अब सैटेलाइट बनाएंगी भारत की बेटियां! मिशन ShakthiSAT से मिलेगी स्पेस टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग

बेटियों को स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी से जोड़ने की पहलImage Credit source: Getty Images

अंतरिक्ष की दुनिया अब केवल रॉकेट, वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की कहानी नहीं रह गई है. आज इस कहानी में वो युवा लड़कियां भी शामिल हो रही हैं, जो सैटेलाइट को दूर से देखने के बजाय उसे बनाने, उसके पेलोड को समझने और अंतरिक्ष मिशन के टेक्निकल प्रोसेस में योगदान का सपना देख रही हैं. भारत ने स्पेस साइंस में अपनी क्षमताओं को दुनिया के सामने साबित किया है. अब जरूरत है कि देश के अधिक से अधिक युवा इस क्षेत्र की संभावनाओं को समझें और फ्यूचर टेक्नोलॉजी डेवलप करने में अपनी भूमिका निभाएं. मिशन ShakthiSAT इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है.

भारतीय वायुसेना की पूर्व विंग कमांडर और मिशन ShakthiSAT की भारतीय एम्बेसडर जया तारे कहती हैं, ‘मेरे लिए ShakthiSAT केवल लड़कियों को अंतरिक्ष के बारे में बताने वाला कार्यक्रम नहीं है. यह उन्हें अंतरिक्ष तकनीक को समझने, उससे जुड़ने और भविष्य में इस क्षेत्र में योगदान देने के मौके देने की कोशिश है’.

क्या है मिशन ShakthiSAT?

स्पेस किड्ज इंडिया की सीईओ और मिशन डायरेक्टर डॉ. श्रीमाथी केसन द्वारा शुरू मिशन ShakthiSAT का उद्देश्य 108 देशों की 12,000 लड़कियों को स्पेस साइंस और टेक्नोलॉजी से जोड़ना है. इस मिशन को IN-SPACe और ISRO का सपोर्ट है. प्रोग्राम में स्टूडेंट्स को फिजिक्स, कोडिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, PCB डिजाइन और HAM रेडियो जैसे सब्जेक्ट पढ़ाए जाते हैं. आगे की ट्रेनिंग में सैटेलाइट पेलोड, सेंसर, एम्बेडेड सिस्टम, स्पेसक्राफ्ट डिजाइन, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और मिशन प्लानिंग जैसे टेक्निकल प्रोसेस को समझने का मौका मिलता है. इस प्रोग्राम का प्रैक्टिकल एप्रोच इसका प्लस पॉइंट है. साइंस को किताबों से निकालकर रियल वर्ल्ड में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, यह समझाना इसका उद्देश्य है.

भारत के स्पेस फ्यूचर के लिए जरूरी पहल?

भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से नए अवसरों की ओर बढ़ रहा है. सैटेलाइट निर्माण, स्पेस एप्लीकेशन्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, संचार और नई अंतरिक्ष तकनीकों में ट्रेन्ड और स्किल्ड टैलेंट की जरूरत है. जया तारे कहती हैं कि भारत की अंतरिक्ष क्षमता केवल हमारे रॉकेट और सैटेलाइट से तय नहीं होगी. हम भविष्य के लिए कितने साइंटिस्ट, इंजीनियर, रिसर्चर और उद्यमी तैयार कर रहे हैं, यह देखना जरूरी है. बच्चों को कम उम्र से ही साइंस और तकनीक के प्रैक्टिकल पहलुओं से परिचित कराया जाए.

