परिणीति चोपड़ा की क्राइम थ्रिलर फिल्म रिपोर्टिंग लाइव (Reporting Live) नेटफ्लिक्स पर दस्तक दे चुकी है। आइए जानते हैं फिल्म कैसी है और देखने लायक है या नहीं?
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नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई रिपोर्टिंग लाइव
HighLights
नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई रिपोर्टिंग लाइव
कैसी परिणीति चोपड़ा स्टारर क्राइम थ्रिलर?
अवैध रेत खनन का पर्दाफाश करती है फिल्म
एकता गुप्ता, नई दिल्ली। अवैध रेत खनन एक बड़ा अपराध माना जाता है लेकिन फिर भी देश के कई हिस्सों में कई माफिया इसे बेखौफ होकर चला रहे हैं। लेकिन यह अपराध इतनी आसानी कैसे हो रहा है? इसका जवाब है इसके पीछे खड़े बड़े से बड़े बिजनेसमैन, पॉलीटिशियन, ठेकेदार और भ्रष्ट व्यवस्था। लेकिन इतनी बड़ी पावर के पीछे होने के बावजूद भी अगर कोई इस अपराध को सामने लाने की कोशिश करता है तो उसकी जान भी ली जा सकती है।

जी हां और ऐसा असल जिंदगी में हुआ भी है। इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द बुनी है परिणीति चोपड़ा (Parineeti Chopra) की नेटफ्लिक्स (Netflix) पर रिलीज हुई रिपोर्टिंग लाइव (Reporting Live)। फिल्म 9 अक्टूबर को रिलीज हो चुकी है। आइए जानते हैं कैसी है ये इन्वेस्टिगेटिव क्राइम थ्रिलर?
कहानी
रिपोर्टिंग लाइव की कहानी एक गांव में बने ब्रिज के टूटने से होती है जिसकी कवरेज करने रिपोर्टर संध्या यादव (Parineeti Chopra) अपने कैमरामैन विनोद (Deven Bhojani) वहां पहुंचती है। इस दौरान उन्हें गांव के स्थानीय शिवा काका से इसके पीछे का एक ऐसा कारण पता चलता है जिसकी तह में मुख्य मुद्दा अवैध रेत खनन है।

बतौर जर्नलिस्ट दोनों के हाथ ये एक बड़ी स्टोरी लगती है लेकिन इस गोरखधंधे का पता लगाने और इसके सच को लोगों तक पहुंचाने में ना सिर्फ नौकरी जाने का बल्कि जान जाने तक का जोखिम भी है। तो क्या संध्या और विनोद इस अपराध का पर्दाफाश कर पाएंगे? या फिर वे खुद भी इस बड़े जाल का शिकार हो जाएंगे? यह फिल्म देखने पर ही पता चलेगा।
कैसा है डायरेक्शन?
इस फिल्म का निर्देशन ध्रुव त्रिपाठी ने किया और यह उनका डायरेक्टोरियल डेब्यू है। पहली ही फिल्म में ध्रुव ने अच्छा काम किया है। अवैध रेत खनन और जर्नलिज्म के बारे में उनकी रिसर्च अच्छी है लेकिन इन दोनों के बीच पॉलिटिकल एंगल गायब है, जो एक जरूरी पॉइंट है। फिल्म के जरिए एक जरूरी मुद्दा उठाया गया है लेकिन स्क्रीनप्ले और बेहतर हो सकता था।
एक्टिंग
लीड रोल में परिणीति चोपड़ा (Parineeti Chopra) ने अच्छा काम किया है वहीं देवेन ने अपना बेहतरीन प्रभाव छोड़ा है। इनके अलावा शिवा काका के रूप में अमोल पालेकर ने अपना असर छोड़ा है। आदिल हुसैन, शेखर सुमन, शाश्वत चटर्जी जैसे गंभीर कलाकारों का अच्छे से इस्तेमाल नहीं हुआ।
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क्या है खूबी और कमी?
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका मुद्दा है, अवैध रेत खनन जैसा मुद्दा बहुत कम पर्दे पर दिखाया गया है। लेकिन इस फिल्म में इसे बेबाकी से दिखाया गया है। हालांकि स्क्रीनप्ले थोड़ा कमजोर है वहीं कहानी भी प्रीडिक्टेबल है। कुछ ही सीन पर टेंशन क्रिएट होती है।
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अवैध रेत खनन और जर्नलिज्म में आने वाली चुनौतियों को बहुत अच्छे से भुनाया गया है। लेकिन इन सबके बीच पॉलिटिकल एंगल मिसिंग है जो ऐसे मुद्दों में एक जरूरी पॉइंट बन जाता है।
इसके अलावा फिल्म का रनटाइम अच्छा है, 1 घंटे 56 मिनट की फिल्म को ज्यादा खींचने की कोशिश ना करते हुए सीधा मुद्दे पर ही फोकस किया गया है। हालांकि प्लेन कहानी बताने के बजाय कुछ ट्विस्ट और टर्न्स जोड़े जा सकते थे।
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फाइनल वर्डिक्ट
अलग और जरूरी मुद्दे पर बनी परिणीति चोपड़ा की इन्वेस्टिगेटिव क्राइम थ्रिलर एक बार देखी जा सकती है।
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