Unemployed Adult Son Maintenance: भारत में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जिसकी वजह से कई युवा बालिग या यूं कहें कि 18 वर्ष की आयु होने के बाद भी आर्थिक रूप से अपने माता-पिता पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या कोई बेरोजगार बालिग बेटा कानूनी रूप से अपने माता-पिता से खर्चे या गुजारे भत्ते (Unemployed Adult Son Maintenance) की मांग कर सकता है? आइए विस्तार से जानें इंडिया में क्या कहता है कानून (Maintenance Law in India)।
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क्या है भारत में कानून?
भारतीय अदालतों के विभिन्न फैसलों और देश के मौजूदा कानूनों के मुताबिक, अगर 18 वर्षीय युवा पूरी तरह से स्वस्थ है, तो बालिग बेटे को माता-पिता से खर्च मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
नाबालिग बनाम बालिग संतान
यदि बच्चा नाबालिग है, तो माता-पिता (Parents Maintenance Rules) की कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वे उसका भरण-पोषण करें, चाहे वे खुद बेरोजगार ही क्यों न हों। लेकिन 18 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद यह अधिकार (Adult Son Legal Rights) बदल जाता है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (BNSS Section 144) (पुराना CrPC 125) के तहत, बालिग संतान तभी भरण-पोषण की हकदार होती है जब वह शारीरिक या मानसिक विकलांगता, बीमारी या किसी अन्य मजबूरी के कारण अपना खर्च उठाने में असमर्थ हो।
केवल "बेरोजगार" होना या काम न मिलना मात्र से बालिग युवक कोर्ट से माता-पिता से खर्चे की मांग नहीं कर सकता।
बालिग बेटी मांग सकती है खर्च
हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (धारा 20) के तहत यदि कोई लड़की 18 साल की हो चुकी है। वह कोई व्यापार या नौकरी नहीं करती या अपनी कमाई से अपना खर्च उठाने में असमर्थ है, तो वह बालिग होने के बावजूद पिता से भरण-पोषण का दावा कर सकती है, लेकिन यह नियम बालिग स्वस्थ बेटों पर लागू नहीं होता।
शिक्षा या विशेष परिस्थितियां
यदि कोई बालिग बेटा या बेटी पढ़ाई कर रहे हैं, तो कुछ परिस्थितियों में अदालतें नैतिक या पारिवारिक जिम्मेदारी मान सकती हैं, लेकिन कानूनी रूप से यह माता-पिता की मर्जी या विशिष्ट कोर्ट के मामलों पर निर्भर करता है, कोई स्वचालित (automatic) अधिकार नहीं है।
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