शक्तिसैट (ShakthiSAT) की एक खासियत इसका इंटरनेशनल स्वरूप भी है. 108 देशों की छात्राओं को एक मंच पर लाना उन्हें एक-दूसरे से सीखने और सहयोग की भावना विकसित करने का अवसर देता है. जया तारे कहती हैं, ‘अंतरिक्ष की कोई भौतिक सीमा नहीं होती. अंतरिक्ष का इस्तेमाल शांतिपूर्ण उद्देश्यों, साइंटिफिक प्रोग्रेस और मानव कल्याण के लिए होना चाहिए. मिशन ShakthiSAT का लक्ष्य यही है’. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात में मिशन का जिक्र किया है, जिससे इस पहल को व्यापक राष्ट्रीय पहचान मिली.

टैलेंट हंट और ट्रेनिंग का मंच

जया तारे कहती हैं कि मिशन के साथ भारतीय एम्बेसडर के रूप में उनकी भूमिका एक बड़ी जिम्मेदारी थी. लगभग 3,000 कैंडिडेट्स में अलग-अलग स्टेट और बैकग्राउंड से आने वाली 20 लड़कियों को चुना, तो समझ आया कि भारत के हर कोने में टैलेंट है. कई बार बच्चों के पास संसाधन कम होते हैं, लेकिन सीखने की इच्छा और कुछ नया करने की चाह बहुत अधिक होती है. ऐसे बच्चों को सही प्लेटफॉर्म और गाइडेंस मिल जाए, तो वो अपनी क्षमताओं को पहचान सकते हैं.

इंस्पायर नहीं सक्षम बनाना भी जरूरी

एक पूर्व वायुसेना पायलट के रूप में जया तारे कहती हैं कि सिर्फ लड़कियों को यह बताने से बात नहीं बनेगी कि वे कुछ भी कर सकती हैं. उन्हें वह टेक्निकल क्षमता और प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस भी देना होगा, जिससे वो वास्तव में ऐसा कर सकें. अंतरिक्ष क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी का उद्देश्य सक्षम साइंटिस्ट, इंजीनियर, उद्यमी और टेक्निकल लीडर तैयार करना होना चाहिए. इसका फायदा पूरे देश को मिलेगा.

अवसर से योगदान तक

मिशन ShakthiSAT का रियल इम्पैक्ट फ्यूचर में दिखाई देगा, जब इसकी प्रतिभागी छात्राएं साइंस और इंजीनियरिंग फील्ड में आगे बढ़ेंगी, रिसर्च करेंगी, नई तकनीक डेवलप करेंगी या भारत के अंतरिक्ष उद्योग का हिस्सा बनेंगी. सभी स्पेस साइंटिस्ट न भी बनें, तो ऐसे एक्सपोजर उन्हें साइंटिफिक सोच, प्रॉब्लम सॉल्विंग, टीमवर्क और टेक्नीक को समझने का मौका देते हैं.

जया तारे कहती हैं कि भारत को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को मिली यह इंस्पिरेशन आगे एजुकेशन, रिसर्च, इंटर्नशिप, उद्योग और रोजगार के अवसरों से जुड़ सके. सरकार, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, रिसर्च ऑर्गनाइजेशन और प्राइवेट फील्ड के बीच सहयोग इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, क्योंकि भारत की अगली अंतरिक्ष छलांग केवल इस बात से तय नहीं होगी कि हम कितनी ऊंचाई तक पहुंचते हैं, बल्कि इससे भी कि हम कितनी नई प्रतिभाओं को अपने साथ लेकर आगे बढ़ते हैं. जब यंग जनरेशन को मौके मिलते हैं, तो आसमान केवल देखने की नहीं, कुछ नया बनाने की शुरुआत बन जाता है.

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प्रमिला दीक्षित

प्रमिला दीक्षित

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय... कश्मीर से केदारनाथ और काशी तक, अपराध से आतंकवाद तक, दंगों की क्रूरता से दरियादिली की कहानी तक, राजनीति से साहित्य की रवानी तक, तथ्य, तर्क और संवेदना के साथ हर विषय पर रिपोर्टिंग करती रही हैं. वीडियो, रेडियो, ब्लॉग- लेख, कविता और मॉडरेशन उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम है.

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