राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने बागी राम पुकार सिन्हा को पार्टी से 6 साल के लिए निकाल दिया है। सिन्हा सारण शिक्षक सीट से NDA के घोषित प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। अब सिन्हा के समर्थक 3 विधायकों पर कार्रवाई की अटकलें लग
.
कुशवाहा क्या विधायकों को निकालेंगे, उनके पास ऑप्शन क्या है, फिर बागी विधायक क्या करेंगे, इन्हीं सियासी पेच को आज सुलझाएंगे, बूझे की नाही में…।

इसकी संभावना बेहद कम है। दरअसल, इसके पीछे राजनीतिक से ज्यादा संवैधानिक कारण हैं। सूत्रों के मुताबिक, विधायकों पर कोई भी कार्रवाई करने से पार्टी पर संकट आ सकता है। इसलिए कुशवाहा अभी वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं।
सूत्रों के मुताबिक, राम पुकार सिन्हा पर कार्रवाई करना कुशवाहा की मजबूरी थी। चूंकि 9 अक्टूबर को लोकसेवक आवास यानी CM हाउस में हुई मीटिंग में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कहा था, ‘NDA प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले नेताओं पर सभी पार्टियां कार्रवाई करें।’
CM सम्राट का सीधा इशारा पार्टी से बाहर करने की तरफ था। इस बैठक के 3 दिन बाद उपेंद्र कुशवाहा ने 12 अक्टूबर 2026 को प्रदेश महासचिव और प्रवक्ता राम पुकार सिन्हा को अनुशासनहीनता के आरोप में 6 साल के लिए निलंबित कर दिया।
विधायकों पर कार्रवाई की अटकलें क्यों…
दरअसल, RLM विधायक और पार्टी के बिहार अध्यक्ष आलोक सिंह, विधायक दल के नेता आनंद माधव और रामेश्वर महतो ने राम पुकार सिन्हा का समर्थन किया है। तीनों विधायक 5 अक्टूबर को उनके नामांकन के दौरान भी मौजूद थे।

विधायक 3 चीजें कर सकते हैं। इसे सिलसिलेवार तरीके से जानिए…
1. पार्टी पर दावा कर सकते हैं
उपेंद्र कुशवाहा ने अगर विधायकों पर कार्रवाई की तो ज्यादा संभव है कि वह RLM पर दावा ठोकेंगे। इसका संकेत माधव आनंद ने पहले भी दिया था। माधव आनंद ने कहा है, 'राम पुकार सिन्हा को केवल विधायकों ने नहीं RLM ने अपना समर्थन दिया है।'
उन्होंने कहा, '4 विधायकों वाली पार्टी में 3 विधायक ने लोकतांत्रिक तरीके से निर्णय लिया कि कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान के लिए लड़ाई लड़नी है। बागी वाली कोई बात ही नहीं है। यहां पार्टी ने निर्णय लिया है।’
उन्होंने कहा, 'पार्टी बचाने के लिए फैसला लिया गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पार्टी के संविधान के दायरे में हैं और उन्हें यह निर्णय स्वीकार करना होगा।’
अगर विधायकों ने पार्टी पर दावा किया तो लड़ाई लंबी चलेगी। इसे ऐसे समझिए…
- पार्टी के नाम, सिंबल और असली संगठन का फैसला चुनाव चिह्न (आवंटन और आरक्षण) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत भारत निर्वाचन आयोग (ECI) करता है।
- चुनाव आयोग केवल जनप्रतिनिधियों की संख्या नहीं देखता, बल्कि संगठनात्मक बहुमत- जैसे राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य कमेटियां और पार्टी पदाधिकारियों के समर्थन को भी जांचता है।
- यदि उपेंद्र कुशवाहा के पास संगठन, पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं का बहुमत है, तो केवल 3 विधायकों के दावे मात्र से उन्हें पार्टी का नाम और सिंबल नहीं मिलेगा।
- लेकिन जैसा कि माधव आनंद दावा कर रहे हैं कि पार्टी के कार्यकर्ता, संगठन के नेता, प्रदेश अध्यक्ष हमारे साथ हैं, तब कुशवाहा के हाथ से सिंबल फिसल सकता है।
अब इस संवैधानिक नियम को समाजवादी पार्टी और शिवसेना केस के उदाहरण से समझिए…
मुलायम को नहीं, अखिलेश को मिली समाजवादी पार्टी की कमान
जनवरी 2017 में समाजवादी पार्टी (SP) अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव में पार्टी पर कब्जा करने की होड़ मच गई। मुलायम तब बेटे के साथ ना होकर अपने भाई शिवपाल यादव के साथ थे।
1 जनवरी 2017 को रामगोपाल यादव ने पार्टी के राष्ट्रीय प्रतिनिधियों की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। प्रतिनिधि सभा ने अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया।
इस मामले को लेकर मुलायम सिंह यादव चुनाव आयोग पहुंचे। मुलायम सिंह यादव ने चुनाव आयोग के सामने तर्क दिया कि यह सम्मेलन पार्टी के संविधान के विरुद्ध हुआ था। उस वक्त रामगोपाल यादव पार्टी से निष्कासित थे।
- इसलिए अखिलेश यादव का चुनाव अवैध है और पार्टी में कोई टूट नहीं हुई है। अखिलेश की तरफ से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि पार्टी में संगठनात्मक और विधायी, दोनों स्तरों पर अखिलेश यादव के पास भारी बहुमत है।
- आयोग ने दोनों पक्षों से अपनी-अपनी दावेदारी के समर्थन में शपथ पत्र और सदस्यता सूचियां मांगीं। इसके बाद 16 जनवरी 2017 को अपना फैसला सुनाया।
- 42 पेज के अपने फैसले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 'सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग (1972)' के जजमेंट का हवाला दिया। कहा, ‘जब पार्टी संविधान के आंतरिक तंत्र से विवाद सुलझना संभव न हो, तो दोनों विंग (संगठनात्मक और विधायी) के संख्या बल के आधार पर फैसला किया जाता है।’
- आयोग ने अखिलेश गुट की ओर से दाखिल सभी हलफनामों की भौतिक और कानूनी जांच की और उन्हें वैलिड पाया। फिर अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को असली 'समाजवादी पार्टी' घोषित कर दिया।

