इंदौर के भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 में दूषित पानी से हुई मौतों की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय आयोग की 110 पेजों की रिपोर्ट बुधवार को सार्वजनिक हुई। आयोग ने नाले का पानी पेयजल में मिलने और खराब पाइपलाइन बदलने की टेंडर प्रक्रिया में 859 दिनों की देरी

.

रिपोर्ट में 8 अफसरों और इंजीनियरों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करते हुए विभागीय कार्रवाई के साथ आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की गई है। मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर फरवरी 2026 तक दर्ज 35 मौतों में से 22 को आयोग ने दूषित पानी से माना है।

अफसरों को लीकेज, बदबू और बैक्टीरिया की जानकारी थी

रिपोर्ट में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव, तत्कालीन अपर आयुक्त भव्या मित्तल और रोहित सिसोनिया, तत्कालीन प्रभारी सहायक यंत्री सरोज कुमार प्रजापति, उप यंत्री शुभम श्रीवास्तव, सहायक यंत्री योगेश जोशी तथा निविदा शाखा की प्रज्ञा तिवारी और नीति चौरसिया को जिम्मेदार माना गया है।

आयोग के मुताबिक सरोज कुमार प्रजापति को पाइपलाइन में लीकेज, पानी की शिकायतों, अवैध कनेक्शन, ड्रेनेज-पेयजल लाइन की नजदीकी, पानी में बैक्टीरिया, बदबू और काले पानी की जानकारी थी। इसके बावजूद यह जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक नहीं पहुंचाई गई। आयोग ने इसे गंभीर कर्तव्य-चूक माना है।

हादसा कैसे हुआ? आयोग के अनुसार कई जगह सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन निर्धारित दूरी पर नहीं थीं। कुछ जगह दोनों समानांतर थीं या एक-दूसरे को क्रॉस करती थीं। लीकेज की स्थिति में सीवरेज का पानी पेयजल लाइन में पहुंचने का खतरा था। आयोग ने सीवरेज का पानी पेयजल सिस्टम में पहुंचना तत्काल कारण और सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग व निर्माण को मूल कारण माना है।

859 दिन टेंडर में देरी, खराब पाइप नहीं बदली

खराब पाइपलाइन बदलने की टेंडर प्रक्रिया में देरी, टेंडर निरस्तीकरण और री-टेंडरिंग सामने आई। आयोग ने प्रज्ञा तिवारी और नीति चौरसिया को फाइल प्रोसेसिंग में देरी के लिए प्रथम दृष्टया जिम्मेदार माना है।

यदि फाइल अंतिम मंजूरी के लिए रोहित सिसोनिया के स्तर पर लंबित रही थी, तो उस अवधि की जिम्मेदारी उनकी भूमिका के अनुसार तय करने की बात कही गई है। आयोग के मुताबिक समय पर टेंडर पूरा होकर पाइपलाइन बदल जाती तो घटना को रोका जा सकता था। इसलिए टेंडर देरी को घटना में योगदान देने वाला कारण माना गया है।

मौतों का मामला सामने आने के बाद में पेयजल लाइन चेक की गई थी।

मौतों का मामला सामने आने के बाद में पेयजल लाइन चेक की गई थी।

13 साल की पोस्टिंग पर संजीव श्रीवास्तव से सवाल

आयोग ने सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका पर विशेष टिप्पणी की है। वे 2013 से 2026 तक वाटर सप्लाई विभाग में पदस्थ रहे। आयोग के मुताबिक इतने लंबे समय में उन्हें पाइपलाइन की स्थिति, लीकेज, संक्रमण के खतरे और जर्जर नेटवर्क की जानकारी होनी चाहिए थी। इसके बावजूद पर्याप्त निरीक्षण, मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग नहीं हुई।

