सीखने की शुरुआत 'स्कूल' से ही नहीं होती - माँ का साथ बच्चे की दुनिया बदल सकता है
By श्रद्धा सुनिल थोपट
Published: Monday, July 27, 2026, 15:22 [IST]
सत्र समाप्त होते ही ज़्यादातर माता-पिता जल्दी-जल्दी निकल गए। चप्पलों की आहट, कंधों पर टंगे बैग और दरवाज़े पर जल्दबाज़ी में कहे गए अलविदा।
लेकिन आशा (बदला हुआ नाम) नहीं गईं। वह कमरे के एक कोने में खड़ी रहीं। जैसे अभी आगे बढ़ने का भरोसा खुद में पूरी तरह नहीं जुटा पाई हों। उन्होंने तब तक इंतज़ार किया, जब तक कमरा लगभग खाली नहीं हो गया। शायद उसे लगा कि अब बिना किसी की नज़र या कान के अपनी बात कह पाना आसान होगा।
फिर वह धीरे से मेरे पास आईं और लगभग माफ़ी माँगते हुए बोलीं, "मुझे लगता था कि पढ़ाना तो वही लोग जानते हैं, जिन्होंने पढ़ाई की है।" वह एक पल के लिए रुकीं, जैसे किसी सुधार का इंतज़ार कर रही हों, फिर बोलीं, "मुझे डर था कि कहीं कुछ गलत न कह दूँ। इसलिए मैं चुप रहती थी।"
उसके घर में पढ़ाई हमेशा कहीं और होती थी। स्कूल में... किताबों में... शायद उन किताबों में, जिन्हें उन्होंने कभी छुआ भी नहीं।
घर में दिनचर्या थी। देखभाल थी। लेकिन बातचीत कम थी।
उसकी बातों से मन में एक तस्वीर अपने-आप बनने लगी। पहले जब उसका बेटा सवाल पूछता था, आशा अपना काम करती रहती थीं। चावल धोने होते थे।
चूल्हे पर नज़र रखनी होती थी। और उसके छोटे-छोटे सवाल "क्यों?", "कितने?" कुछ पल हवा में ठहरते और फिर बिना जवाब के वहीं लौट जाते। इसलिए नहीं कि उसे अपने बेटे से प्यार नहीं था, या इसलिए नहीं कि उन्हें उसकी परवाह नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसके पास काम ज़्यादा और समय कम होता था।
धीरे-धीरे उसने मान लिया था, "मैं उन माँओं में से नहीं हूँ, जो बच्चों को पढ़ा सकती हैं।" फिर आशा ने एक ऐसी बात कही, जो लंबे समय तक मेरे साथ रही। "अब मैं कोशिश करती हूँ," उन्होंने कहा। "चाहे मुझे जवाब पता हो या नहीं।"
मैंने उससे पूछा, "यह कोशिश घर में कैसी दिखती है?" वह हल्का-सा मुस्कुराईं... जैसे यह सवाल उसके लिए नया हो। उसने कहा, "शाम को... मैं उसके साथ बैठती हूँ।" उसने यह नहीं कहा कि वह उसे पढ़ाती है। उसने यह भी नहीं कहा कि अब मुझे भरोसा आ गया है। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "मैं बैठती हूँ।"
उसके घर में बैठ जाना कोई छोटी बात नहीं है। उसका मतलब है कि काम अभी भी बाकी है... लेकिन बच्चा अब अकेला इंतज़ार नहीं कर रहा। आशा कहती हैं कि सब कुछ आज भी आसान नहीं है। कई शामें ऐसी होती हैं, जब घर के काम उन्हें फिर अपनी ओर खींच लेते हैं। कई दिन ऐसे भी आते हैं, जब उन्हें फिर अपने ऊपर संदेह होता है। लेकिन अब घर का माहौल पहले जैसा नहीं रहा।
फिर उसने एक किस्सा सुनाया, जो आज भी आँखों के सामने उतर आता है।
शाम का समय है। फ़र्श ठंडा है। दिन का शोर धीमा पड़ चुका है, हालाँकि दिन का काम अभी खत्म नहीं हुआ। उसका बेटा सामने बैठा है। वह बोतलों के ढक्कनों को एक-एक करके कतार में लगा रहा है, जैसे वे बहुत मायने रखते हों। वह माँ की ओर देखता है। सही जवाब पाने के लिए नहीं... बस उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए।
"मम्मा... कितने?" आशा उसकी ओर देखती है, चूल्हे की ओर नहीं.... चावल की ओर नहीं। "एक... दो... तीन...!" वह धीरे-धीरे गिनती है। फिर उससे पूछती है, "अगर दो और आ जाएँ... तो कितने होंगे?" बेटा कुछ पल सोचता है, फिर मुस्कुरा देता है।
और आशा... वहीं फ़र्श पर उसके साथ बैठी रहती हैं। सब कुछ अब भी परफ़ेक्ट नहीं है। लेकिन... अब बहुत कुछ बदल गया है।
(वनइंडिया एक्सक्लूसिव, 'बचपन मनाओ' की प्रस्तुति)