August 8, 2026 10 बार देखा गया
मध्य प्रदेश देश का ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक बाघ पाए जाते हैं और राज्य के बड़े हिस्सों में घने जंगल, संरक्षित वन क्षेत्र और समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। लेकिन इसी मध्य प्रदेश में आज विकास और पर्यावरण के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है।

फोटो साभार: खबर लहरिया, इंडियन एक्सप्रेस
एक ओर कुछ सालों से केन-बेतवा नदी जोड़ों परियोजना को लेकर आंदोलन जारी है वहीं दूसरी ओर हाल ही में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थाई समिति ने पन्ना टाइगर रिजर्व परिदृश्य में पम्पड स्टोरेज हाईड्रोपावर परियोजना से जुड़े जलाशयों के निर्माण को मंज़ूरी दे दी है।
इन दोनों परियोजनाओं का उद्देश्य अलग-अलग है लेकिन इनका भूगोल एक ही है जल, जंगल, नादियां और वे समुदाय जो पीढ़ियों से इन पर निर्भर हैं। पर सरकार इन परियोजनाओं को विकास, ऊर्जा सुरक्षा और जल प्रबंधन के लिए जरुरी बता रही है।
पनारी स्टैंडअलोन पंप स्टोरेज परियोजना का विस्तार
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिकार प्राप्त वन्यजीव मंजूरी समिति ने मध्य प्रदेश के सतना और पन्ना जिलों में 1,800 मेगावाट की पनारी स्टैंडअलोन पंप स्टोरेज परियोजना के लिए पन्ना-रानीपुर टाइगर कॉरिडोर में 411.48 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दे दी है। खास बात ये है कि यह क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व (मध्य प्रदेश) और रानीपुर टाइगर रिजर्व (उत्तर प्रदेश) को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण पन्ना-रानीपुर टाइगर कॉरिडोर के भीतर आता है। इस परियोजना के तहत दो जलाशय बनाए जाएँगे जिनमे से निचला जलाशय बाघैन नदी की एक मौसमी सहायक धारा पर प्रस्तावित है। यह इलाका लंबे समय से वन्यजीवों की आवाजाही और जैव विविधता के लिए बेहद जरुरी माना जाता है।
पम्पड स्टोरज हाईड्रोपावर प्रोजेक्ट (PSH) कैसे काम करता है?
– पम्पड स्टोरज हाईड्रोपावर प्रोजेक्ट में अलग-अलग उंचाई पर बने दो जलाशयों का उपयोग किया जाता है।
– जब बिजली की मांग कम होती है तब अतिरिक्त बिजली की मदद से पानी को निचले निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय में पंप किया जाता है।
– जब बिजली की मांग चरम पर होती है तो बिजली उत्पन्न करने के लिए पानी छोड़ा जाता है। टरबाइन घूमती है और बिजली का उत्पादन होता है।
– ये सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा के लिए बड़े स्तर पर बिजली भंडारण (ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण) का काम करती है।
वन्य जीवों की आवाजाही में कमी
ये पूरा क्षेत्र सिर्फ बाघों का आवास नहीं है यहां तेंदुआ, जंगली कुत्ता, भेड़िया, सुस्त भालू गौर सांभर और चीतल जैसे कई वन्यजीव आते जाते हैं। ये गलियारा पन्ना के बड़े वन परिदृश्य का हिस्सा है और अलग-अलग जंगलों के बीच वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही में सबसे मुख्य भूमिका निभाता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के पास उपलब्ध टेलीमेट्री डेटा से भी पता चला है कि बाघ इस क्षेत्र के दक्षिणी हिस्से का नियमित रूप से उपयोग कर रहे हैं। हालांकि समिति ने यह भी माना कि यहां से गुजरने वाला पन्ना कालिंजर राज्य राजमार्ग पहले से ही वन्यजीवों की आवाजाही में बाधा पैदा कर रहा है। ऐसे में नई परियोजना से इस दबाव के और बढ़ने की आशंका जताई गई।
परियोजना पर लगाई शर्तें
परियोजना का निरीक्षण राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) और मध्य प्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन के प्रतिनिधियों वाली संयुक्त समिति ने किया था। सभी संस्थानों से अलग-अलग राय भी ली गई। डब्ल्यूआईआई के निदेशक ने माना कि परियोजना से वन्यजीवों के आवास और उनके प्राकृतिक संपर्क पर असर पड़ सकता है। इसे कम करने के लिए उन्होंने कई सुझाव दिए। इनमें मलबा डालने वाले क्षेत्र और बांध के बीच बनने वाली सड़क का मार्ग बदलना, परियोजना की सड़कों के नीचे वन्यजीवों के लिए अंडरपास और बॉक्स कल्वर्ट बनाना साथ ही बाघैन नाले के ऊपर तीन वन्यजीव ओवरपास तैयार करना शामिल है।