भागीरथपुरा में हुई मौतों के बाद लोगों ने प्रदर्शन किया था।

भागीरथपुरा में हुई मौतों के बाद लोगों ने प्रदर्शन किया था।

चार अफसरों को क्लीन चिट

रिपोर्ट में तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव, पूर्व निगम कमिश्नर शिवम वर्मा, प्रतिभा पाल और अपर आयुक्त अभिलाष मिश्रा को जिम्मेदारी से मुक्त किया गया है। आयोग ने कहा कि संबंधित टेंडर की अंतिम मंजूरी की शक्ति तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास थी। दिलीप कुमार यादव ने 11 सितंबर 2025 को निगमायुक्त का पद संभाला था और घटना की जानकारी के बाद आवश्यक प्रशासनिक व आपात कदम उठाए थे।

इन अफसरों को क्लिनचीट दे गई।

इन अफसरों को क्लिनचीट दे गई।

आयोग ने कहा- हादसा रोका जा सकता था आयोग ने घटना को लंबे समय से चली आ रही तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का परिणाम माना। साथ ही कहा कि यह घटना रोकी जा सकती थी। आयोग ने अलग जल प्राधिकरण बनाने, मृतकों के परिजन को 10 लाख रुपए, अंत्येष्टि के लिए 50 हजार और बच्चों की शिक्षा के लिए 5 रुपए की सहायता की सिफारिश की है। सीवरेज-पेयजल नेटवर्क के बीच मानक दूरी, नियमित निरीक्षण, लीकेज टेस्टिंग और प्रिवेंटिव मेंटेनेंस अनिवार्य करने की भी सिफारिश की गई है।

आयोग ने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं

टेंडर की अंतिम मंजूरी का अधिकार उस समय निगमायुक्त के पास नहीं था। संबंधित टेंडर की अंतिम स्वीकृति की शक्ति तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास थी।

दिलीप कुमार यादव ने 11 सितंबर 2025 को निगमायुक्त का पद संभाला और घटना की जानकारी मिलने के बाद आवश्यक प्रशासनिक एवं आपात कदम उठाए।

आयोग ने साफ कहा कि दिलीप कुमार यादव पर टेंडर में देरी या दूषित पानी की घटना के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रशासनिक या कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

खास बातें, जो रिपोर्ट को बनाती हैं महत्वपूर्ण

1. हादसा 'अचानक' नहीं था

आयोग ने कहा कि यह घटना लंबे समय से विकसित हो रही तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का परिणाम थी।

2. मूल समस्या पाइपलाइन का गलत डिजाइन/लेआउट

सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन के बीच निर्धारित दूरी और सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था।

3. सिर्फ पुराने अफसरों पर जिम्मेदारी नहीं

आयोग ने कहा कि पाइपलाइन भले दशकों पहले बिछी हो, लेकिन बाद में पदस्थ इंजीनियरों की जिम्मेदारी थी कि वे उसकी हालत की निगरानी करते और समय पर मरम्मत/रिप्लेसमेंट कराते।

4. 13 साल की लगातार पोस्टिंग पर सवाल

संजीव कुमार श्रीवास्तव की 2013 से 2026 तक लगातार पोस्टिंग को आयोग ने विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना और कहा कि इतने लंबे समय में जर्जर व्यवस्था से अनजान रहना स्वीकार्य नहीं है।

5. सरोज प्रजापति ने कई खतरे स्वीकार किए

लीकेज, दूषित पानी, बदबू, बैक्टीरिया, ड्रेनेज की नजदीकी और औद्योगिक अपशिष्ट की जानकारी होने के बावजूद वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट नहीं करना आयोग के निष्कर्ष में महत्वपूर्ण है।

6. टेंडर में देरी ने खतरा बढ़ाया

खराब पाइप बदलने की प्रक्रिया में देरी के कारण पहले से कमजोर नेटवर्क बना रहा और आयोग ने इसे घटना में योगदान देने वाला कारण माना।

7. आयोग ने घटना को पूरी तरह 'प्रिवेंटेबल' माना

अंतिम टिप्पणी में आयोग ने कहा कि यह घटना रोकी जा सकती थी और कानून के शासन वाले संवैधानिक तंत्र में ऐसी विफलता के साथ जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

8. भविष्य के लिए सख्त इंजीनियरिंग मानकों की सिफारिश

आयोग ने कहा कि सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन के बीच मानक दूरी, नियमित निरीक्षण, लीकेज टेस्टिंग, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस और क्रॉस-कनेक्शन से सुरक्षा को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।