“ये बड़ा जानवर है, पिंजरे में कैद नहीं होगा.” फिल्म 'रॉकस्टार' में शम्मी कपूर ने रणबीर कपूर से यह बात कही थी, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी. पर्दे पर 'जंगली' बनकर उन्होंने जिस बेफिक्र अंदाज से हिंदी सिनेमा के हीरो की परिभाषा बदली, निजी जिंदगी में भी उनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी.

पर्दे पर अपनी मर्जी से जीने वाला, बेफिक्र अंदाज में डांस करने वाला और रोमांस की नई परिभाषा गढ़ने वाला यह अभिनेता असल जिंदगी में भी अपनी अलग पहचान बनाने के लिए लगातार लड़ता रहा. कभी पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर के छोटे भाई के तौर पर पहचाने गए, तो कभी लगातार फ्लॉप फिल्मों ने उनके करियर पर सवाल खड़े किए. फिर 'जंगली' बनकर ऐसा तहलका मचाया कि पूरा बॉलीवुड उनके अंदाज की नकल करने लगा. हालांकि, उनकी निजी जिंदगी भी कम उतार-चढ़ाव वाली नहीं थी.

गीता बाली से बेइंतहा मोहब्बत, पत्नी को खोने का दर्द, मुमताज को शादी के लिए प्रपोज करने का किस्सा, गुस्सैल स्वभाव और एक दिन में 100 सिगरेट पीने की आदत… शम्मी कपूर की जिंदगी में शोहरत के साथ कई ऐसे पहलू भी थे, जो उन्हें पर्दे के अपने किरदार से कहीं ज्यादा दिलचस्प बनाते हैं.

21 अक्टूबर 1931 को बॉम्बे में जन्मे शम्मी कपूर का असली नाम शमशेर राज कपूर था. 14 अगस्त 2011 को 79 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने हिंदी सिनेमा को ऐसे गाने और किरदार दिए, जिनका जादू आज भी कायम है. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें अपने ही परिवार की बड़ी विरासत के बीच खुद को साबित करना पड़ा.

पिता पृथ्वीराज कपूर, भाई राज कपूर… फिर भी पहचान के लिए तरसे

शम्मी कपूर का जन्म उस परिवार में हुआ था, जिसने हिंदी सिनेमा को कई बड़े सितारे दिए. उनके पिता पृथ्वीराज कपूर अभिनय और थिएटर की दुनिया के दिग्गज थे. बड़े भाई राज कपूर अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के तौर पर अपनी धाक जमा चुके थे, जबकि छोटे भाई शशि कपूर भी आगे चलकर बड़े स्टार बने.

शम्मी ने 1948 में अपने पिता की थिएटर कंपनी पृथ्वी थिएटर्स में काम करना शुरू किया. उस समय उन्हें हर महीने 50 रुपये वेतन मिलता था. थिएटर में काम करके उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं. इसके बाद उन्होंने फिल्मों का रुख किया और 1953 में 'जीवन ज्योति' से बड़े पर्दे पर कदम रखा.

लेकिन पिता और भाई की लोकप्रियता का फायदा उन्हें स्टार बनाने में काम नहीं आया. 'रेल का डिब्बा', 'लैला मजनू', 'ठोकर' और 'गुल सनोबर' जैसी फिल्मों में काम करने के बावजूद उनका करियर आगे नहीं बढ़ रहा था.

शम्मी कपूर ने खुद एक इंटरव्यू में अपने शुरुआती संघर्ष को याद करते हुए कहा था कि करीब 20 फिल्मों के बाद भी वह कोई बड़े स्टार नहीं थे. लोग उन्हें पृथ्वीराज कपूर के बेटे के तौर पर पहचानते थे. एक अभिनेता के लिए इससे बड़ी निराशा क्या होती कि परिवार का नाम होने के बावजूद उसकी अपनी कोई पहचान नहीं थी.

