Published: Friday, September 25, 2026, 15:56 [IST]
फिल्म: द वन-फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट (The Vvaan Force Of The Forrest)
स्टारकास्ट: सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, अनूप सोनी, श्वेता त्रिपाठी
डायरेक्टर: दीपक कुमार मिश्रा
रन टाइम: 2 घंटे 45 मिनट
रेटिंग: 4 (****)
The Vvaan Review: बॉलीवुड में लंबे समय से ऐसी कहानियों की कमी महसूस होती रही है, जिनकी जड़ें किसी खास इलाके की मिट्टी, लोकविश्वास और स्थानीय संस्कृति में गहराई से जुड़ी हों। साउथ की फिल्मों ने 'कांतारा' और 'तुम्बाड' जैसी फिल्मों के जरिए ये साबित किया है कि लोककथाओं और स्थानीय मान्यताओं को अगर ईमानदारी से पर्दे पर उतारा जाए तो वो सिर्फ किसी एक क्षेत्र की कहानी नहीं रह जातीं बल्कि देशभर के दर्शकों से जुड़ सकती हैं।
बॉलीवुड एक्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा की 'द वन' भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश करती है। देवांचल का जंगल, वन देवी की रहस्यमयी कहानी, छठ पूजा की आस्था और एक परिवार की अधूरी ख्वाहिशें मिलकर फिल्म को एक ऐसा माहौल देते हैं, जिसमें इमोशन और थ्रिल दोनों साथ चलते हैं।
क्या है 'द वन' की कहानी?
-कहानी देवांचल नाम के एक गांव से शुरू होती है। गांव के बीचोंबीच मौजूद जंगल और वहां स्थित वन देवी का प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। गांव वालों का विश्वास है कि रात के समय जंगल में जाना सख्त मना है क्योंकि उस वक्त वन देवी का पहरा रहता है। सालों से चली आ रही इस मान्यता के सामने कोई सवाल खड़ा नहीं करता लेकिन ऋषि ऐसा नहीं है।
-सिद्धार्थ मल्होत्रा का किरदार ऋषि मुंबई में रहने वाला एक आधुनिक और तर्कवादी इंजीनियर है। उसके लिए गांव की मान्यताएं और वन देवी से जुड़ी कहानियां अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं हैं। यहां तक कि छठ जैसे त्योहार के मौके पर गांव लौटने के बजाय वह छुट्टियां मनाने को ज्यादा प्राथमिकता देता है लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी पसंद के हिसाब से नहीं चलती।
-ऋषि और उसकी पत्नी ममता यानी तमन्ना भाटिया लंबे समय से माता-पिता बनने का इंतजार कर रहे हैं। आर्थिक परेशानियों के कारण IVF का खर्च उठाना भी उनके लिए आसान नहीं है। पारिवारिक दबाव और परिस्थितियों के बीच दोनों को छठ के मौके पर देवांचल लौटना पड़ता है।
-गांव लौटने के बाद ऋषि के सामने वही पुरानी मान्यताएं फिर खड़ी हो जाती हैं। वह वन देवी के नियमों को मानने से इनकार करता है और आखिरकार रात में उस जंगल में प्रवेश करने का फैसला करता है, जहां जाने से पूरा गांव डरता है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ऋषि वहां जाता है तो उसके साथ कुछ होता क्यों नहीं?