इस वक्त अखिलेश यादव और शिवपाल यादव एक हो चुके हैं। विधानसभा चुनाव में दोनों साथ हैं।
उद्धव ठाकरे के साथ से निकल गई शिवसेना
- 2022-23 में शिवसेना दो गुटों में टूट हो गई। एकनाथ शिंदे गुट के पास शिवसेना के 55 में से 40 विधायक और 18 में से 13 सांसद थे।
- यह मामला भी चुनाव आयोग और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पार्टी पर दावे का फैसला केवल विधायकों से नहीं, बल्कि पार्टी संविधान और संगठनात्मक टेस्ट से तय होता है।
- हालांकि, शिंदे गुट को विधायिका और संगठन दोनों में भारी बहुमत साबित करने पर सिंबल मिला था।
2. RLM का किसी भी पार्टी में विलय कर सकते हैं
अभी RLM के विधानसभा में 4 विधायक हैं। इसमें से 3 विधायक एक साथ हैं। यानी 75%। अगर विधायक चाहे तो अपनी पार्टी का विलय सदन के अंदर किसी दूसरी पार्टी में कर सकते हैं। इससे वह विधायक भी बने रह सकते हैं।
संविधान की 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ-4 में साफ लिखा है कि पार्टी के दो तिहाई यानी 66% विधायक अगर साथ हो तो वह किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय कर सकते हैं। उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी।
3. इंडिपेंडेंट यूनिट के तौर पर रह सकते हैं
अगर विधायक चाहे तो अपनी स्वतंत्र पहचान यानी बिना किसी पार्टी में शामिल हुए भी रह सकते हैं। उनकी विधायकी खतरे में नहीं पड़ेगी।
संविधान की 10वीं अनुसूची में साफ उल्लेख है कि पार्टी से निकाले जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष विधायकों को सदन में बिना दल के सदस्य के रूप में अधिसूचित करेंगे।