18 फ्लॉप फिल्मों के बाद बदला अंदाज, फिर बॉलीवुड ने कहा- 'तुमसा नहीं देखा'

शम्मी कपूर को समझ आ गया था कि अगर उन्हें अपनी पहचान बनानी है, तो उन्हें दूसरे अभिनेताओं से अलग दिखना होगा. उस दौर में दिलीप कुमार गंभीर अभिनय के लिए जाने जाते थे, देव आनंद अपने स्टाइल और रोमांटिक अंदाज के लिए मशहूर थे और राज कपूर की अपनी अलग छवि थी. ऐसे में शम्मी के सामने चुनौती थी कि वह आखिर किस रास्ते पर चलें.

उन्होंने पारंपरिक हीरो वाली छवि से बाहर निकलने का फैसला किया. अपने कपड़ों, हेयरस्टाइल, बॉडी लैंग्वेज और डांस करने के तरीके में बदलाव किया. पत्नी गीता बाली ने भी उनके इस बदलाव में मदद की. शम्मी ने अपने व्यक्तित्व को एक ऐसे हीरो के रूप में ढाला, जो पर्दे पर खुलकर हंसता था, शरारत करता था, प्यार का इजहार करता था और गानों में किसी तूफान की तरह नजर आता था.

1957 में आई फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई. इसके बाद 'दिल देकर देखो' ने उनकी लोकप्रियता बढ़ाई. फिर 1961 में आई 'जंगली' ने उनकी किस्मत बदल दी.

फिल्म में उनका चुलबुला अंदाज और 'चाहे कोई मुझे जंगली कहे' गाने में उनका जोश दर्शकों को खूब पसंद आया. उनका 'याहू!' हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार अंदाजों में शामिल हो गया. इसके बाद शम्मी कपूर सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहे, बल्कि युवाओं के फैशन, डांस और रोमांस पर असर डालने वाले स्टार बन गए.

'कश्मीर की कली', 'तीसरी मंजिल' और 'ब्रह्मचारी' ने बनाया सुपरस्टार

'जंगली' की सफलता के बाद शम्मी कपूर ने लगातार कई हिट फिल्मों में काम किया. 1962 में 'प्रोफेसर', 'दिल तेरा दीवाना' और 'चाइना टाउन' जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया. 1964 में 'कश्मीर की कली' में शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई.

1965 की 'जानवर' और 1966 की 'तीसरी मंजिल' ने उनकी स्टारडम को मजबूत किया. खासकर 'तीसरी मंजिल' में शम्मी का अंदाज और फिल्म का संगीत आज भी याद किया जाता है. 1967 में 'एन इवनिंग इन पेरिस' और 1968 में 'ब्रह्मचारी' ने उनके करियर को नई ऊंचाई दी.

'ब्रह्मचारी' के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला. इस फिल्म में उन्होंने ऐसे शख्स का किरदार निभाया, जो अनाथ बच्चों की देखभाल करता है. इससे साबित हुआ कि शम्मी सिर्फ रोमांटिक और शरारती हीरो ही नहीं, बल्कि भावनात्मक भूमिकाओं में भी दर्शकों को प्रभावित कर सकते थे.

हालांकि, समय के साथ हिंदी फिल्मों का मिजाज बदलने लगा. 1970 के दशक में नई तरह की कहानियां और नए सितारे सामने आए. शम्मी का वजन भी बढ़ने लगा, जिससे पारंपरिक रोमांटिक हीरो के रूप में उनके लिए मौके कम हो गए. उन्होंने निर्देशन में भी हाथ आजमाया, लेकिन बाद में चरित्र भूमिकाओं के जरिए अपनी दूसरी पारी शुरू की.

'विधाता', 'हीरो', 'बेताब', 'प्रेम रोग', 'अवतार' और 'हुकूमत' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को पसंद किया गया. 1982 में 'विधाता' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला.

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नूतन से नजदीकियों की चर्चा, मुमताज को शादी के लिए किया था प्रपोज

शम्मी कपूर की फिल्मों की तरह उनकी निजी जिंदगी भी हमेशा दिलचस्पी का विषय रही. उनके कई अभिनेत्रियों के साथ रिश्तों की चर्चाएं हुईं. अभिनेत्री नूतन के साथ उनके जुड़ाव के किस्से भी सामने आए, हालांकि इन संबंधों के बारे में अलग-अलग विवरण मिलते हैं.