वहीं इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार एनटीसीए के सदस्यों का कहना था कि यह परियोजना हरित ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्र की जल व्यवस्था को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। मध्य प्रदेश के मुख्य वन्यजीव संरक्षक ने बताया कि राज्य वन्यजीव बोर्ड पहले ही इस परियोजना की सिफारिश कर चुका है। इसके साथ 41 करोड़ रुपये की वन्यजीव संरक्षण योजना और लगभग 49.95 करोड़ रुपये की जलग्रहण क्षेत्र उपचार योजना भी प्रस्तावित है।
समिति ने परियोजना का संचालन करने वाली श्री सिद्धार्थ इंफ्राटेक एंड सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड पर कई शर्तें भी लगाई हैं। कंपनी को वन्यजीव ओवरपास बनाने होंगे निर्माण के दौरान जंगल और वन्यजीवों को नुकसान नहीं पहुंचाना होगा रात के समय निर्माण कार्य नहीं किया जा सकेगा और पूरे कॉरिडोर में वनस्पति तथा वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सभी तय उपायों का पालन करना होगा। इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना के निर्माण के दौरान पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को जहां तक हो सके कम किया जा सके।
केन बेतवा परियोजना
अब मध्य प्रदेश की दूसरी खबर है केन बेतवा परियोजना। केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली नदी-जोड़ो परियोजना है। इसके तहत मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों में बड़े पैमाने पर विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और पन्ना टाइगर रिजर्व के प्रभावित होने के कारण स्थानीय आदिवासियों, किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा तीखा विरोध प्रदर्शन व अनोखा चिता आंदोलन, आमरण अनशन किया गया है।
इसकी सभी खबरें खबर लहरिया द्वारा लगातार कवरेज की जा रही है जिस साल से केन बेतवा और उसका प्रदर्शन शुरू हुआ तब से लेकर वर्तमान स्थिति तक इसकी कवरेज की गई है जिसमें अब तक सभी जानकारी मिल जाएगी।
इस आंदोलन को खबर लहरिया द्वारा शुरू से रिपोर्टिंग की गई है आप खबर लहरिया के यूट्यूब चैनल और वेबसाइट पर देख सकते हैं जिसका कुछ लिंक नीचे दिया गया है।
केन बेतवा लिंक परियोजना: 18 दिन के आमरण अनशन के बाद मिली पहली जीत, अब ‘न्याय सत्याग्रह’ का ऐलान
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केन-बेतवा परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराना है। लेकिन इस परियोजना के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व के बड़े हिस्से के जंगल डूब क्षेत्र में आने की आशंका लंबे समय से जताई जाती रही है। परियोजना से जुड़े गांवों के लोग वर्षों से पुनर्वास, मुआवजे और जंगलों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
मध्य प्रदेश में आज जो स्थिति बन रही है वो खाली दो परियोजनाओं की कहानी नहीं है। ये उस विकास मॉडल पर सवाल है जिसमें जंगलों को संसाधन के रूप में देखा तो जाता है पर उनकी पारिस्थितिक और सामाजिक भूमिका को अक्सर कम आंका जाता है।
केन-बेतवा परियोजना हो या पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रोपावर परियोजना दोनों की अपनी उपयोगिता हो सकती है। पर यदि इन योजनाओं की कीमत बार-बार जंगल, वन्यजीव और आदिवासी समुदाय ही चुकाते हैं तो विकास की दिशा पर गंभीर बहस जरूरी हो जाती है। असली चुनौती यह नहीं है कि विकास हो या संरक्षण असली चुनौती है कि क्या दोनों के बीच ऐसा संतुलन बनाया जा सकता है जिसमें न तो जंगल उजड़ें, न वन्यजीवों के रास्ते टूटें और न ही उन लोगों का भविष्य खतरे में पड़े, जिनकी जिंदगी सदियों से इन जंगलों से जुड़ी रही है।
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