MLC चुनाव के लिए राम पुकार सिन्हा (लेफ्ट से दूसरे) ने 5 अक्टूबर को नामांकन दर्ज कराया। इस दौरान RLM के तीन विधायक उनके साथ मौजूद रहे।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला है…
- सुप्रीम कोर्ट ने दो अलग-अलग केसों (जी. विश्वनाथन और अमर सिंह) में स्पष्ट कहा है- ‘अगर पार्टी सांसद को निकाल भी दे तो भी वह मूल पार्टी का सदस्य माना जाता है, जब तक वह खुद दूसरी पार्टी जॉइन न कर ले। जॉइन करने पर ही डिफेक्शन लागू होता है।’
- 2016 में अमर सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड क्लियर करते हुए कहा था- पार्टी के निष्कासन से स्वतः अयोग्यता नहीं होती। सांसद अनअटैच्ड (स्वतंत्र/बिना किसी पार्टी के) के रूप में सदन में रहते हैं। अगर बाद में कोई नई पार्टी जॉइन या व्हिप तोड़ता है तो स्पीकर फैसला ले सकते हैं।

बिल्कुल नहीं। पार्टी अध्यक्ष होने के नाते उपेंद्र कुशवाहा अपने संगठन या पार्टी से किसी भी विधायक को निकाल सकते हैं। लेकिन उनका यह फैसला सिर्फ पार्टी संगठन के स्तर पर लागू होगा। यानी विधानसभा के अंदर कुशवाहा का फैसला मान्य नहीं होगा। विधायकों की सदस्यता बहाल रहेगी।
दल-बदल विरोधी कानून (संविधान की 10वीं अनुसूची) और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के मुताबिक, विधायकों की सदस्यता 4 कारणों से जा सकती है…
1. अपनी इच्छा से पार्टी छोड़ने पर
कानून में अपनी इच्छा से पार्टी छोड़ने को सदस्यता खत्म करने का प्रमुख आधार बताया गया है। इसका मतलब सिर्फ औपचारिक रूप से पार्टी से इस्तीफा देना नहीं है। इसका दायरा उससे कहीं ज्यादा बड़ा है।
अगर कोई सांसद या विधायक औपचारिक रूप से पार्टी से इस्तीफा नहीं देता है, तब भी उसके व्यवहार और गतिविधियों से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने इच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है।
उदाहरण- 2017 में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के शरद यादव और अनवर अली की सदस्यता राज्यसभा के सभापति ने इस आधार पर खत्म कर दी थी कि उन्होंने कई सार्वजनिक मंचों पर पार्टी की आलोचना की थी। विपक्षी दलों की रैलियों में भी हिस्सा लिया था।
हालांकि...,
कुशवाहा की पार्टी के विधायकों ने ऐसी किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लिया है। उन्होंने ना इस्तीफा दिया और ना ही विरोधी दल के बैनर तले प्रचार किया है। वह RLM के बैनर के सहारे ही अपनी बात कह रहे हैं।
2. पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करना
अगर कोई सांसद या विधायक सदन में अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
यह नियम तभी लागू होता है, जब पार्टी ने उसे मतदान के संबंध में कोई निर्देश दिया हो। इस निर्देश को आम तौर पर 'पार्टी व्हिप' कहा जाता है।
कुशवाहा के विधायकों पर यह नियम अभी लागू नहीं होगा। यह तब लागू होगा जब बिहार विधानसभा के सत्र के दौरान किसी बिल पर वोटिंग हो और RLM व्हिप जारी करे। उस व्हिप का तीनों विधायक उल्लंघन करें।

3. निर्दलीय सदस्य का किसी पार्टी में शामिल होना
अगर कोई व्यक्ति निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतता है और बाद में किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
हालांकि, RLM के तीनों विधायकों पर यह नियम लागू नहीं होता। क्योंकि तीनों विधायक ऑलरेडी पार्टी के सिंबल पर चुने गए हैं।
4. मनोनीत सदस्य का छह महीने बाद किसी पार्टी में शामिल होना
अगर कोई मनोनीत सांसद या विधायक सदन का सदस्य बनने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
कुशवाहा के तीनों विधायक लोगों के वोट से नवंबर 2025 में विधानसभा चुनकर पहुंचे हैं। यह नियम राज्यपाल कोटे से मनोनीत विधान पार्षदों पर लागू होता है।