अभिनेत्री मुमताज के साथ शम्मी कपूर की प्रेम कहानी का जिक्र भी अक्सर होता है. मुमताज ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शम्मी ने उन्हें शादी के लिए प्रपोज किया था. उस वक्त मुमताज अपने करियर की शुरुआत कर रही थीं और उम्र में भी काफी छोटी थीं.

बताया जाता है कि शम्मी चाहते थे कि शादी के बाद मुमताज फिल्मों में काम करना छोड़ दें. लेकिन मुमताज अपने करियर को आगे बढ़ाना चाहती थीं. दोनों की प्राथमिकताएं अलग थीं और यह रिश्ता शादी तक नहीं पहुंच पाया.

यहां ध्यान देने वाली बात है कि शम्मी की निजी जिंदगी को लेकर कई किस्से लोकप्रिय रहे हैं, लेकिन हर चर्चा को पक्के रिश्ते या अफेयर के तौर पर पेश करना सही नहीं होगा. मुमताज के मामले में उनके अपने बयान को आधार बनाना सबसे बेहतर है.

गीता बाली से पहली मुलाकात, फिर अचानक कर ली शादी

शम्मी कपूर की जिंदगी में सबसे अहम रिश्ता अभिनेत्री गीता बाली के साथ रहा. दोनों की मुलाकात फिल्मी दुनिया में काम करने के दौरान हुई. गीता उस समय एक स्थापित अभिनेत्री थीं, जबकि शम्मी अपने करियर में संघर्ष कर रहे थे.

दोनों के बीच प्यार हुआ और 1955 में उन्होंने शादी कर ली. उनकी शादी की कहानी भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी. शम्मी ने बाद में बताया था कि गीता ने उनसे कहा कि अगर शादी करनी है, तो उसी दिन करनी होगी. इसके बाद दोनों ने जल्दबाजी में शादी करने का फैसला किया.

इस रिश्ते में एक तरफ कपूर परिवार की परंपराएं थीं, तो दूसरी तरफ शम्मी और गीता का अपना फैसला. शादी के बाद परिवार ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया. दोनों के दो बच्चे हुए- बेटा आदित्य राज कपूर और बेटी कंचन कपूर.

गीता ने शम्मी के मुश्किल करियर दौर में उनका साथ दिया. शम्मी ने अपने लुक और अंदाज में जो बदलाव किए, उसमें गीता की भूमिका का भी जिक्र किया जाता है. जिस वक्त उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था, उस वक्त उनका निजी जीवन गीता के साथ आगे बढ़ रहा था.

जब 34 साल की उम्र में गीता बाली ने दुनिया को कहा अलविदा

शम्मी कपूर की जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर 1965 में आया, जब गीता बाली का चेचक की वजह से निधन हो गया. वह महज 34 साल की थीं. उस समय शम्मी अपने करियर के सुनहरे दौर में थे, लेकिन निजी जिंदगी में उन्हें ऐसा सदमा लगा, जिससे उबरना आसान नहीं था.

गीता की मौत के बाद शम्मी के जीवन में एक बड़ा खालीपन आ गया. उनकी दूसरी पत्नी नीला देवी ने बाद के इंटरव्यू में बताया कि गीता की याद शम्मी के जीवन में हमेशा बनी रही. वह हर साल 1 जनवरी से 21 जनवरी तक शराब नहीं पीते थे. इसकी वजह यह थी कि गीता 1 जनवरी को बीमार पड़ी थीं और 21 जनवरी को उनका निधन हुआ था.

यह आदत उनके लिए अपनी पहली पत्नी की याद को जिंदा रखने का एक निजी तरीका बन गई थी. पर्दे पर हमेशा हंसते-मुस्कुराते नजर आने वाले शम्मी के भीतर गीता को खोने का दर्द लंबे समय तक मौजूद रहा.