-क्या वन देवी महज एक कहानी है? क्या जंगल के पीछे कोई ऐसा रहस्य है जिसे गांव वाले सालों से छिपाते आए हैं? या फिर आस्था और डर की आड़ में कोई अपना खेल खेल रहा है? फिल्म का यही रहस्य दर्शकों को कहानी से जोड़े रखता है।
फिल्म की स्टारकास्ट और उनकी दमदार एक्टिंग
-ऋषि के किरदार में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपने अभिनय का अच्छा इस्तेमाल किया है। उनका किरदार शुरुआत में एक ऐसे शहरी युवक के तौर पर सामने आता है जो हर चीज को तर्क की कसौटी पर परखता है। लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उसके भीतर का डर, असुरक्षा और परिवार के लिए उसकी चिंता सामने आती है।
-एक तरफ वह अंधविश्वास को चुनौती देता है तो दूसरी तरफ अपनी शादीशुदा जिंदगी और पिता बनने की इच्छा को लेकर अंदर से टूट रहा है। सिद्धार्थ ने इन दोनों पक्षों के बीच अच्छा संतुलन बनाया है।
-ममता के किरदार में तमन्ना भाटिया फिल्म की इमोशनल रीढ़ नजर आती हैं। मां बनने की इच्छा, लगातार असफल कोशिशों का दर्द और परिवार के दबाव के बीच उनका किरदार काफी संवेदनशील तरीके से लिखा गया है।
-तमन्ना भाटिया ने ममता की बेबसी को सिर्फ डायलॉग के जरिए नहीं बल्कि अपनी आंखों और हावभाव से भी व्यक्त किया है। कई जगह उनका शांत रहना ही उनके किरदार का सबसे बड़ा इमोशनल मोमेंट बन जाता है।
-श्वेता त्रिपाठी और अनूप सोनी जैसे अनुभवी कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को मजबूती दी है। दोनों की मौजूदगी फिल्म के भावनात्मक हिस्से को वजन देती है। वहीं मनीष पॉल कहानी के गंभीर माहौल के बीच अपनी कॉमिक टाइमिंग से थोड़ी राहत देते हैं। उनकी कॉमेडी जबरदस्ती ठूंसी हुई नहीं लगती और कई जगह तनावपूर्ण माहौल को हल्का करती है। सुनील ग्रोवर को भी फिल्म में पर्याप्त स्क्रीन स्पेस मिला है और वह अपने किरदार के साथ न्याय करते हैं।
डायरेक्शन में दिखा देसीपन
-फिल्म का निर्देशन दीपक कुमार मिश्रा ने किया है, जो 'पंचायत' जैसी चर्चित सीरीज से दर्शकों के बीच अपनी पहचान बना चुके हैं। वहीं कहानी अरुणाभ कुमार ने लिखी है। दोनों की सबसे बड़ी ताकत छोटे शहरों और कस्बों की जिंदगी को बिना जरूरत के ग्लैमराइज किए पर्दे पर उतारना रही है।
-'द वन' में भी यही खूबी नजर आती है। देवांचल की भाषा, गांव का माहौल, छठ के घाट, पूजा की तैयारियां और स्थानीय सामाजिक ताना-बाना फिल्म में काफी स्वाभाविक नजर आता है। सबसे अच्छी बात ये है कि फिल्म अपने लोकल फ्लेवर को दिखाने के लिए उसे ओवरड्रामैटिक बनाने की कोशिश नहीं करती। गांव यहां सिर्फ कहानी की लोकेशन नहीं है बल्कि खुद कहानी का एक अहम हिस्सा बन जाता है।
छठ और लोकसंस्कृति फिल्म की खासियत
'द वन' का सबसे खूबसूरत पहलू इसका छठ के साथ जुड़ाव है। फिल्म में छठ सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि परिवार, आस्था और उम्मीद से जुड़ी भावना बनकर सामने आता है। फिल्म का छठ गीत पहले ही दर्शकों के बीच अपनी जगह बना चुका है और कहानी के अंदर भी इसका इस्तेमाल खूबसूरती से किया गया है। संगीत फिल्म के माहौल को और मजबूत करता है।
कैसी है ये फिल्म?
फिल्म का पहला हिस्सा इसकी बड़ी ताकत है। शुरुआत से ही कहानी सवाल खड़े करती है और दर्शक को जवाब जानने के लिए आगे बढ़ाती रहती है। फर्स्ट हाफ में कहानी की रफ्तार इतनी अच्छी है कि कई जगह महसूस ही नहीं होता कि कितना वक्त बीत गया। हालांकि सेकंड हाफ में फिल्म थोड़ी धीमी पड़ती है। कुछ हिस्से ऐसे लगते हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जा सकता था। फिल्म का रनटाइम अगर कुछ कम रखा जाता तो कहानी का प्रभाव और बेहतर हो सकता था। फिर भी ये कमी फिल्म के मूल आकर्षण को पूरी तरह कमजोर नहीं करती।
'द वन' देखें या नहीं?
-अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जिनमें लोककथा, रहस्य, आस्था और पारिवारिक इमोशन एक साथ देखने को मिले, तो 'द वन' आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकती है। ये सिर्फ वन देवी के रहस्य को सुलझाने वाली कहानी नहीं है बल्कि परिवार, विश्वास और अपनी जड़ों से जुड़ने की कहानी भी है।
-'कांतारा' और 'तुम्बाड' जैसी फिल्मों में अगर आपको लोकविश्वास और रहस्य का मिश्रण पसंद आया था, तो 'द वन' भी आपको सिनेमाघर तक खींच सकती है। खासतौर पर परिवार के साथ देखने के लिए ये एक एंटरटेनिंग विकल्प साबित हो सकती है।
-कुल मिलाकर'द वन' की सबसे बड़ी खूबी इसका देसीपन है। फिल्म हर चीज को परफेक्ट तरीके से नहीं साध पाती लेकिन इसकी कहानी, कलाकारों की परफॉर्मेंस, छठ का माहौल और लोककथा वाला रहस्य इसे सामान्य बॉलीवुड एंटरटेनर से अलग जरूर बनाते हैं।