उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राज्य में दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक वैज्ञानिक पहल शुरू की है। गंगा-यमुना दोआब में ₹1.65 करोड़ की 'प्रबंधित जलभृत पुनर्भरण' (MAR) परियोजना के तहत अध्ययन के दौरान कानपुर से प्रयागराज के बीच लगभग 200 किलोमीटर लंबी एक प्राचीन भूमिगत नदी प्रणाली की खोज की गई है।
बारिश के पानी को सीधे प्राकृतिक जल भंडारों तक पहुँचाने के लिए तीन साल की विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई है।
- Published: 17 Sep 2026, 06:47 AM IST
- Last Updated: 17 Sep 2026, 07:02 AM IST
प्रदेश में भूजल स्तर को सुधारने और बारिश के पानी को सीधे प्राकृतिक जल भंडारों (एक्विफर्स) तक पहुँचाने के लिए भूगर्भ जल विभाग और नमामि गंगे ने मिलकर तीन साल की विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है।
हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (NGRI) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एडवांस हवाई भू-भौतिकीय सर्वेक्षण और बोरहोल लॉगिंग के जरिए इस प्राचीन नदी मार्ग की पहचान की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह 200 किलोमीटर लंबा भूमिगत मार्ग आज भी जमीन के नीचे पानी के बहाव और भंडारण में बेहद मददगार साबित हो सकता है।
प्राचीन नदी मार्ग और जलभृतों का वैज्ञानिक जुड़ाव
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि गंगा और यमुना नदियों का जमीन के भीतर मौजूद मुख्य जलभृतों के साथ एक गहरा हाइड्रोजियोलॉजिकल संबंध है। यह 200 किमी लंबी प्राचीन नदी प्रणाली जमीन के नीचे एक प्राकृतिक पाइपलाइन की तरह काम करती है। मानसून के दौरान बेकार बह जाने वाले बारिश के पानी को यदि इन प्राचीन मार्गों और जलभृतों तक पहुँचाया जाए, तो इससे पूरे दोआब क्षेत्र के भूजल स्तर में अभूतपूर्व सुधार देखने को मिल सकता है।
छह स्थानों से पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के वित्तीय सहयोग से संचालित इस ₹1.65 करोड़ की परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। शुरुआती चरण में छह प्रमुख स्थानों का चयन कर वहाँ भूजल पुनर्भरण की विशेष संरचनाएं बनाई जाएँगी।
इन पायलट सेंटर्स पर बारिश के पानी को जमीन के भीतर उतारने के बाद उसके प्रभाव, जल स्तर में वृद्धि और स्थानीय एक्विफर की जल ग्रहण क्षमता का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा।
भविष्य का खाका और जल सुरक्षा
पायलट चरण से प्राप्त डेटा और परिणामों के आधार पर इस मॉडल को पूरे गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में विस्तारित किया जाएगा। परियोजना के तहत केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं बनाया जाएगा, बल्कि एनजीआरआई के सहयोग से शोध, विकास और वैज्ञानिक निगरानी भी जारी रहेगी। इसके साथ ही स्थानीय नागरिकों को जल संरक्षण से जोड़ने के लिए व्यापक स्तर पर सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियों के माध्यम से जागरूक किया जाएगा।