Time Published: Thursday, August 20, 2026, 16:37 [IST]

Sajjan Kumar Dies: पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का 80 साल की उम्र में निधन हो गया। तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे सज्जन कुमार को 20 अगस्त को मृत अवस्था में सफदरजंग अस्पताल लाया गया। उनकी मौत के साथ 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़ी उनकी लंबी कानूनी लड़ाई फिर से चर्चा में है।

सज्जन कुमार पर 1984 के दंगों के दौरान भीड़ को भड़काने और हत्याओं में भूमिका निभाने के आरोप लगे थे। अलग-अलग मामलों में अदालतों का फैसला भी एक जैसा नहीं रहा। दो मामलों में उन्हें दोषी ठहराकर उम्रकैद हुई, जबकि दो दूसरे मामलों में वह बरी हुए। उनकी 2018 की सजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील भी लंबित थी। ऐसे में आइए जानें पार्षद से उम्रकैद तक की पूरी इनसाइड स्टोरी।

Sajjan Kumar 1984 Riots Case

1977 से शुरू हुआ राजनीतिक सफर, 1980 में बने सांसद

सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को दिल्ली में हुआ था। उन्होंने मैट्रिक तक पढ़ाई की थी। उनके तीन बच्चे थे। राजनीति में उनकी शुरुआत 1977 में दिल्ली नगर निगम के पार्षद के तौर पर हुई।

इसके बाद वह दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के महासचिव बने। साल 1980 में पहली बार बाहरी दिल्ली से लोकसभा सांसद चुने गए। इसके बाद 1991 और 2004 में भी इसी सीट से संसद पहुंचे।

संसद में उन्होंने शहरी विकास और सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना से जुड़ी समितियों में काम किया। लेकिन 1984 के दंगों से जुड़े मामलों ने उनके राजनीतिक करियर पर गहरा असर डाला। दिसंबर 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।

1984 में क्या हुआ था?

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1 नवंबर से दिल्ली और देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा भड़क गई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में करीब 2700 लोगों की मौत हुई, जबकि पूरे देश में मृतकों की संख्या करीब 3500 बताई गई।

इन दंगों में सज्जन कुमार पर भीड़ को भड़काने और हिंसा में भूमिका निभाने के आरोप लगे। उनके खिलाफ अलग-अलग इलाकों में हुई हत्याओं को लेकर मुकदमे चले। मई 2000 में जीटी नानावटी कमीशन बनाया गया।

उसकी सिफारिशों के बाद 24 अक्टूबर 2005 को CBI ने संबंधित मामलों में केस दर्ज किया। इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद में 1984 की घटना पर माफी मांगी और कहा था कि इस घटना से उनका सिर शर्म से झुक जाता है।

2013 में ट्रायल कोर्ट ने किया बरी, फिर पलट गया फैसला

दिल्ली कैंट के पालम कॉलोनी से जुड़े मामले में सज्जन कुमार पर 1 और 2 नवंबर 1984 को एक सिख परिवार के पांच सदस्यों की हत्या और गुरुद्वारा जलाने के मामले में भूमिका का आरोप था। साल 2013 में दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने सज्जन कुमार को बरी कर दिया, जबकि पांच अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया गया।

CBI ने इस फैसले को चुनौती दी। जांच एजेंसी का कहना था कि निचली अदालत ने सज्जन कुमार के खिलाफ मौजूद सबूतों को सही तरह से नहीं देखा और उनके खिलाफ भीड़ को उकसाने के आरोप साबित होते हैं। इसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा।

17 दिसंबर 2018: हाईकोर्ट ने सुनाई उम्रकैद

17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। अदालत ने सज्जन कुमार को पांच सिखों की हत्या और गुरुद्वारा जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। उन्हें उम्रकैद की सजा दी गई, जो उनकी प्राकृतिक जिंदगी के बाकी हिस्से तक लागू थी।

यह 1984 दंगा मामलों में किसी बड़े राजनीतिक चेहरे के खिलाफ हुई अहम सजा में गिनी गई। इसके बाद सज्जन कुमार ने कांग्रेस छोड़ दी और फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनकी कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रही।

