मंगलवार को प्रेस क्लब में जड़ों से जुड़ो - विश्व की प्रथम डिजिटल महिला रामलीला टीम के सदस्य अपने-अपने किरदार में आए। पहली बार इनकी टीम ने दुनिया में महिलाओं की रामलीला शुरू की थी। फाउंडर एकता नागपाल ने बताया- रामलीला का 5वां एडिशन 11 से 20 अक्टूबर तक
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रामलीला की प्रस्तुति में एआई, वीएफएक्स प्रयोग होगा। 6 महीने की बच्ची से लेकर 83 साल की 108 से ज्यादा महिलाएं इसमें शामिल हैं, जो स्टूडेंट, होममेकर, वर्किंग, रिटायर्ड हैं। इस बार दिव्यांग बेटियों और एसिड अटैक सर्वाइवर्स को भी मंच दिया जाएगा। नशामुक्ति और महिला सुरक्षा का संदेश प्रमुख होगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजीव सूद, आचार्य संगम, विकास कुमार, अमित हुड्डा मौजूद रहे।
मैं मंदिर वाले कमरे में जाकर हनुमान जी से अपनी परेशानी साझा करती हूं, मदद मांगती हूं...
मेरा यह हर रोज़ का नियम है कि रात को सोने से पहले मैं मंदिर वाले कमरे में जाकर हनुमान जी से अपनी परेशानी साझा करती हूं। रात को सोने से पहले पूरे दिन की चर्चा साझा करने के साथ मदद मांगती हूं। या तो मदद मिल जाती है या उस स्थिति से बाहर निकलने का जरिया। रामलीला में मेकअप अहम है। क्योंकि मंच से दूर तक अॉडियंस होती है ऐसे में उनको दिखाई देना चाहिए। हनुमान जी की आंखें बहुत एक्ट करती हैं इसलिए आंखों के मेकअप पर ध्यान देती हूं।-जानवी नागपाल, मेकअप आर्टिस्ट, किरदार- हनुमान
कैकेई के किरदार को निभाते हुए मन में दुविधा थी?
शुरू में मुझे लगा कि मुझे त्रिया चरित्र दिखाने होंगे जो कि सामान्यतः मेरी प्रकृति में नहीं है। निर्देशक ने बताया और कोशिश की तो इस कैरेक्टर में उतर पाई। कैकई के हवाले से रामलीला को समझें तो वह बिल्कुल अलग है। उसके हवाले से वह नकारात्मक भी नहीं लगेगी। मैंने बस उसका नजरिया देखते हुए किरदार निभाया। -आरती पंघाल, होममेकर, किरदार - कैकई
रावण का रोल करना कितना मुश्किल है?
पिछले साल से रावण का किरदार निभा रही हूं। आज भी किरदार में जाते ही मेरी नसें खिंच जाती हैं। यह किरदार बहुत शक्तिशाली है, जिसे झुठला नहीं सकते। मैं रावण को मंच पर ही छोड़ आती हूं। कोई मंच से नीचे मुझे रावण कहकर पुकारे तो मैं टोकती हूं क्योंकि मैं वह असल में नहीं हूं। सोचती हूं कि सच का रावण भी मर्यादित था। मगर, कलियुग का रावण त्रेतायुग से अलग है। -रुचिता गर्ग, एडवोकेट, किरदार - रावण
महिलाओं पर उठने वाले सवालों को सीता माता के रूप में कैसे महसूस करती हैं?
जो सवाल उस समय थे, वही आज भी हमारे सामने हैं। जब महिला रामलीला शुरू करने की बात हुई थी तब समाज के कई सवाल सामने थे। लोगों ने गोलियों से और पत्थरों से मारने तक की धमकियां भी दी। हम घर को संभालती हैं, काम भी करती हैं और शाम को किरदार भी निभाती हैं। बतौर महिला जो रामलीला में हुआ, उसके बाद भी मां सीता ने प्रण लिया और जंगल में बच्चों को स्वयं संभाला। -अनुषा चड्ढा, आंत्रप्रिन्योर, किरदार- सीता
राम जी को आज के समय में कैसे देखती हो?
श्रीराम तब भी मर्यादित थे और आज भी। हम जब भगवान राम की बात करें तो उसमें भी मर्यादा ज़रूरी है। रिहर्सल के दौरान मैं अपने व्यवहार से लेकर खान-पान में भी संयम बरतती हूं। समाज में वैसी मर्यादा आ जाए तो कितना कुछ बदल जाए। राम तो जीवन जीने का जरिया हैं। 90 दिनों तक हर दिन तीन घंटे की रिहर्सल होती है। -आभा शुक्ला, होममेकर, किरदार- श्रीराम
कलियुग का रावण त्रेतायुग से अलग है...
आरती पंघाल, आभा शुक्ला, अनुषा चड्ढा, जानवी नागपाल और रुचिता गर्ग।