समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के प्रस्तावित रामपुर दौरे और जेल में आजम खां से मुलाकात को लेकर सियासत तेज हो गई है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इसे चुनावी स्टंट बताया है। उन्होंने कहा कि अखिलेश
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मौलाना ने कहा कि रामपुर की जनता अब यही कह रही है- 'बहुत देर कर दी मेहरबां आते-आते।' उन्होंने सवाल उठाया कि जब आजम खां सीतापुर जेल में चार साल से ज्यादा समय तक रहे, तब अखिलेश उनसे मिलने क्यों नहीं गए? अब विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही उन्हें आजम और मुसलमानों की याद क्यों आ रही है?
370 दिन बाद आजम की याद क्यों आई?
मौलाना शहाबुद्दीन ने दावा किया कि उन्होंने मुस्लिम चेहरे को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने, आबादी के अनुपात में 150 टिकट देने और आजम खां की उपेक्षा जैसे मुद्दे उठाए थे। उनके मुताबिक, इन सवालों के बाद अखिलेश पर रामपुर जाने का दबाव बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि आजम खां रामपुर जेल में 370 दिन बिता चुके हैं, लेकिन अखिलेश अब उनसे मिलने जा रहे हैं। मौलाना ने सवाल किया कि पहले आजम की मुश्किलों के समय सपा अध्यक्ष ने उनसे दूरी क्यों बनाए रखी?
आजम के असर पर भी उठाए सवाल
मौलाना ने कहा कि अखिलेश को लगता है कि आजम खां से मुलाकात के बाद पूरा मुस्लिम समाज सपा के पक्ष में एकतरफा वोट करेगा, लेकिन अब ऐसा नहीं है। उन्होंने चुनावी नतीजों का हवाला देते हुए कहा कि आजम परिवार के विरोध के बावजूद मौलाना मुहीबुल्लाह नदवी चुनाव जीते। वहीं, आजम खां की परंपरागत सीट पर भाजपा के आकाश सक्सेना ने जीत दर्ज की। अब्दुल्ला आजम के प्रभाव वाली सीट पर भी शफीक अहमद अंसारी का कब्जा है।
मौलाना ने कहा कि मुस्लिम समाज अब किसी एक नेता के इशारे पर वोट नहीं करता। वह अपने फायदे और नुकसान को देखकर फैसला लेता है।
सपा में भाजपाइयों को शामिल करने पर निशाना
मौलाना शहाबुद्दीन ने सपा की टिकट नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा में 10-15 साल तक रहने वाले नेताओं को अखिलेश यादव सपा में शामिल कर रहे हैं और उन्हें टिकट भी दिया जा रहा है।
उन्होंने आंवला और बिथरी चैनपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि जो नेता पहले मुसलमानों के खिलाफ काम करते थे, उन्हें अब सपा में शामिल कर मुस्लिम वोटों की उम्मीद की जा रही है। मौलाना ने कहा कि सपा को मुस्लिम समाज को बंधुआ मजदूर या गुलाम समझना बंद करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज अब राजनीति में बराबर की हिस्सेदारी चाहता है। अगर सपा ने इन मुद्दों को नजरअंदाज किया तो 2027 के विधानसभा चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।