आए:
- जमुई केस (19 सितंबर): वीडियो वायरल होने पर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर और राज्य महिला आयोग के कड़े रुख के बाद पुलिस ने पॉक्सो में केस दर्ज कर तीन लोगों को पकड़ा।
- मुजफ्फरपुर हत्याकांड (13 मई): मकसूदपुर में दो चचेरी बहनों की बेरहमी से हत्या की गई, जिसमें पुलिस दुष्कर्म के एंगल से भी छानबीन कर रही है।
- विपक्ष का दावा: 19 मई को तेजस्वी यादव ने 50 से ज्यादा अपराधों की एक लिस्ट जारी की थी, जिसमें मुजफ्फरपुर की साढ़े तीन साल की बच्ची और बांका में महिला के चेहरे पर तेजाब डालने की घटना शामिल थी।
हालांकि, सत्ता पक्ष की तरफ से एलजेपी(आर) सांसद शांभवी चौधरी का कहना है कि सरकार तुरंत एक्शन ले रही है और जमुई में 24 घंटे के अंदर एसटीएफ बनाकर कार्रवाई की गई। पुलिस का यह भी दावा है कि 2026 के शुरुआती महीनों में रेप और पॉक्सो के 218 मामलों में सजा दिलाई जा चुकी है।
10 सालों में बिहार का NCRB ट्रैक रिकॉर्ड
महिलाओं के खिलाफ अपराध का लंबा ट्रेंड देखने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है। उपलब्ध NCRB आंकड़ों के मुताबिक बिहार में दर्ज मामले 2014 में 15,393 थे। 2015 में यह संख्या 13,904 रही। इसके बाद 2018 में 16,920, 2019 में 18,587, 2020 में 15,359 और 2022 में 20,222 मामले दर्ज हुए। 2023 में यह संख्या 22,952 और 2024 में 27,359 तक पहुंच गई।
2018 से 2022 के बीच 5 सालों में बिहार के अंदर कुल 89,038 महिला अपराध दर्ज किए गए। इस दौरान अकेले 3,854 रेप, 2,504 हत्याएं और 42,498 अपहरण के केस सामने आए। 2022 में महिला अपहरण का आंकड़ा अपने रिकॉर्ड स्तर 10,190 तक पहुंच गया था।
एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर की तरफ भागा है:
लेकिन इन आंकड़ों को पढ़ते समय एक बड़ी सावधानी जरूरी है। एफआईआर बढ़ना हमेशा अपराध बढ़ने का सीधा प्रमाण नहीं होता। बेहतर रिपोर्टिंग, शिकायत दर्ज कराने की सुविधा और पुलिस तक पहुंच भी आंकड़े बढ़ा सकती है।
RJD राज बनाम NDA का दौर
लालू-राबड़ी राज (1990 से 2005) के साल-दर-साल आंकड़े 2001 से मिलते हैं। NCRB के मुताबिक 2001 में 5,356, 2002 में 5,743, 2003 में 5,900, 2004 में 8,091 और 2005 में 6,019 केस दर्ज हुए। 2004 चोटी का साल था। रेप के केस 2001 से 2004 के बीच 4,431 दर्ज हुए। इसकी तुलना 2018 से 2022 के 3,854 रेप केस से होती है।
यह तुलना यहीं धोखा देती है। पुराने आंकड़े सिर्फ IPC के हैं। नए में IPC के साथ स्पेशल लॉ (SLL) के केस भी जुड़े हैं। 2004 में रेप के केस NCRB में 1,390 हैं, जबकि बिहार पुलिस के डेटा में 1,063। हां, एक बात साफ है। "जंगल राज" के 15 साल बाद और "सुशासन" के 20 साल बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए, बढ़े हैं। रिपोर्ट दर्ज कराना आसान हुआ होगा, यह दलील अपनी जगह है। पर यही दलील तब कहां जाती है जब सरकार बिना आंकड़े दिए "कानून का राज" गिनाती है।
2000 तक झारखंड बिहार का हिस्सा था। दूसरी तरफ बाद के वर्षों के आंकड़ों में आईपीसी के साथ विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामले भी शामिल हैं। इसलिए 2004 के आंकड़े को 2024 के आंकड़े से सीधे जोड़कर यह कहना कि किस सरकार में अपराध ज्यादा या कम था, सही तरीका नहीं होगा।
असली सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं
समस्तीपुर का वीडियो सिर्फ एक स्थानीय घटना की तरह खत्म नहीं होना चाहिए। मामला नाबालिग से जुड़ा है। पुलिस ने गिरफ्तारी की है। अब जांच में यह सामने आना बाकी है कि घटना में कौन-कौन शामिल था और उनके खिलाफ कौन-कौन सी धाराएं लगती हैं।
दूसरी तरफ सरकार और पुलिस के लिए चुनौती यह है कि ऐसी घटनाओं में एफआईआर, आरोपियों की गिरफ्तारी, पीड़िता की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच सिर्फ बयान तक सीमित न रहे। बिहार में अपराध के आंकड़े घटे हैं या बढ़े हैं, इस पर राजनीतिक बहस चलती रहेगी। लेकिन समस्तीपुर और जमुई जैसी घटनाओं के मामले में सबसे अहम कसौटी यही रहेगी कि कानून जमीन पर कितनी तेजी से काम करता है।