संघ-सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक... SC-ST आरक्षण पर अचानक इतनी बात क्यों होने लगी?

मोहन भागवत और केंद्र सरकार ने आरक्षण पर क्या कहा है?

पिछले कुछ दिनों में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है. एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण को लेकर एक बड़ा बयान दिया है, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में SC, ST, OBC और EWS आरक्षण के भीतर आय-आधारित उप-वर्गीकरण (सब-कोटा) को लेकर केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ किया है. इसके अलावा भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन जैसे कैंपेन चलाए जा रहे हैं. आखिर ये पूरा मामला है क्या और इसे लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है, आइए विस्तार से समझते हैं.

आरक्षण का मुद्दा गर्म क्यों?

आरक्षण को लेकर बहस कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल में कई घटनाओं ने इसे फिर सुर्खियों में ला दिया. पहली, मोहन भागवत का यह बयान कि जिन लोगों को आरक्षण का फायदा मिल चुका है, उन्हें अब खुद आगे बढ़कर पीछे हट जाना चाहिए. दूसरी, सुप्रीम कोर्ट में चल रही उस सुनवाई में केंद्र सरकार का जवाब, जिसमें आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर वर्गीकरण की मांग की गई थी. इन दोनों घटनाओं ने आरक्षण नीति के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

इसके अलावा इन दोनों से पहले एक तीसरा पहलू भी इस बहस को हवा दे रहा है. हाल ही में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी). मई 2026 में अभिजीत दिपके द्वारा शुरू किया गया एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन का धरना-प्रदर्शन खत्म हुआ, जिसके बाद सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मांगें मान लीं. इसी के बाद सोशल मीडिया पर ‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’ (RHA) नाम से एक डिजिटल कैंपेन तेजी से उभरा, जिसने महज कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए और खुद को किसी भी राजनीतिक दल से अलग बताते हुए आरक्षण नीति में बदलाव की मांग करने लगा. इसी कड़ी में कुछ रैपन ने भी अलग अभियान शुरू किया और सीजेपी पर आंदोलन के दौरान गंभीरता की कमी का आरोप लगाया. इन घटनाओं ने आरक्षण को लेकर युवाओं के बीच ऑनलाइन बहस को और तेज़ कर दिया है.

Mohan Bhagwat On Reservation

मोहन भागवत का बयान

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार के एक कार्यक्रम में कहा किजिन लोगों ने आरक्षण का लाभ उठाकर सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्की कर ली है, उन्हें उदारता दिखाते हुए खुद पीछे हट जाना चाहिए, ताकि उनके समुदाय के बाकी लोग भी इसका लाभ उठा सकें. उनका कहना था कि आरक्षण का फायदा उठा चुके कुछ लोगों के मन में अब यह भावना आनी चाहिए कि वे स्वेच्छा से यह लाभ छोड़ दें, ताकि समाज के अन्य जरूरतमंद वर्गों तक भी इसका फायदा पहुंच सके.

जब उनसे पूछा गया कि क्या आरक्षण अनिश्चित काल तक जारी रहना चाहिए या इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए, तो भागवत ने सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मैं आपको सीधा जवाब नहीं दूंगा. मैं आपसे कहूंगा कि आप देखें कि आरक्षण के बारे में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की क्या सोच थी. अगर हम ईमानदारी से उनकी सलाह का पालन करें, तो कोई समस्या नहीं है. भागवत ने आगे यह भी कहा कि आरक्षित समुदायों के भीतर वर्गीकरण (सब-कैटेगराइजेशन) की मांग इसलिए उठ रही है, क्योंकि अब यह बात व्यापक रूप से मानी जाने लगी है कि आरक्षण का लाभ सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित न रहकर, समुदाय के सभी हिस्सों तक पहुंचना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का जवाब

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में भी आरक्षण से जुड़ा एक अहम मामला चल रहा है. केंद्र सरकार ने अदालत में उस याचिका का कड़ा विरोध किया है, जिसमें SC, ST, OBC और EWS आरक्षण के भीतर आय के आधार पर सब-कोटा और प्राथमिकता तय करने की मांग की गई थी. सरकार का तर्क है कि आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ापन है. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि “क्रीमी लेयर” यानी आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का सिद्धांत, जो OBC पर लागू होता है, वह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) पर लागू नहीं होता.

केंद्र ने अदालत को बताया कि आरक्षण की सूचियों में बदलाव करना पूरी तरह से संसद का अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूचियों में केवल संसद ही संशोधन कर सकती है, अदालतें नहीं. इसी तरह, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC/SEBC) की केंद्रीय सूची में भी किसी भी तरह का बदलाव या किसी समूह को बाहर करने का काम केवल संसद द्वारा पारित कानून के जरिए ही हो सकता है. सरकार के मुताबिक, राज्य सरकारों, अदालतों या ट्रिब्यूनल को इन सूचियों में फेरबदल करने का अधिकार नहीं है, हालांकि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी अलग पिछड़ा वर्ग सूची बना सकते हैं. केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा नीति बनाने के लिए अदालत से आदेश की मांग करना न्यायिक दायरे से बाहर की बात है, क्योंकि नीति निर्माण का काम विधायिका और कार्यपालिका का है, न कि न्यायपालिका का. इसी आधार पर सरकार ने इस याचिका को भारी जुर्माने के साथ खारिज करने की मांग अदालत से की है.

आरक्षण क्यों मिलता है?

आरक्षण की व्यवस्था भारतीय संविधान का हिस्सा है और इसका मकसद उन समुदायों को मुख्यधारा में लाना है, जो सदियों से सामाजिक भेदभाव, जातिगत छुआछूत और शैक्षणिक-आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार रहे हैं. संविधान निर्माताओं, खासकर डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यह माना था कि केवल कानूनी समानता देने से सामाजिक असमानता खत्म नहीं होगी, इसलिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी आरक्षण के दायरे में लाया गया, और हाल के वर्षों में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की गई.

सरकार का रुख यह रहा है कि SC/ST आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव है, इसलिए इसमें आर्थिक आधार पर वर्गीकरण या “क्रीमी लेयर” जैसा सिद्धांत लागू करना उचित नहीं माना जाता. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही मौजूदा बहस और मोहन भागवत के बयान, दोनों ही इस बुनियादी सवाल से जुड़े हैं कि आरक्षण किसे, कब तक और किस आधार पर मिलना चाहिए.

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देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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