सुल्तानपुर: विकास भवन स्थित मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय में एक सेवानिवृत्त कर्मचारी (Sultanpur CDO Steno Controversy) के कथित तौर पर अब भी स्टेनो पटल से जुड़े काम करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। अपना दल (एस) के अयोध्या क्षेत्रीय उपाध्यक्ष अविनाश पटेल ने जिलाधिकारी को पत्र देकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

शिकायत में विकास विभाग में तैनात रहे देवेंद्र पाण्डेय का नाम लिया गया है। आरोप है कि सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वह मुख्य विकास अधिकारी के कार्यालय में स्टेनो से जुड़े संवेदनशील कार्य कर रहे हैं। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि ऐसा है तो उन्हें किस नियुक्ति आदेश, संविदा, मानदेय अथवा अन्य प्रशासनिक व्यवस्था के तहत यह जिम्मेदारी दी गई है।

मामले का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि देवेंद्र पाण्डेय की सेवानिवृत्ति कोई अस्पष्ट या अपुष्ट सूचना नहीं है। देवेंद्र पाण्डेय 31 दिसंबर 2024 को सेवानिवृत्त हुए थे और इसके बाद विकास विभाग के लिपिक राम सुमिरन यादव को CDO का स्टेनो बनाया गया था। तत्कालीन प्रभारी मुख्य विकास अधिकारी अजय कुमार पाण्डेय ने उनकी तैनाती का आदेश जारी किया था।

यही तथ्य मौजूदा शिकायत को अधिक गंभीर बनाता है। जब सेवानिवृत्ति के अगले ही दिन दूसरे कर्मचारी को स्टेनो की जिम्मेदारी दिए जाने की सूचना सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद है, तो शिकायतकर्ता अब यह जानना चाहते हैं कि देवेंद्र पाण्डेय यदि वर्तमान में भी उसी पटल से जुड़े सरकारी काम कर रहे हैं तो उसका वैधानिक और प्रशासनिक आधार क्या है।

हालांकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि संबंधित सेवानिवृत्त कर्मचारी बिना किसी सक्षम आदेश के सरकारी कार्य कर रहे हैं। प्रशासन की विस्तृत जांच और संबंधित आदेश सामने आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में देवेंद्र पाण्डेय, CDO कार्यालय या जिला प्रशासन की ओर से इस आरोप पर विस्तृत जवाब अभी सामने नहीं आया है।

Sultanpur CDO Steno Controversy : 9 सितंबर को DM को सौंपा गया शिकायत पत्र

अपना दल (एस) के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष अविनाश पटेल ने पत्र संख्या 091/2026, दिनांक 09 सितंबर 2026 के माध्यम से जिलाधिकारी के सामने मामला उठाया है।

शिकायत का केंद्र केवल यह नहीं है कि कोई रिटायर्ड कर्मचारी कार्यालय में आता-जाता है। आरोप सीधे CDO के स्टेनो पटल और उससे जुड़े आधिकारिक कार्यों को लेकर है।

पत्र में कहा गया है कि इस पटल का संबंध अधिकारियों के पत्राचार, महत्वपूर्ण फाइलों, निर्देशों और विकास योजनाओं से जुड़े दस्तावेजों से रहता है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच और कार्यालय की गोपनीयता को लेकर सवाल उठाए हैं। स्वतंत्र रूप से प्रकाशित खबर में भी शिकायत के इन्हीं बिंदुओं की पुष्टि होती है।

जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट मुख्य विकास अधिकारी को जिले की विकास गतिविधियों की निगरानी करने वाला वरिष्ठ अधिकारी बताती है। यानी CDO कार्यालय का संबंध विभिन्न विकास योजनाओं और विभागीय समन्वय से है।

इसलिए शिकायत में उठाया गया मूल सवाल कर्मचारी की उम्र या सेवानिवृत्ति मात्र नहीं, बल्कि सरकारी पटल पर उसकी मौजूदा अधिकृत स्थिति है।

