अष्टान्हिका पर्व पर मुनि पुनीत सागर का संदेश : बोले- धर्म केवल अनुष्ठान नहीं, जीवन में उतारने का विषय है

रायपुर जिले के श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय रोड में अष्टान्हिका पर्व के द्वितीय दिवस अभिषेक, शांतिधारा और धर्मसभा का आयोजन हुआ।

Shri Digambar Jain Bada Mandir: Second Day of the Ashtanhika Parva

श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर अष्टान्हिका पर्व का द्वितीय दिवस

  • Published: 22 Jul 2026, 05:55 PM IST
  • Last Updated: 22 Jul 2026, 05:57 PM IST

रायपुर। आषाढ़ शुक्ल नवमी के पावन अवसर पर श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय रोड में चल रहे अष्टान्हिका पर्व के द्वितीय दिवस का आयोजन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के वातावरण में संपन्न हुआ। मुनि 108 श्री पुनीत सागर जी महाराज एवं मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, आहारदान और धर्मसभा में सहभागिता कर आत्मकल्याण का संदेश ग्रहण किया। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि 'धर्म को जो वास्तव में अपने जीवन में धारण करता है, वही सच्चा धार्मिक है।'

अभिषेक, शांतिधारा और आहारदान में उमड़ी श्रद्धालुओं की आस्था
श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर के अध्यक्ष श्री संजय नायक जैन ने बताया कि अष्टान्हिका पर्व के द्वितीय दिवस मूलनायक भगवान के समक्ष श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा का आयोजन किया गया। मुनि 108 श्री पुनीत सागर जी महाराज के मुखारविंद से वाचन की गई शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री दिलीप निकुंज जैन परिवार (गुढ़ियारी) को प्राप्त हुआ। वहीं नवधा भक्ति के साथ मुनि संघ को आहार देने का सौभाग्य अनुराग जैन परिवार, श्री संजय नायक जैन परिवार एवं श्री बंशीलाल जैन परिवार को प्राप्त हुआ।

Shri Digambar Jain Bada Mandir: Second Day of the Ashtanhika Parva

ऋतु परिवर्तन में तप, संयम और उपवास का विशेष महत्व - मुनि आगम सागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज ने कहा कि, अष्टान्हिका पर्व वर्ष में तीन बार- आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास में मनाया जाता है। स्वर्गलोक के देवगण नंदीश्वर द्वीप में इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं। यह पर्व ऋतु परिवर्तन के संधिकाल में आता है, जब मौसम बदलने के कारण शरीर में अनेक प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी विषमताएं उत्पन्न होती हैं। ऐसे समय में उपवास, तप और संयम न केवल आत्मकल्याण का माध्यम बनते हैं, बल्कि शरीर को भी स्वस्थ, ऊर्जावान और संतुलित रखते हैं।

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साधना और आत्मशुद्धि से हर व्यक्ति बन सकता है भगवान- मुनि आगम सागर
मुनि श्री ने कहा कि, भगवान महावीर सहित सभी तीर्थंकर जन्म से भगवान नहीं थे, बल्कि उन्होंने साधना, तप और आत्मशुद्धि के बल पर 'पतित से पावन' बनने का मार्ग तय किया। यदि वे आत्मकल्याण कर भगवान बन सकते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति भी चातुर्मास और पर्वों का सदुपयोग कर आत्मोन्नति के पथ पर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि, स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने जैन समाज की संगठनात्मक शक्ति और अष्टान्हिका जैसे पर्वों में समाज की एकजुटता को निकट से देखा था। इसी प्रेरणा से उन्होंने समाज को संगठित करने के उद्देश्य से सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी।

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आत्मधर्म को अपनाने का संदेश देता है अष्टान्हिका पर्व
अपने प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि, जैसे अग्नि का धर्म उष्णता, जल का धर्म शीतलता और वायु का धर्म वेग है, उसी प्रकार आत्मा का भी अपना मूल धर्म है। मंदिर में अभिषेक, पूजन और बीजाक्षर मंत्रों का जाप हमें उसी आत्मधर्म की ओर अग्रसर करता है तथा मन, मस्तिष्क और विचारों को पवित्र बनाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि अष्टान्हिका पर्व के इन आठ दिनों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रखें, बल्कि तप, संयम, स्वाध्याय और आत्मसाधना के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक एवं कल्याणकारी बनाएं।

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