नीला देवी से दूसरी शादी, बच्चों के लिए नहीं किया अपना परिवार बढ़ाने का फैसला

गीता बाली के निधन के चार साल बाद, 1969 में शम्मी कपूर ने नीला देवी से शादी की. नीला देवी गुजरात के भावनगर के पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखती थीं. इस शादी के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी थी- गीता के दोनों बच्चों को अपनाना और परिवार को संभालना.

नीला देवी ने शम्मी से शादी के बाद आदित्य और कंचन की परवरिश को प्राथमिकता दी. उन्होंने खुद बच्चे न करने का फैसला किया, ताकि दोनों बच्चों को मां के प्यार और परिवार में अपनी जगह को लेकर किसी तरह की असुरक्षा महसूस न हो.

नीला देवी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शम्मी का स्वभाव गुस्सैल था. वह कई बार छोटी-छोटी बातों पर भी नाराज हो जाते थे. हालांकि, समय के साथ उनमें बदलाव आया. नीला देवी ने उनके साथ लंबा जीवन बिताया और उनके अंतिम वर्षों में भी उनका साथ दिया.

एक दिन में 100 सिगरेट, शराब की लत और गुस्सा

शम्मी कपूर की जिंदगी का एक ऐसा पहलू भी था, जो उनके पर्दे वाले मस्तमौला अंदाज से अलग था. उनकी दूसरी पत्नी नीला देवी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शम्मी एक दिन में करीब 100 सिगरेट पीते थे. वह शराब भी खूब पीते थे और उनका गुस्सा भी काफी तेज था.

नीला देवी के मुताबिक, शम्मी को सिगरेट छोड़ने के लिए समझाना आसान नहीं था. बाद के वर्षों में उन्होंने धूम्रपान छोड़ दिया, लेकिन लंबे समय तक की गई इस आदत का असर उनकी सेहत पर पड़ा. नीला देवी ने बताया था कि पहले उनके फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं सामने आईं और बाद में किडनी की परेशानी भी बढ़ गई.

'रॉकस्टार' में आखिरी दौर की यादगार मौजूदगी

शम्मी कपूर ने अपने करियर में कई पीढ़ियों के साथ काम किया. उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने मुख्य भूमिकाओं से दूरी बनाई, लेकिन अभिनय से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ. वह नई पीढ़ी की फिल्मों में भी नजर आए.

2011 में आई इम्तियाज अली की फिल्म 'रॉकस्टार' में उन्होंने रणबीर कपूर के साथ काम किया. रणबीर उनके परिवार की अगली पीढ़ी से आते थे और फिल्म में शम्मी का किरदार कहानी के अहम हिस्से में शामिल था. फिल्म के दौरान उनका संवाद- 'ये बड़ा जानवर है, ये आपके छोटे पिंजड़े में नहीं समाएगा' उनके बिंदास व्यक्तित्व की याद दिलाता है.

14 अगस्त 2011 को शम्मी कपूर का निधन हो गया. जीवन के अंतिम वर्षों में वह किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे और उन्हें नियमित डायलिसिस की जरूरत पड़ती थी. लेकिन बीमारी के बावजूद उनकी पहचान एक ऐसे अभिनेता की रही, जिसने हिंदी सिनेमा के हीरो को नया अंदाज दिया.

शम्मी कपूर की जिंदगी को सिर्फ फ्लॉप फिल्मों, अफेयर की चर्चाओं या उनकी आदतों से नहीं समझा जा सकता. उनकी असली कहानी उस कलाकार की है, जिसने शुरुआती असफलताओं के बाद खुद को बदला, अपनी अलग पहचान बनाई और समय बदलने पर चरित्र भूमिकाओं में भी अपनी जगह कायम रखी. 'जंगली' का उनका अंदाज आज भी याद किया जाता है, क्योंकि वह सिर्फ पर्दे पर निभाया गया किरदार नहीं था- वह उनकी जिंदगी की बेफिक्र ऊर्जा का भी प्रतीक बन गया.

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