31 दिसंबर 2024 को रिटायर हुए थे देवेंद्र पाण्डेय

मौजूदा विवाद की टाइमलाइन इस मामले को समझने में महत्वपूर्ण है।

तारीख/अवधिघटनाक्रम
31 दिसंबर 2024देवेंद्र पाण्डेय के सेवानिवृत्त होने की सूचना
1 जनवरी 2025राम सुमिरन यादव को CDO स्टेनो की जिम्मेदारी दिए जाने की खबर
9 सितंबर 2026अविनाश पटेल ने DM को पत्र देकर जांच की मांग की
11 सितंबर 2026मामला सार्वजनिक रूप से मीडिया में सामने आया
13 सितंबर 2026 तकउपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में विस्तृत प्रशासनिक स्पष्टीकरण नहीं मिला

1 जनवरी 2025 की प्रकाशित खबर में साफ दर्ज है कि देवेंद्र पाण्डेय के 31 दिसंबर को रिटायर होने के बाद राम सुमिरन यादव को स्टेनो की जिम्मेदारी दी गई थी।

इस हिसाब से सितंबर 2026 तक देवेंद्र की सेवानिवृत्ति को करीब 20 महीने हो चुके हैं। इसलिए शिकायत में इस्तेमाल हो रहे “दो वर्षों से” जैसे शब्द को शाब्दिक रूप से पूरा दो वर्ष नहीं माना जाना चाहिए। अधिक सटीक अवधि करीब एक वर्ष आठ महीने बनती है।

सवाल फिर वही है—यदि आधिकारिक रूप से दूसरा कर्मचारी स्टेनो बनाया जा चुका था तो सेवानिवृत्त कर्मचारी की बाद की भूमिका क्या थी?

क्या उन्हें किसी अन्य काम के लिए रखा गया? क्या कोई पुनर्नियुक्ति या संविदा आदेश जारी हुआ? क्या वह महज व्यक्तिगत सहयोग दे रहे थे? या वास्तव में आधिकारिक पटल का काम कर रहे थे?

इन सवालों का उत्तर कार्यालय के रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।

शिकायत में उठाए गए आठ अहम जांच बिंदु

अविनाश पटेल ने जिलाधिकारी से केवल सामान्य जांच कराने की मांग नहीं की है। शिकायत में कई विशिष्ट रिकॉर्ड और प्रशासनिक बिंदुओं की जांच की मांग रखी गई है।

इसमें देवेंद्र पाण्डेय की वास्तविक सेवानिवृत्ति तिथि और उसके बाद कार्यालय में उनकी मौजूदगी की अवधि सत्यापित करने, किसी पुनर्नियुक्ति, संविदा या मानदेय आदेश की जांच करने तथा यह पता लगाने को कहा गया है कि उन्हें किस अधिकारी की अनुमति से काम दिया गया।

इसके साथ सरकारी फाइलों तक उनकी पहुंच के अधिकार की जांच, फाइल निस्तारण में किसी तरह के कथित पक्षपात या अनुचित लाभ की संभावना की पड़ताल और पत्रावली संचलन रजिस्टर, आदेश पुस्तिका तथा ई-ऑफिस रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की गई है। प्रकाशित शिकायत विवरण में भी इन बिंदुओं का उल्लेख है।

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि यदि बिना वैध आदेश के संवेदनशील सरकारी कार्य कराने की पुष्टि होती है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी तय की जाए।

साथ ही निष्पक्ष जांच पूरी होने तक संबंधित सेवानिवृत्त कर्मचारी को संवेदनशील कार्य से अलग रखने और नियमित कर्मचारी से काम कराने की मांग की गई है।

सबसे बड़ा सवाल—जब नया स्टेनो नियुक्त था तो पुराने कर्मचारी की भूमिका क्या थी?

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण नया तथ्य जनवरी 2025 का वह तैनाती आदेश है, जिसका उल्लेख तत्कालीन समाचार में मिलता है।

उस समय विकास विभाग के लिपिक राम सुमिरन यादव को मुख्य विकास अधिकारी का स्टेनो बनाया गया था। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट था कि यह जिम्मेदारी देवेंद्र पाण्डेय की सेवानिवृत्ति के बाद दी गई।

इससे जांच के लिए कुछ बेहद ठोस सवाल खड़े होते हैं।

यदि राम सुमिरन यादव आधिकारिक स्टेनो थे, तो देवेंद्र पाण्डेय किस क्षमता में कार्यालय में काम कर रहे थे? क्या किसी बाद के आदेश से व्यवस्था बदली गई? क्या दोनों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं? क्या देवेंद्र किसी औपचारिक संविदा, पुनर्नियुक्ति या सलाहकार व्यवस्था में थे?