2020 से 2022 तक जेल और जमानत की कोशिश

सज्जन कुमार ने 2020 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मांगी थी। उनकी मांग स्वीकार नहीं हुई। वह जेल में ही रहे और 2018 की सजा के खिलाफ उनकी अपील चलती रही। अप्रैल 2022 में 1984 दंगों के एक दूसरे मामले में स्पेशल CBI कोर्ट ने उन्हें जमानत दी। लेकिन इस आदेश को चुनौती मिलने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी रिहाई पर रोक लगा दी। इसलिए 2018 वाले मामले में मिली उम्रकैद की वजह से वह जेल से बाहर नहीं आ सके।

2023 में सुल्तानपुरी केस में बरी

सज्जन कुमार पर दिल्ली के सुल्तानपुरी इलाके में तीन सिखों की हत्या से जुड़े एक अलग मामले में भी मुकदमा चला। सितंबर 2023 में राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें इस केस में बरी कर दिया। कोर्ट के सामने अभियोजन पक्ष सज्जन कुमार की भूमिका को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।

CBI की एक प्रमुख गवाह चाम कौर ने आरोप लगाया था कि सज्जन कुमार भीड़ को भड़का रहे थे। लेकिन अदालत ने उपलब्ध सबूतों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना। यह फैसला दिखाता है कि 1984 दंगा मामलों में हर केस का नतीजा सबूतों के आधार पर अलग रहा।

फरवरी 2025 में फिर उम्रकैद, पिता-पुत्र की हत्या का मामला

सज्जन कुमार को फरवरी 2025 में एक और 1984 दंगा मामले में दोषी ठहराया गया। यह केस सरस्वती विहार में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़ा था। 1 नवंबर 1984 को दोनों पर भीड़ ने हमला किया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि सज्जन कुमार ने भीड़ का नेतृत्व किया और उसे उकसाया।

आरोप यह भी था कि दोनों को जिंदा जला दिया गया और परिवार के सदस्यों ने उन्हें बचाने की कोशिश की तो उन पर भी हमला हुआ। 12 फरवरी 2025 को कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया और 25 फरवरी को उम्रकैद की सजा सुनाई। यह सजा उनकी पहले से चल रही उम्रकैद के साथ ही चलनी थी।

जनवरी 2026 में फिर मिली राहत, लेकिन जेल से नहीं निकले

22 जनवरी 2026 को राउज एवेन्यू कोर्ट ने सज्जन कुमार को जनकपुरी-विकासपुरी हिंसा मामले में बरी कर दिया। इस केस में दो लोगों की मौत हुई थी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष सज्जन कुमार की भूमिका को पुख्ता तौर पर साबित नहीं कर सका।

सज्जन कुमार ने भी अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि उन्हें घटना से जोड़ने वाला कोई भरोसेमंद सबूत नहीं है। हालांकि इस फैसले से उनकी रिहाई नहीं हुई। वजह साफ थी। वह दो अलग मामलों में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे थे।

मौत के वक्त भी सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी लड़ाई

साल 2026 में भी सज्जन कुमार की कानूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2018 के फैसले के खिलाफ उनकी अपील को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी थी। यह अपील लंबित थी।

यानी उनकी कानूनी कहानी में दो दोषसिद्धियां और दो बरी किए जाने के फैसले शामिल रहे। 1984 के दंगों से जुड़े मामलों में सज्जन कुमार की भूमिका पर दशकों तक अदालतों में सुनवाई चली।

एक मामले में 2013 का बरी करने वाला फैसला 2018 में पलटा, दूसरे मामले में 2025 में उम्रकैद मिली। वहीं 2023 और 2026 में अलग-अलग मामलों में उन्हें राहत भी मिली। सज्जन कुमार का निधन ऐसे समय हुआ, जब 1984 के एक बड़े मामले में उनकी सुप्रीम कोर्ट अपील अभी लंबित थी।