यदि ऐसा कोई आदेश है तो उसे सार्वजनिक किए जाने से विवाद का बड़ा हिस्सा समाप्त हो सकता है।

और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो यह जांचना जरूरी हो जाएगा कि उन्हें सरकारी पत्रावलियों या CDO कार्यालय से जुड़े काम तक पहुंच किस स्तर पर और किसके निर्देश से मिली।

यही कारण है कि केवल मौखिक स्पष्टीकरण के बजाय आदेश पुस्तिका और सेवा/तैनाती रिकॉर्ड इस विवाद में निर्णायक होंगे।

फाइल मूवमेंट और ई-ऑफिस रिकॉर्ड की जांच क्यों महत्वपूर्ण?

सरकारी कार्यालय में किसी फाइल पर किस स्तर पर काम हुआ, किस अधिकारी या कर्मचारी के पास पत्रावली गई और कब आगे भेजी गई—इन सबका रिकॉर्ड प्रशासनिक जवाबदेही का आधार होता है।

शिकायतकर्ता ने इसी कारण फाइल मूवमेंट रजिस्टर और ई-ऑफिस रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की है।

अगर आरोप गलत हैं और सेवानिवृत्त कर्मचारी का संवेदनशील फाइलों से कोई संबंध नहीं था, तो यही रिकॉर्ड स्थिति साफ कर सकते हैं।

यदि वह किसी वैध आदेश के तहत काम कर रहे थे तो नियुक्ति या कार्य आवंटन आदेश इस सवाल का जवाब देगा।

और यदि रिकॉर्ड में उनकी ऐसी भूमिका सामने आती है जिसके लिए कोई स्पष्ट प्रशासनिक आदेश उपलब्ध नहीं है, तो यह जांच का विषय बन सकता है।

इसलिए मौजूदा विवाद को व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की बजाय दस्तावेजी जांच से सुलझाना अधिक महत्वपूर्ण है।

CDO कार्यालय कितना महत्वपूर्ण?

सुल्तानपुर जिला प्रशासन की वेबसाइट स्पष्ट करती है कि जिले में विकास कार्यक्रमों की निगरानी मुख्य विकास अधिकारी के स्तर से की जाती है।

जिले की आधिकारिक डायरेक्टरी में CDO कार्यालय का अलग संपर्क भी दर्ज है। आधिकारिक रिकॉर्ड में जिला विकास अधिकारी का कार्यालय भी इसी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा दिखाई देता है।

विकास भवन में जिला ग्राम्य विकास अभिकरण का कार्यालय भी संचालित होता है, जिसके अंतर्गत मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, मुख्यमंत्री आवास योजना, विधायक निधि और दूसरी ग्रामीण विकास योजनाओं का काम आता है।

ऐसे में CDO कार्यालय के स्टेनो पटल पर कौन अधिकृत रूप से काम कर रहा है, यह साधारण कार्मिक व्यवस्था का प्रश्न भर नहीं है। कार्यालयी पत्राचार और कार्य आवंटन की पारदर्शिता के लिहाज से इसका स्पष्ट होना जरूरी है।

अपना दल (एस) नेता की शिकायत से बढ़ा राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि शिकायत किसी सामान्य व्यक्तिगत प्रार्थना पत्र तक सीमित नहीं है। इसे सरकार के सहयोगी दल अपना दल (एस) के अयोध्या क्षेत्र के पदाधिकारी अविनाश पटेल ने उठाया है।

11 सितंबर को प्रकाशित स्वतंत्र खबरों में उनकी ओर से जिलाधिकारी को शिकायत देने और उच्चस्तरीय जांच की मांग की पुष्टि हुई है।

हालांकि शिकायतकर्ता की राजनीतिक पहचान किसी आरोप को स्वतः सही साबित नहीं करती। उसी तरह केवल शिकायत राजनीतिक व्यक्ति ने की है, इसलिए उसे खारिज भी नहीं किया जा सकता।

मामले का फैसला दस्तावेज करेंगे—सेवानिवृत्ति रिकॉर्ड, नियुक्ति आदेश, वर्तमान कार्य आवंटन और फाइलों तक पहुंच से संबंधित कार्यालयी रिकॉर्ड।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया का इंतजार

मामला 11 सितंबर से सार्वजनिक चर्चा में है, लेकिन 13 सितंबर तक उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में जिला प्रशासन या CDO कार्यालय की कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली

इसका अर्थ यह नहीं है कि आंतरिक स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। केवल इतना कहा जा सकता है कि अभी सार्वजनिक रूप से जांच आदेश, पुनर्नियुक्ति आदेश या संबंधित कर्मचारी की वर्तमान स्थिति का विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय के संपर्क विवरण उपलब्ध हैं, लेकिन उसमें व्यक्तिगत स्टाफ की मौजूदा तैनाती का विवरण प्रकाशित नहीं है।

ऐसे में प्रशासन की ओर से स्थिति स्पष्ट किए जाने से यह विवाद जल्दी सुलझ सकता है।

पूर्व और वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उठे सवाल

शिकायतकर्ता का आरोप यदि सही पाया जाता है तो जांच केवल देवेंद्र पाण्डेय की भूमिका तक सीमित नहीं रहेगी।

तब यह जानना भी जरूरी होगा कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें कार्यालय में काम करने की अनुमति किसने दी, किस अवधि में किन अधिकारियों के सामने वह कार्यरत रहे और क्या उनके कार्य के संबंध में किसी प्रकार का लिखित आदेश जारी हुआ था।

इस वजह से शिकायत में वर्तमान ही नहीं बल्कि पूर्व प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका की जांच की मांग भी निहित है।

हालांकि फिलहाल किसी पूर्व या वर्तमान CDO की व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्थापित नहीं हुई है। जब तक दस्तावेज सामने न आएं, किसी अधिकारी पर नियम उल्लंघन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

जांच से ही साफ होगा पूरा मामला

सुल्तानपुर CDO कार्यालय से जुड़ा विवाद अब एक सीधे सवाल पर टिक गया है—31 दिसंबर 2024 को सेवानिवृत्त हो चुके देवेंद्र पाण्डेय सितंबर 2026 में यदि वास्तव में स्टेनो पटल से जुड़े काम कर रहे हैं तो किस अधिकार से?

पुराना सार्वजनिक रिकॉर्ड यह स्थापित करता है कि उनकी सेवानिवृत्ति के बाद राम सुमिरन यादव को स्टेनो की जिम्मेदारी दी गई थी। दूसरी ओर, अब अपना दल (एस) नेता की शिकायत में दावा किया गया है कि देवेंद्र पाण्डेय सेवानिवृत्ति के बावजूद उसी संवेदनशील कार्यालयी व्यवस्था में सक्रिय हैं।

इन दोनों तथ्यों के बीच की कड़ी कोई आरोप नहीं, बल्कि एक आधिकारिक आदेश ही स्पष्ट कर सकता है।

यदि वैध पुनर्नियुक्ति, संविदा या कार्य आवंटन मौजूद है तो प्रशासन उसे सामने रखकर स्थिति स्पष्ट कर सकता है। यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है तो यह जांचना आवश्यक होगा कि सरकारी पटल, फाइल और कार्यालयी काम तक पहुंच कैसे और किसकी अनुमति से बनी रही।

अविनाश पटेल ने जिलाधिकारी से इसी पूरी कड़ी की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। अब निगाह इस बात पर है कि जिला प्रशासन क्या स्पष्टीकरण देता है और शिकायत में मांगे गए सेवा रिकॉर्ड, तैनाती आदेश तथा ई-ऑफिस दस्तावेजों की जांच कराई जाती है या नहीं।

  • समाचार संपादन, ब्रेकिंग अलर्ट और फैक्ट-चेक पर फ़ोकस। ज़मीनी रिपोर्टों को डेटा के साथ जोड़ना पसंद। कॉफ़ी, डेडलाइन और सत्य , तीनों से समझौता नहीं।

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